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पंचायत चुनाव के फैसले से सपा को मिली संजीवनी
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गोंडा। अब नए चेहरों व नवयुवकों को तरजीह देना मतदाताओं की फितरत हो चुकी है। जो बड़े स्तर की राजनीति करने वाले लोगों के लिए नसीहत बन सकती है। बीता हुआ पंचायत चुनाव आगामी 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव का ट्रेलर साबित होगा।
इस चुनाव में मतदाताओं ने अधिकांस नए चेहरों को तरजीह दी है। पुराने मठाधीश माने जाने वाले गांव के दबंग, प्रधान व मुखिया को बाय बाय बोल दिया है। विधानसभा चुनाव में यदि यही हथकंडा मतदाताओं ने अपनाया तो बड़े बड़ों की लुटिया डूब सकती है।
पंचायत चुनाव में जिला पंचायत सदस्य, ग्राम प्रधान व क्षेत्र पंचायत सदस्य तक एक नयापन देखने को मिला है। अधिकांश नए चेहरे सामने आए हैं। युवा वर्ग को मतदाताओं ने अधिक तरजीह दी है।
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नौ वर्ष पहले हुए विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता ने एकतरफा समाजवादी पार्टी के नए मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश यादव का चेहरा लाने के लिए बहुमत दिया। उसके बाद 2017 के चुनाव में योगी आदित्यनाथ का नया चेहरा मुख्यमंत्री के तौर पर देखते हुए एकतरफा मताधिकार का प्रयोग किया।
ठीक विधानसभा चुनाव की तर्ज पर इस बार पंचायत चुनाव को देखा जा रहा है। जिस तरह गांव की सरकार का गठन करने के लिए मतदाताओं ने इस बार बड़े बड़े धुरंधरों को धूल चटाई है और अधिकांश नए चेहरे के साथ नव युवकों को तरजीह दिया है।
यह 2022 के विधानसभा चुनाव के ट्रेलर के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि जिला पंचायत सदस्यों को भाजपा ने पार्टी के आधार पर समर्थित प्रत्याशी उतारे थे मगर भाजपा का दूर दूर तक कोई असर नही दिखा। मजेदार बात यह है कि पंचायत चुनाव में विकास करने वाले लोगों को जनता ने दोबारा मौका दिया है।
जहां सत्ताधारी पंचायत चुनाव में अच्छे प्रदर्शन करने की उम्मीद लगाये जा रहे थे। लेकिन परिणाम बिल्कुल विपरीत आया है। जिससे मुख्य विपक्षी पार्टी समाज वादी पार्टी को पंचायत चुनाव से विधान सभा में संजीवनी मिलने की उम्मीद जाग गयी है।
हलधरमऊ की चारों जिला पंचायत सीट पर समाज वादी पार्टी के प्रत्याशियों ने कड़ी टक्कर देते हुए चार सीट में तीन पर कब्जा कर लिया। जबकि एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में चली गयी। जबकि इसी ब्लाक में भाजपा विधायक का घर भी है। इस चुनाव के पहले बसपा के एक बड़े नेता समाज वादी की सदस्यता ग्रहण कर लिया था। जिससे बसपा का प्रदर्शन काफी कमजोर था।
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इस चुनाव में मतदाताओं ने अधिकांस नए चेहरों को तरजीह दी है। पुराने मठाधीश माने जाने वाले गांव के दबंग, प्रधान व मुखिया को बाय बाय बोल दिया है। विधानसभा चुनाव में यदि यही हथकंडा मतदाताओं ने अपनाया तो बड़े बड़ों की लुटिया डूब सकती है।
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पंचायत चुनाव में जिला पंचायत सदस्य, ग्राम प्रधान व क्षेत्र पंचायत सदस्य तक एक नयापन देखने को मिला है। अधिकांश नए चेहरे सामने आए हैं। युवा वर्ग को मतदाताओं ने अधिक तरजीह दी है।
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नौ वर्ष पहले हुए विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता ने एकतरफा समाजवादी पार्टी के नए मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश यादव का चेहरा लाने के लिए बहुमत दिया। उसके बाद 2017 के चुनाव में योगी आदित्यनाथ का नया चेहरा मुख्यमंत्री के तौर पर देखते हुए एकतरफा मताधिकार का प्रयोग किया।
ठीक विधानसभा चुनाव की तर्ज पर इस बार पंचायत चुनाव को देखा जा रहा है। जिस तरह गांव की सरकार का गठन करने के लिए मतदाताओं ने इस बार बड़े बड़े धुरंधरों को धूल चटाई है और अधिकांश नए चेहरे के साथ नव युवकों को तरजीह दिया है।
यह 2022 के विधानसभा चुनाव के ट्रेलर के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि जिला पंचायत सदस्यों को भाजपा ने पार्टी के आधार पर समर्थित प्रत्याशी उतारे थे मगर भाजपा का दूर दूर तक कोई असर नही दिखा। मजेदार बात यह है कि पंचायत चुनाव में विकास करने वाले लोगों को जनता ने दोबारा मौका दिया है।
जहां सत्ताधारी पंचायत चुनाव में अच्छे प्रदर्शन करने की उम्मीद लगाये जा रहे थे। लेकिन परिणाम बिल्कुल विपरीत आया है। जिससे मुख्य विपक्षी पार्टी समाज वादी पार्टी को पंचायत चुनाव से विधान सभा में संजीवनी मिलने की उम्मीद जाग गयी है।
हलधरमऊ की चारों जिला पंचायत सीट पर समाज वादी पार्टी के प्रत्याशियों ने कड़ी टक्कर देते हुए चार सीट में तीन पर कब्जा कर लिया। जबकि एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में चली गयी। जबकि इसी ब्लाक में भाजपा विधायक का घर भी है। इस चुनाव के पहले बसपा के एक बड़े नेता समाज वादी की सदस्यता ग्रहण कर लिया था। जिससे बसपा का प्रदर्शन काफी कमजोर था।