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55 साल पहले 11 बाइकों के सहारे रघुराज उपाध्याय लडे़ चुनाव
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गोंडा। वर्तमान में चुनाव प्रचार के लिए हेलीकाप्टर और मंहगे लक्जरी वाहनों का काफिला जुटाने में प्रत्याशी लाखों खर्च करने से कोई गुरेज नहीं बरतते है। लेकिन आजादी के बाद 80 के दशक तक ऐसा नहीं था। तब पैदल, बैलगाड़ी, साइकिल, बाइक और खुली जीप से ही चुनाव प्रचार होता था। चुनावी सभाओं में भीड़ अपेक्षाकृत कम जुटती थी। साल 1977 में कांग्रेस के टिकट से गोंडा सदर सीट पर चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी रघुराज प्रसाद उपाध्याय ने मात्र आठ हजार रुपया खर्च कर पूरा चुनाव लड़ा था। इस दौरान चुनाव प्रचार का पूरा कार्य मात्र 11 मोटर साइकिलों के सहारे निपटाया गया था। हालांकि आपातकाल को लेकर व्याप्त आक्रोश कारण उन्हें चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था।
पार्टी में मजबूत पकड़ के कारण ही रघुराज प्रसाद को वर्ष 1977 में पार्टी की ओर से विधान सभा चुनाव लड़ने का मौका मिला था। उस दौर में कांग्रेस पार्टी के तारे गर्दिश में थे इसलिए वह चुनाव लड़ने का मूड नहीं बना पा रहे थे। शुभचिंतकों ने उन्हें समझाया कि जब पार्टी के बड़े-बड़े नेता कह रहे हैं तो चुनाव लड़ने से गुरेज कैसा। अगर हार भी गए तो किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा। 84 वर्षीय पूर्व विधायक रघुराज उपाध्याय बताते हैं कि तब वह चुनाव मात्र आठ हजार रुपया खर्च कर निपटा था। प्रचार वाहनों के नाम पर उनके काफिले में सिर्फ 11 मोटर साइकिलें थीं। इन्हीं मोटरसाइकिलों पर सवार होकर समर्थक क्षेत्र में प्रचार करते थे। तब छोटी-छोटी जनसभाएं होतीं थीं, जिनमें दो सौ से ढाई सौ लोगों की भीड़ ही जुट पाती थी। आपात काल के कारण कांग्रेस के प्रति जनता में बड़ा आक्रोश था। इसलिए चुनाव में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन कड़ी मेहनत का ही नतीजा रहा कि वह चुनाव में रनर रहे। इसके बाद 1980, 1985 और 1989 में कांग्रेस प्रत्याशी के रुप में उन्होंने इसी सीट पर बड़ी जीत हासिल की थी। साल 2004 में भाजपा ने उन्हें स्थानीय निकाय क्षेत्र गोंडा-बलरामपुर से विधान परिषद का चुनाव लड़ाया तो वह उसमें भी विजयी रहे।
लाल बिहारी और ईश्वर बाबू ने दिखायी राजनीति की राह
अविभाजित गोंडा जिले के बलरामपुर तहसील क्षेत्र के कौवापुर रेलवे स्टेशन के निकट गांव धौरहरी निवासी रघुराज प्रसाद उपध्याय साल 1967 में वकालत करने जिला मुख्यालय आए थे। इस दौरान पड़ोस में रहने के कारण स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व विधायक व कांग्रेस नेता लाल बिहारी टंडन का पूरा सानिध्य उन्हें मिला। यहीं पर बाद में उनकी मुलाकात तत्कालीन विधायक ईश्वर शरन से भी हुई। लाल बिहारी टंडन और ईश्वर बाबू के विचारों से प्रभावित होकर रघुराज उपाध्याय भी वकालत पेशे के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी से जुड़ गए। सबसे पहले उन्हें युवक कांग्रेस के शहर कमेटी का महामंत्री बनाकर संगठन विस्तार की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। वर्ष 1967 में ईश्वर बाबू के चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी। उनका दिया नारा ‘हलुआ पूड़ी गरम-गरम, वोट देव ईश्वर शरन‘ खूब चर्चित बना था।
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घाघरा नदी पर पुल बनवाने की मांग उठाई
पूर्व विधायक रघुराज उपाध्याय बताते हैं कि तब मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और पार्टी के दिग्गज नेताओं से मिलना आसान था और कोई भी जनप्रतिनिधि उनसे मिलकर क्षेत्र की समस्या और अपनी बात रख सकता था। बताया कि गोंडा से प्रदेश की राजधानी लखनऊ की दूरी मात्र 125 किमी ही थी इसके बावजूद लखनऊ पहुंचने में पूरा दिन लग जाता था। इसका कारण था कि गोंडा-लखनऊ मार्ग पर घाघरा नदी पर पुल नहीं था। यहां पहुंचकर यात्री स्टीमर से नदी पार करते थे। पीपे का पुल बनता था, लेकिन वह भी बरसात के दिनों में टूट जाता था। साल 1978 में हुए मनकापुर उपचुनाव के दौरान जब कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी मनकापुर आईं तो उनसे मुलाकात कर क्षेत्र की इस ज्वलंत समस्या के बारे में बताते हुए घाघरा नदी पर पुल बनवाने की मांग रखी थी। इसके बाद 1980 में कांग्रेस की जीत के बाद प्रधानमंत्री बनने पर इंदिरा गांधी ने घाघरा घाट पर पुल निर्माण को स्वीकृति दी थी।
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पार्टी में मजबूत पकड़ के कारण ही रघुराज प्रसाद को वर्ष 1977 में पार्टी की ओर से विधान सभा चुनाव लड़ने का मौका मिला था। उस दौर में कांग्रेस पार्टी के तारे गर्दिश में थे इसलिए वह चुनाव लड़ने का मूड नहीं बना पा रहे थे। शुभचिंतकों ने उन्हें समझाया कि जब पार्टी के बड़े-बड़े नेता कह रहे हैं तो चुनाव लड़ने से गुरेज कैसा। अगर हार भी गए तो किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा। 84 वर्षीय पूर्व विधायक रघुराज उपाध्याय बताते हैं कि तब वह चुनाव मात्र आठ हजार रुपया खर्च कर निपटा था। प्रचार वाहनों के नाम पर उनके काफिले में सिर्फ 11 मोटर साइकिलें थीं। इन्हीं मोटरसाइकिलों पर सवार होकर समर्थक क्षेत्र में प्रचार करते थे। तब छोटी-छोटी जनसभाएं होतीं थीं, जिनमें दो सौ से ढाई सौ लोगों की भीड़ ही जुट पाती थी। आपात काल के कारण कांग्रेस के प्रति जनता में बड़ा आक्रोश था। इसलिए चुनाव में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन कड़ी मेहनत का ही नतीजा रहा कि वह चुनाव में रनर रहे। इसके बाद 1980, 1985 और 1989 में कांग्रेस प्रत्याशी के रुप में उन्होंने इसी सीट पर बड़ी जीत हासिल की थी। साल 2004 में भाजपा ने उन्हें स्थानीय निकाय क्षेत्र गोंडा-बलरामपुर से विधान परिषद का चुनाव लड़ाया तो वह उसमें भी विजयी रहे।
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लाल बिहारी और ईश्वर बाबू ने दिखायी राजनीति की राह
अविभाजित गोंडा जिले के बलरामपुर तहसील क्षेत्र के कौवापुर रेलवे स्टेशन के निकट गांव धौरहरी निवासी रघुराज प्रसाद उपध्याय साल 1967 में वकालत करने जिला मुख्यालय आए थे। इस दौरान पड़ोस में रहने के कारण स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व विधायक व कांग्रेस नेता लाल बिहारी टंडन का पूरा सानिध्य उन्हें मिला। यहीं पर बाद में उनकी मुलाकात तत्कालीन विधायक ईश्वर शरन से भी हुई। लाल बिहारी टंडन और ईश्वर बाबू के विचारों से प्रभावित होकर रघुराज उपाध्याय भी वकालत पेशे के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी से जुड़ गए। सबसे पहले उन्हें युवक कांग्रेस के शहर कमेटी का महामंत्री बनाकर संगठन विस्तार की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। वर्ष 1967 में ईश्वर बाबू के चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी। उनका दिया नारा ‘हलुआ पूड़ी गरम-गरम, वोट देव ईश्वर शरन‘ खूब चर्चित बना था।
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घाघरा नदी पर पुल बनवाने की मांग उठाई
पूर्व विधायक रघुराज उपाध्याय बताते हैं कि तब मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और पार्टी के दिग्गज नेताओं से मिलना आसान था और कोई भी जनप्रतिनिधि उनसे मिलकर क्षेत्र की समस्या और अपनी बात रख सकता था। बताया कि गोंडा से प्रदेश की राजधानी लखनऊ की दूरी मात्र 125 किमी ही थी इसके बावजूद लखनऊ पहुंचने में पूरा दिन लग जाता था। इसका कारण था कि गोंडा-लखनऊ मार्ग पर घाघरा नदी पर पुल नहीं था। यहां पहुंचकर यात्री स्टीमर से नदी पार करते थे। पीपे का पुल बनता था, लेकिन वह भी बरसात के दिनों में टूट जाता था। साल 1978 में हुए मनकापुर उपचुनाव के दौरान जब कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी मनकापुर आईं तो उनसे मुलाकात कर क्षेत्र की इस ज्वलंत समस्या के बारे में बताते हुए घाघरा नदी पर पुल बनवाने की मांग रखी थी। इसके बाद 1980 में कांग्रेस की जीत के बाद प्रधानमंत्री बनने पर इंदिरा गांधी ने घाघरा घाट पर पुल निर्माण को स्वीकृति दी थी।