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स्वास्थ्य विभाग को चार साल में नहीं मिला एक भी मुखबिर, योजना धरासाई
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गोंडा। कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग के स्तर पर संचालित मुखबिर योजना जिले मे धराशाई हो गई है। योजना के चार साल बीत जाने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग को जांच से जुड़ा दागी सेंटर पकड़वाने को एक भी मुखबिर नहीं मिल सका।
मुखबिर योजना के तहत भ्रूण लिंग की पहचान बताने वाले नर्सिंग होम व अल्ट्रासाउंड सेंटरों की धरपकड़ करवाने वाले को विभाग की तरफ से दो लाख रुपया तक पुरस्कार देने का प्रावधान था। कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए राज्य सरकार की तरफ से 24 जुलाई 2017 को ‘मुखबिर योजना’ की शुरुआत की गई थी।
चार साल बीत जाने के बाद भी जिले में एक भी ऐसा वालंटियर नहीं मिल सका जो भ्रूण लिंग जांच करने वाले नर्सिंग होम व अल्ट्रासाउंड सेंटरों का पता बताकर का उनकी धरपकड़ करवा सके।
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इस योजना का उद्देश्य था कि गोपनीय सूचना की मदद से शहर के जिन निजी चिकित्सालयों और नर्सिंग होम में भ्रूण परीक्षण होता मिले, उनकी पहचान कर कार्रवाई के घेरे में लाया जा सके। योजना लागू होने के चार बाद भी विभाग का मुखबिर बनने के लिए अभी तक मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय में किसी ने पंजीकरण नहीं कराया है।
स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ कर्मचारी ने बताया कि इस योजना के तहत राज्य या केंद्र सरकार की सेवाओं में कार्यरत व्यक्ति या गर्भवती महिला को मिथ्या ग्राहक या सहायक के तौर पर चुना जाता है। ग्राहक बनने वाली गर्भवती महिला को विभाग में एक शपथ पत्र देना होता है।
मुखबिर मिथ्या ग्राहक या सहायक बनने के लिए मुख्य चिकित्साधिकारी से संपर्क किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि मिथ्या ग्राहक शहर में चल रहे उन अल्ट्रासाउंड सेंटरों और नर्सिंग होम की जानकारी स्वास्थ्य विभाग को देते हैं, जहां भ्रूण परीक्षण कराया जाता है। इसकी सूचना पर ही स्वास्थ्य विभाग की टीम पुलिस के साथ मिलकर छापेमारी कर नियमों के तहत कार्रवाई तय करती।
भ्रूण हत्या रोकने के लिए सही सूचना देने वाले मुखबिर को 60 हजार, मिथ्या ग्राहक बनने वाली महिला को एक लाख रुपये और इस स्टिंग ऑपरेशन में शामिल सहायक को 40 हजार रुपये की राशि इनाम के बतौर मिलनी होती है।
योजना के तहत सभी को यह राशि तीन किश्तों में मिलना थी। पहली किश्त का भुगतान सूचना सही निकलने पर दूसरी किश्त न्यायालय में हाजिरी के दौरान और तीसरी किश्त की राशि न्यायालय से दोषियों को सजा मिलने के बाद होना था।
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मुखबिर योजना के तहत भ्रूण लिंग की पहचान बताने वाले नर्सिंग होम व अल्ट्रासाउंड सेंटरों की धरपकड़ करवाने वाले को विभाग की तरफ से दो लाख रुपया तक पुरस्कार देने का प्रावधान था। कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए राज्य सरकार की तरफ से 24 जुलाई 2017 को ‘मुखबिर योजना’ की शुरुआत की गई थी।
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चार साल बीत जाने के बाद भी जिले में एक भी ऐसा वालंटियर नहीं मिल सका जो भ्रूण लिंग जांच करने वाले नर्सिंग होम व अल्ट्रासाउंड सेंटरों का पता बताकर का उनकी धरपकड़ करवा सके।
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इस योजना का उद्देश्य था कि गोपनीय सूचना की मदद से शहर के जिन निजी चिकित्सालयों और नर्सिंग होम में भ्रूण परीक्षण होता मिले, उनकी पहचान कर कार्रवाई के घेरे में लाया जा सके। योजना लागू होने के चार बाद भी विभाग का मुखबिर बनने के लिए अभी तक मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय में किसी ने पंजीकरण नहीं कराया है।
स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ कर्मचारी ने बताया कि इस योजना के तहत राज्य या केंद्र सरकार की सेवाओं में कार्यरत व्यक्ति या गर्भवती महिला को मिथ्या ग्राहक या सहायक के तौर पर चुना जाता है। ग्राहक बनने वाली गर्भवती महिला को विभाग में एक शपथ पत्र देना होता है।
मुखबिर मिथ्या ग्राहक या सहायक बनने के लिए मुख्य चिकित्साधिकारी से संपर्क किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि मिथ्या ग्राहक शहर में चल रहे उन अल्ट्रासाउंड सेंटरों और नर्सिंग होम की जानकारी स्वास्थ्य विभाग को देते हैं, जहां भ्रूण परीक्षण कराया जाता है। इसकी सूचना पर ही स्वास्थ्य विभाग की टीम पुलिस के साथ मिलकर छापेमारी कर नियमों के तहत कार्रवाई तय करती।
भ्रूण हत्या रोकने के लिए सही सूचना देने वाले मुखबिर को 60 हजार, मिथ्या ग्राहक बनने वाली महिला को एक लाख रुपये और इस स्टिंग ऑपरेशन में शामिल सहायक को 40 हजार रुपये की राशि इनाम के बतौर मिलनी होती है।
योजना के तहत सभी को यह राशि तीन किश्तों में मिलना थी। पहली किश्त का भुगतान सूचना सही निकलने पर दूसरी किश्त न्यायालय में हाजिरी के दौरान और तीसरी किश्त की राशि न्यायालय से दोषियों को सजा मिलने के बाद होना था।