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फेफडे़ की बीमारी सीओपीडी के बढ़ रहे रोगी, बरतें सावधानी

Wed, 17 Nov 2021 11:12 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 17 Nov 2021 11:12 PM IST
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Lung disease started haunting as the cold increased
गोंडा। ठंड के जोर पकड़ने के साथ ही फेफड़े से जुड़ी क्रॉनिक आब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) ने भी अपना प्रकोप बढ़ाना शुरू कर दिया है। क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस के बतौर भी पहचानी जाने वाली इस बीमारी के लिए बढ़ता वायु प्रदूषण, धुआं और धूम्रपान को प्रमुख तौर से जोखिम कारक माना जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग ने इससे बचाव के लिए एलर्ट जारी करते हुए इससे बचने को विशेषतौर पर सावधानी बरतने की सलाह दी है।
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बाबू ईश्वरशरण जिला चिकित्सालय के क्षय रोग विभाग के चेस्ट फिजिशियन डॉ. ए.के. उपाध्याय ने बताया कि सीओपीडी बीमारी की शुरूआत में सुबह के वक्त खांसी आती है। धीरे-धीरे खांसी बढ़ने के साथ बलगम की परेशान भी सताने लगती है।
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सर्दी बढ़ने के साथ ही इस बीमारी से पीड़ित लोगों की सांस फूलने लगती है और धीरे-धीरे पीड़ित दैनिक चर्या से जुड़े कार्य मसलन नहाना, धोना, चलना-फिरना, बाथरूम तक जाने में अपने को लाचार पाने लगता है।
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बताया कि सामान्यत: इस बीमारी के शुरूआत में एक्स-रे में फेफड़े में कोई खराबी नजर नहीं आती लेकिन बाद में फेफड़े का आकार बढ़ने के साथ संक्रमण का शिकंजा कसने लगता है।
इसकी बेहतर जांच स्पाइरोमेटरी (कंप्यूटर के जरिये फेफड़े की कार्यक्षमता परखना) होती है। गंभीर रोगियों में एबीजी के जरिये रक्त में आक्सीजन और कार्बन डाई आक्साइड की जांच की जाती है। कुछ रोगियों में सीटी स्कैन की भी आवश्यकता पड़ती है।

डॉ. उपाध्याय ने बताया कि सीओपीडी के इलाज में इन्हेलर चिकित्सा सर्वश्रेष्ठ है। इसे चिकित्सक की सलाह पर ही नियम के तहत किया जाना चाहिए। ठंड़ में परेशानी बढ़ने पर चिकित्सक की सलाह से दवा की डोज में परिवर्तन किया जा सकता हैं। खांसी व अन्य लक्षणों के होने पर इससे संबधित दवाई भी ली जा सकती है। खांसी के साथ गाढ़ा या पीला बलगम आने व गंभीर रोगियों में नेबुलाइजर, नॉन इनवेसिव वेंटिलेशन (एनआईवी) का उपयोग भी किया जाता है।
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