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डा कृष्णा सिन्हा का सरयू तट पर हुआ अंतिम संस्कार
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डॉ. कृष्णा सिन्हा पंचतत्व में विलीन
सरयू तट पर हुआ अंतिम संस्कार
वजीरगंज (गोंडा)। क्षेत्र की ग्रामपंचायत नौबस्ता की प्रधान व शिक्षाविद डॉ. कृष्णा सिन्हा का अंतिम संस्कार अयोध्या सरयू तट पर किया गया। मुखाग्नि उनके बेटे डॉ. दीपेन सिन्हा ने दिया। सुबह उनका पार्थिव शरीर नौबस्ता के पयागपुर पहुंचा, जहां पहले से ही लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए जमा थे। ग्राम पंचायत में मम्मी नाम से मशहूर प्रधान को अंतिम विदाई देने के लिए जुटे लोगों की आंखों में आंसू थे। बच्चे बुजुर्ग, हर खासोआम के लिए उनके मन में सम्मान रहता था। किसी को परेशान देख वह पुत्र दीपेन को हर तरह की मदद को कहती रहीं। गांव की जनता के प्रति उनके स्नेह के चलते गांव के लोग उन्हें न सिर्फ मम्मी कह कर बुलाते थे बल्कि मां जैसा सम्मान भी देते थे। वे रहती तो गोंडा मुख्यालय पर थीं पर हर रविवार को वे गांव आकर लोगों का कुशलक्षेम जरूर लेतीं। पुत्र दीपेन जो अमेरिका में व्यवसाय करते हैं से यह कहती रहती थीं कि कहीं भी रहना पर अपनी जड़ से जुड़े रहना। जिसका असर ये रहा कि वे हर तीसरे महीने गांव आते रहते हैं तथा लोगों से संपर्क में रहकर उनके दुखदर्द में शामिल होते हैं। गांव के लोगों ने उन्हें वृद्धावस्था में भी गांव का प्रधान चुना। आज उनके निधन पर शिक्षा जगत की क्षति के साथ गांव के लोगों ने अपना अभिभावक खो दिया। सैकड़ों लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
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सरयू तट पर हुआ अंतिम संस्कार
वजीरगंज (गोंडा)। क्षेत्र की ग्रामपंचायत नौबस्ता की प्रधान व शिक्षाविद डॉ. कृष्णा सिन्हा का अंतिम संस्कार अयोध्या सरयू तट पर किया गया। मुखाग्नि उनके बेटे डॉ. दीपेन सिन्हा ने दिया। सुबह उनका पार्थिव शरीर नौबस्ता के पयागपुर पहुंचा, जहां पहले से ही लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए जमा थे। ग्राम पंचायत में मम्मी नाम से मशहूर प्रधान को अंतिम विदाई देने के लिए जुटे लोगों की आंखों में आंसू थे। बच्चे बुजुर्ग, हर खासोआम के लिए उनके मन में सम्मान रहता था। किसी को परेशान देख वह पुत्र दीपेन को हर तरह की मदद को कहती रहीं। गांव की जनता के प्रति उनके स्नेह के चलते गांव के लोग उन्हें न सिर्फ मम्मी कह कर बुलाते थे बल्कि मां जैसा सम्मान भी देते थे। वे रहती तो गोंडा मुख्यालय पर थीं पर हर रविवार को वे गांव आकर लोगों का कुशलक्षेम जरूर लेतीं। पुत्र दीपेन जो अमेरिका में व्यवसाय करते हैं से यह कहती रहती थीं कि कहीं भी रहना पर अपनी जड़ से जुड़े रहना। जिसका असर ये रहा कि वे हर तीसरे महीने गांव आते रहते हैं तथा लोगों से संपर्क में रहकर उनके दुखदर्द में शामिल होते हैं। गांव के लोगों ने उन्हें वृद्धावस्था में भी गांव का प्रधान चुना। आज उनके निधन पर शिक्षा जगत की क्षति के साथ गांव के लोगों ने अपना अभिभावक खो दिया। सैकड़ों लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।