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नहाय खाय के साथ छठ पूजा की शुरुआत आज से
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गोंडा। चार दिवसीय डाला छठ त्योहार सोमवार को नहाए खाए के साथ शुरू होगा। मंगलवार को खरना रहेगा। डाला छठ पर्व मनाने वाली महिलाएं दीपावली पर्व के दिन से ही बहुत बेसब्री से इंतजारी करती हैं।
मान्यता यह कि व्रत रखने वाली महिलाएं जो भी मन्नत मानकर पूजा करती हैं वह मन्नत शतप्रतिशत पूरा हो जाता है। व्रत रखने वाली महिलाएं डाला छठ पर्व को उठाने के बाद से करीब सात वर्ष लगातार मनाना अनिवार्य होता है।
वैसे तो यह डाला छठ पर्व बिहार राज्य का सबसे बड़ा त्योहार होता है, लेकिन धीरे-धीरे पूर्वांचल से जुड़े जनपदों में अब यह त्योहार बहुत तेजी से फैल गया है। इन जनपदों में भी हजारों की संख्या में महिलाएं व पुरुष डाला छठ त्योहार बहुत धूमधाम से मनाते हैं।
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शहर के खैरा भवानी मंदिर के पोखरे में डाला छठ मनाने के लिए पोखरे के किनारे पूजा स्थान की घेराबंदी करने लगे हैं। काफी संख्या में लोग पूजा स्थान व पिंड बना लिए हैं। डाला छठ त्योहार में विशेषकर महिलाएं व्रत रहती हैं। परिवार में व्रत रखने वाली महिलाओं की मृत्यु हो जाने पर व उनके पति व्रत करते हैं। जिस परिवार में व्रत रखने वाली महिलाएं की उम्र अधिक हो जाने पर उनके परिवार के बड़ी बहू, देवरानी व जेठानी व्रत करती हैं।
मान्यता यह है कि जो भी मन्नत मानकर महिलाएं व्रत रहती हैं। वह मन्नत शत-प्रतिशत पूरा हो जाता है। यह व्रत करने वाले परिवार के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी करते आते हैं। जो भी महिलाएं यह व्रत करती हैं करीब सात वर्ष लगातार करने के बाद ही उद्यापन करके व्रत छोड़ सकती हैं।
डाला छठ पर मूल रूप से महिलाएं अपने पति के दीर्घायु के लिए और संतान की प्राप्ति के लिए करती हैं। चार दिवसीय डाला छठ पर सोमवार से नहाए खाए के साथ शुरू हो जाएगा। मंगलवार को खरना रहेगा। इसदिन व्रत करने वाली महिलाएं दिनभर निर्जल रखकर देर शाम को गुड़ के साथ चावल को अपने ही घर में लकड़ी के चूल्हे पर पकाकर मीठा चावल का खीर बनाती हैं।
तब उसे रोटी के साथ खाना खाती हैं। उसके बाद अगले दिन बुधवार की शाम को व्रत करने वाली महिलाएं व पुरुष अपने परिवार के लोग डाला छठ को सिर पर रखकर नंगे पैर द्वारा अपने घर के करीब पोखरा व तालाब के पास जाकर भगवान सूर्य अस्त होने तक पूजा करती हैं। जैसे भगवान सूर्य अस्त होते हैं व्रत करने वाली महिलाएं और पुरुष गाय के कच्चे दूध से अर्घ्य देकर पूजा की समाप्ति करके पुन: ढोल नगाड़े बजाते और पटाखे दागते घर पहुंचती हैं।
घर के आंगन में डाला को गन्ने के हौज के बीच में रखकर दीप प्रज्ज्वलित करके पूजा करती हैं। पूजा करने के बाद छठी मैया के गीत गाकर व्रत रखने वाली महिलाएं और पुरुष घर के जमीन पर रात भर विश्राम करते हैं। अगले दिन गुरुवार की भोर में ही डाला छठ को लेकर पुन: उसी स्थान पर पूजा करने के लिए पहुंच जाती हैं। जब भगवान सूर्य का उदय होता है। तब उन्हें दूध का अर्घ्य देकर पूजा का समाप्ति कर देती हैं।
रानी बाजार के निवासिनी विमला श्रीवास्तव का कहना है यह व्रत चार दिवसीय का होता है इन चार दिवसीय व्रत में रात जमीन पर ही बिताना पड़ता है। इस व्रत खोलने के लिए इस व्रत को करने के लिए बहुत ही साफ सफाई की जरूरत रहती है, कहा यह व्रत वह दो दशक से रहती चली आ रही हैं।
खैरा रेलवे कॉलोनी की निवासिनी नीलू श्रीवास्तव का कहना है इस व्रत का महत्व बहुत बड़ा है। इस व्रत करने से पति के दीर्घायु होने के साथ ही संतान की भी प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा कि यह मान्यता है कि जिन महिलाओं को संतान नहीं होता है अगर इस व्रत को विधिपूर्वक पूजा व व्रत करती हैं तो उन्हें संतान जरूर प्राप्त होगी।
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मान्यता यह कि व्रत रखने वाली महिलाएं जो भी मन्नत मानकर पूजा करती हैं वह मन्नत शतप्रतिशत पूरा हो जाता है। व्रत रखने वाली महिलाएं डाला छठ पर्व को उठाने के बाद से करीब सात वर्ष लगातार मनाना अनिवार्य होता है।
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वैसे तो यह डाला छठ पर्व बिहार राज्य का सबसे बड़ा त्योहार होता है, लेकिन धीरे-धीरे पूर्वांचल से जुड़े जनपदों में अब यह त्योहार बहुत तेजी से फैल गया है। इन जनपदों में भी हजारों की संख्या में महिलाएं व पुरुष डाला छठ त्योहार बहुत धूमधाम से मनाते हैं।
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शहर के खैरा भवानी मंदिर के पोखरे में डाला छठ मनाने के लिए पोखरे के किनारे पूजा स्थान की घेराबंदी करने लगे हैं। काफी संख्या में लोग पूजा स्थान व पिंड बना लिए हैं। डाला छठ त्योहार में विशेषकर महिलाएं व्रत रहती हैं। परिवार में व्रत रखने वाली महिलाओं की मृत्यु हो जाने पर व उनके पति व्रत करते हैं। जिस परिवार में व्रत रखने वाली महिलाएं की उम्र अधिक हो जाने पर उनके परिवार के बड़ी बहू, देवरानी व जेठानी व्रत करती हैं।
मान्यता यह है कि जो भी मन्नत मानकर महिलाएं व्रत रहती हैं। वह मन्नत शत-प्रतिशत पूरा हो जाता है। यह व्रत करने वाले परिवार के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी करते आते हैं। जो भी महिलाएं यह व्रत करती हैं करीब सात वर्ष लगातार करने के बाद ही उद्यापन करके व्रत छोड़ सकती हैं।
डाला छठ पर मूल रूप से महिलाएं अपने पति के दीर्घायु के लिए और संतान की प्राप्ति के लिए करती हैं। चार दिवसीय डाला छठ पर सोमवार से नहाए खाए के साथ शुरू हो जाएगा। मंगलवार को खरना रहेगा। इसदिन व्रत करने वाली महिलाएं दिनभर निर्जल रखकर देर शाम को गुड़ के साथ चावल को अपने ही घर में लकड़ी के चूल्हे पर पकाकर मीठा चावल का खीर बनाती हैं।
तब उसे रोटी के साथ खाना खाती हैं। उसके बाद अगले दिन बुधवार की शाम को व्रत करने वाली महिलाएं व पुरुष अपने परिवार के लोग डाला छठ को सिर पर रखकर नंगे पैर द्वारा अपने घर के करीब पोखरा व तालाब के पास जाकर भगवान सूर्य अस्त होने तक पूजा करती हैं। जैसे भगवान सूर्य अस्त होते हैं व्रत करने वाली महिलाएं और पुरुष गाय के कच्चे दूध से अर्घ्य देकर पूजा की समाप्ति करके पुन: ढोल नगाड़े बजाते और पटाखे दागते घर पहुंचती हैं।
घर के आंगन में डाला को गन्ने के हौज के बीच में रखकर दीप प्रज्ज्वलित करके पूजा करती हैं। पूजा करने के बाद छठी मैया के गीत गाकर व्रत रखने वाली महिलाएं और पुरुष घर के जमीन पर रात भर विश्राम करते हैं। अगले दिन गुरुवार की भोर में ही डाला छठ को लेकर पुन: उसी स्थान पर पूजा करने के लिए पहुंच जाती हैं। जब भगवान सूर्य का उदय होता है। तब उन्हें दूध का अर्घ्य देकर पूजा का समाप्ति कर देती हैं।
रानी बाजार के निवासिनी विमला श्रीवास्तव का कहना है यह व्रत चार दिवसीय का होता है इन चार दिवसीय व्रत में रात जमीन पर ही बिताना पड़ता है। इस व्रत खोलने के लिए इस व्रत को करने के लिए बहुत ही साफ सफाई की जरूरत रहती है, कहा यह व्रत वह दो दशक से रहती चली आ रही हैं।
खैरा रेलवे कॉलोनी की निवासिनी नीलू श्रीवास्तव का कहना है इस व्रत का महत्व बहुत बड़ा है। इस व्रत करने से पति के दीर्घायु होने के साथ ही संतान की भी प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा कि यह मान्यता है कि जिन महिलाओं को संतान नहीं होता है अगर इस व्रत को विधिपूर्वक पूजा व व्रत करती हैं तो उन्हें संतान जरूर प्राप्त होगी।