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Gonda News: बाढ़ की तबाही से बचाव के समय से हों प्रबंध
Mon, 10 Mar 2025 11:11 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
Updated Mon, 10 Mar 2025 11:11 PM IST
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करनैलगंज (गोंडा)। बाढ़ का पानी हर साल करीब एक हजार किसानों की मंशा पर पानी फेर जाता है। 30 किलोमीटर की लंबाई में प्रतिवर्ष बाढ़ के दौरान करीब तीन हजार बीघे फसल को नदी अपनी धारा में समाहित कर लेती है। बाढ़ के चलते नदी और बांध के बीच में खेती करने वाले किसानों को प्रतिवर्ष भारी नुकसान उठाना पड़ता है। इसके बाद भी समय रहते बाढ़ से फसलों के बचाव को लेकर कोई खास प्रबंध नहीं किए जाते हैं।
बाराबंकी के ग्राम परसावल, कमियार, बांसगांव, पारा, बेहटा, असवा, मांझा रायपुर तथा गोंडा के नकहरा, बहुवन मदार मांझा, चंदापुर किटौली गांव नदी के मुहाने पर बसे हैं। अधिकांश ग्रामीणों के खेत बांध और नदी के बीच में हैं। जिनमें मक्का, धान, गन्ना के साथ ही सब्जियों की खेती होती है। किसान जब बोआई करते हैं तो नदी करीब एक किलोमीटर दूर रहती है। मगर बाढ़ के दौरान नदी की कटान से खेत कटकर धारा में समा जाते हैं। जलस्तर बढ़ने की शुरुआत के साथ किसानों की धड़कन तेज हो जाती है। प्रतिवर्ष 3000 बीघे से अधिक खेत कटकर नदी में समा जाते हैं। इससे तैयार फसल बर्बाद हो जाती है। बाढ़ के बाद किसान संसाधनों से अपने खेतों को फिर से तैयार करते हैं। एक छमाही की फसल काटने के बाद दूसरी छमाही की फसल तैयार होने के पहले ही नदी फिर बढ़ने लगती है। किसान रामसुख, चेतराम, राधेश्याम, राम गुलाम, सनेही का कहना है कि हर साल इस उम्मीद के साथ खेतों की बोआई की जाती है कि शायद इस बार बाढ़ या कटान कम हो जिससे फसल बच जाए। मगर हर साल खेती के साथ फसल भी कटकर नदी में समा जाती है। मुआवजा भी नहीं मिलता है।
तहसीलदार अल्पिका वर्मा का कहना है कि बाढ़ से बचाव को लेकर समय रहते प्रबंध करने के लिए संबंधित विभागों को कहा गया है। बाढ़ के समय होने वाले नुकसान आकलन करके क्षतिपूर्ति दी जाती है।
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बाराबंकी के ग्राम परसावल, कमियार, बांसगांव, पारा, बेहटा, असवा, मांझा रायपुर तथा गोंडा के नकहरा, बहुवन मदार मांझा, चंदापुर किटौली गांव नदी के मुहाने पर बसे हैं। अधिकांश ग्रामीणों के खेत बांध और नदी के बीच में हैं। जिनमें मक्का, धान, गन्ना के साथ ही सब्जियों की खेती होती है। किसान जब बोआई करते हैं तो नदी करीब एक किलोमीटर दूर रहती है। मगर बाढ़ के दौरान नदी की कटान से खेत कटकर धारा में समा जाते हैं। जलस्तर बढ़ने की शुरुआत के साथ किसानों की धड़कन तेज हो जाती है। प्रतिवर्ष 3000 बीघे से अधिक खेत कटकर नदी में समा जाते हैं। इससे तैयार फसल बर्बाद हो जाती है। बाढ़ के बाद किसान संसाधनों से अपने खेतों को फिर से तैयार करते हैं। एक छमाही की फसल काटने के बाद दूसरी छमाही की फसल तैयार होने के पहले ही नदी फिर बढ़ने लगती है। किसान रामसुख, चेतराम, राधेश्याम, राम गुलाम, सनेही का कहना है कि हर साल इस उम्मीद के साथ खेतों की बोआई की जाती है कि शायद इस बार बाढ़ या कटान कम हो जिससे फसल बच जाए। मगर हर साल खेती के साथ फसल भी कटकर नदी में समा जाती है। मुआवजा भी नहीं मिलता है।
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तहसीलदार अल्पिका वर्मा का कहना है कि बाढ़ से बचाव को लेकर समय रहते प्रबंध करने के लिए संबंधित विभागों को कहा गया है। बाढ़ के समय होने वाले नुकसान आकलन करके क्षतिपूर्ति दी जाती है।
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