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महंगाई से थमी निर्माण कार्य की रफ्तार
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जिलाधिकारी ने गांवों में विकास कार्य पूरा करने का निर्देश दिया है लेकिन सीमेंट, गिट्टी, बालू की कीमत बढ़ने से निर्माण कार्य थम गए हैं। गांवों में विकास कार्यों के लिए पंचायत राज विभाग के पास भरपूर बजट है लेकिन अब तक सिर्फ 31 फीसदी धनराशि ही खर्च हुई है। जिला पंचायती राज विभाग को इस वित्त वर्ष 3720.34 लाख रुपये मिले है लेकिन जुलाई तक सिर्फ 1169.42 लाख रुपये ही खर्च हुए हैं।
दूसरी तरफ ग्राम प्रधानों का कहना है कि कोरोना के दौर में विभाग नये सरकारी रेट के साथ किश्त मुहैया कराए तो कायाकल्प का काम तेजी से किया जाएगा। क्योंकि कोविड के दौरान सीमेंट, गिट्टी, बालू की कीमत बढ़ने के कारण पिछले सरकारी रेट पर कायाकल्प का काम कराना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। जिला प्रशासन और विभाग की ओर से इस समस्या पर खास ध्यान नहीं होने से पंचायत भवन, सामुदायिक शौचालय और विद्यालय के कायाकल्प का काम गति नहीं पकड़ रहा है। जबकि जिलाधिकारी का सख्त निर्देश है कि सबसे पहले पंचायत भवन और सामुदायिक शौचालय का काम तेजी से पूरा कराया जाए।
आलम यह है कि अगस्त महीना समाप्त होने को है और अभी तक सिर्फ 398 पंचायत भवनों का ही निर्माण हो पाया है। जबकि पिछले साल दिसंबर तक 796 पंचायत भवनों का कार्य पूरा होना था। इसके लिए करीब 127.36 करोड़ रुपये मंजूर कर दिए गए थे लेकिन अभी भी 398 पंचायत भवनों का काम शेष पड़ा है। निर्माण कार्यों की धीमी रफ्तार देखते हुए विभाग ने एक बार फिर दो माह की अवधि बढ़ा दी है। यानी 31 अक्तूबर तक निर्माण कार्य पूरा करना है।
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अगस्त में 60 फीसदी धनराशि ग्राम प्रधानों के खाते में भेजी गई है। नवनिर्वाचित प्रधानों के डोंगल बनकर तैयार है। सितंबर में राज्य वित्त आयोग की धनराशि भी आ जाएगी। अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिए दो माह का समय बढ़ाया गया है। अब 31 अक्टूबर तक काम पूरा करना है।-रमेश चंद्र उपाध्याय, जिला पंचायती राज अधिकारी
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इस बार 90 फीसदी नये ग्राम प्रधान चुनकर आए हैं। कई गांवों के पूर्व प्रधान और प्रशासक कायाकल्प का पैसा खर्च कर चुके हैं। इसकी जांच होनी चाहिए। निर्माण सामग्री महंगी होने से पुराने रेट पर काम करना संभव नहीं है। विभाग को इस पर भी विचार करना चाहिए। रेट बढ़ा कर शासन की ओर से पैसा भेजा जाए तो कायाकल्प का काम तेजी से होगा।-लल्लन सिंह, कार्यकारी अध्यक्ष, जिला ग्राम प्रधान संगठन
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मेरे गांव को धनराशि की एक किश्त मिली है जिसे कायाकल्प में खर्च करना है। गिट्टी, बालू, सीमेंट महंगी होने से लागत बढ़ गई है। इससे कोई काम शुरू नहीं हो पा रहा है। विभाग को इस पर विचार करना चाहिए।-सोनू रेड्डी, ग्राम प्रधान, पटकनिया।
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दूसरी तरफ ग्राम प्रधानों का कहना है कि कोरोना के दौर में विभाग नये सरकारी रेट के साथ किश्त मुहैया कराए तो कायाकल्प का काम तेजी से किया जाएगा। क्योंकि कोविड के दौरान सीमेंट, गिट्टी, बालू की कीमत बढ़ने के कारण पिछले सरकारी रेट पर कायाकल्प का काम कराना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। जिला प्रशासन और विभाग की ओर से इस समस्या पर खास ध्यान नहीं होने से पंचायत भवन, सामुदायिक शौचालय और विद्यालय के कायाकल्प का काम गति नहीं पकड़ रहा है। जबकि जिलाधिकारी का सख्त निर्देश है कि सबसे पहले पंचायत भवन और सामुदायिक शौचालय का काम तेजी से पूरा कराया जाए।
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आलम यह है कि अगस्त महीना समाप्त होने को है और अभी तक सिर्फ 398 पंचायत भवनों का ही निर्माण हो पाया है। जबकि पिछले साल दिसंबर तक 796 पंचायत भवनों का कार्य पूरा होना था। इसके लिए करीब 127.36 करोड़ रुपये मंजूर कर दिए गए थे लेकिन अभी भी 398 पंचायत भवनों का काम शेष पड़ा है। निर्माण कार्यों की धीमी रफ्तार देखते हुए विभाग ने एक बार फिर दो माह की अवधि बढ़ा दी है। यानी 31 अक्तूबर तक निर्माण कार्य पूरा करना है।
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अगस्त में 60 फीसदी धनराशि ग्राम प्रधानों के खाते में भेजी गई है। नवनिर्वाचित प्रधानों के डोंगल बनकर तैयार है। सितंबर में राज्य वित्त आयोग की धनराशि भी आ जाएगी। अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिए दो माह का समय बढ़ाया गया है। अब 31 अक्टूबर तक काम पूरा करना है।-रमेश चंद्र उपाध्याय, जिला पंचायती राज अधिकारी
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इस बार 90 फीसदी नये ग्राम प्रधान चुनकर आए हैं। कई गांवों के पूर्व प्रधान और प्रशासक कायाकल्प का पैसा खर्च कर चुके हैं। इसकी जांच होनी चाहिए। निर्माण सामग्री महंगी होने से पुराने रेट पर काम करना संभव नहीं है। विभाग को इस पर भी विचार करना चाहिए। रेट बढ़ा कर शासन की ओर से पैसा भेजा जाए तो कायाकल्प का काम तेजी से होगा।-लल्लन सिंह, कार्यकारी अध्यक्ष, जिला ग्राम प्रधान संगठन
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मेरे गांव को धनराशि की एक किश्त मिली है जिसे कायाकल्प में खर्च करना है। गिट्टी, बालू, सीमेंट महंगी होने से लागत बढ़ गई है। इससे कोई काम शुरू नहीं हो पा रहा है। विभाग को इस पर विचार करना चाहिए।-सोनू रेड्डी, ग्राम प्रधान, पटकनिया।