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सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने की जरूरत
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मातृ पितृ स्मृति सेवा संस्थान ट्रस्ट भदौरा मौधिया की ओर से पुण्य स्मरण दिवस पर महामना ग्रामीण पुस्तकालय एवं कलाम वाचनालय भवन के सभागार में विचार एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन बुधवार को किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी श्यामलाल कुशवाहा ने कहा कि गांव पाश्चात्य सभ्यता से भौतिक दृष्टि से तो समृद्ध हो रहे हैं लेकिन अपनी मौलिक सांस्कृतिक पहचान खोते जा रहे हैं। इसे संरक्षित करने की जरूरत है।
पीजी कालेज भुड़कुड़ा के पूर्व प्रचार्य प्रो. अशोक सिंह ने कहा कि गांव में पुस्तकालय एवं वाचनालय होना उसकी जीवंतता दर्शाता है। युवा इसका लाभ लें। आमतौर पर रोजी रोटी की तलाश में बाहर गए व्यक्ति शहरों में ही आबाद होकर गांव से नाता तोड़ लेते हैं लेकिन प्रशासनिक अधिकारी होते हुए भी ओम धीरज का अपने गांव, मिट्टी और क्षेत्र के प्रति लगाव दूसरों के लिए प्रेरणादायक है। बसेवा निवासी नन्हकू सिंह उर्फ नानक दास को लोकहंस साहित्य श्री पुरस्कार से विभूषित करते हुए प्रतीक चिन्ह एवं अंगवस्त्र दिया गया। काव्य गोष्ठी में ओम धीरज ने वक्त को थाम ले ऐसी कोई घड़ी नहीं होती, जीत के लिए भी जादुई छड़ी नहीं होती। नाप कर देख लो कोई दुनिया की कोई भी चादर मां के आंचल से कभी बड़ी नहीं होती सुनाकर वाहवाही लूटी।
इसके साथ ही बृजेशचंद्र पांडेय, संचालक डा. गजाधर शर्मा गंगेश, डा. अशोक कुमार सिंह ने भी अपनी रचना प्रस्तुत की। इस अवसर पर देवेंद्र जोशी, श्यामसुंदर, संयोजक वीरेंद्र चौबे, सुरेंद्र चौबे, वशिष्ठ चौबे, हरिहर यादव, शिवमूर्ति पांडेय, मनिकराज, गौरव मिश्रा, अमित त्रिपाठी, जयप्रकाश, हरिप्रसाद मौर्य, छविनाथ यादव, बृजभूषण, नित्यानंद, संजय आदि उपस्थित रहे।
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पीजी कालेज भुड़कुड़ा के पूर्व प्रचार्य प्रो. अशोक सिंह ने कहा कि गांव में पुस्तकालय एवं वाचनालय होना उसकी जीवंतता दर्शाता है। युवा इसका लाभ लें। आमतौर पर रोजी रोटी की तलाश में बाहर गए व्यक्ति शहरों में ही आबाद होकर गांव से नाता तोड़ लेते हैं लेकिन प्रशासनिक अधिकारी होते हुए भी ओम धीरज का अपने गांव, मिट्टी और क्षेत्र के प्रति लगाव दूसरों के लिए प्रेरणादायक है। बसेवा निवासी नन्हकू सिंह उर्फ नानक दास को लोकहंस साहित्य श्री पुरस्कार से विभूषित करते हुए प्रतीक चिन्ह एवं अंगवस्त्र दिया गया। काव्य गोष्ठी में ओम धीरज ने वक्त को थाम ले ऐसी कोई घड़ी नहीं होती, जीत के लिए भी जादुई छड़ी नहीं होती। नाप कर देख लो कोई दुनिया की कोई भी चादर मां के आंचल से कभी बड़ी नहीं होती सुनाकर वाहवाही लूटी।
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इसके साथ ही बृजेशचंद्र पांडेय, संचालक डा. गजाधर शर्मा गंगेश, डा. अशोक कुमार सिंह ने भी अपनी रचना प्रस्तुत की। इस अवसर पर देवेंद्र जोशी, श्यामसुंदर, संयोजक वीरेंद्र चौबे, सुरेंद्र चौबे, वशिष्ठ चौबे, हरिहर यादव, शिवमूर्ति पांडेय, मनिकराज, गौरव मिश्रा, अमित त्रिपाठी, जयप्रकाश, हरिप्रसाद मौर्य, छविनाथ यादव, बृजभूषण, नित्यानंद, संजय आदि उपस्थित रहे।
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