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बेखौफ चल रहा आरओ पानी का धंधा
ब्यूरो/अमर उजाला,गाजीपुर
Updated Sat, 16 Apr 2016 11:57 PM IST
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आरओ वाटर
- फोटो : अमर उजाला
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जिले के भूजल में टोटल डिजाल्ब सालिड्स (टीडीएस) और आर्सेनिक होने के कारण लोगों का झुकाव आरओ पानी की तरफ हुआ है। प्रदूषित भूजल को लेकर बढ़ी जागरूकता के चलते जिले भर में आरओ पानी मुहैया कराने का कारोबार जोर पकड़ता जा रहा है। लोगों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने के नाम पर धंधा कर रहे अधिकतर वाटर प्लांट मानक को पूरा नहीं करते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि अभी तक किसी भी वाटर प्लांट में मानकों की जांच नहीं की गई और न ही प्रशासन इस दिशा में गंभीर है।
तापमान चढ़ने के साथ ही भूजल खिसकता चला जा रहा है। बिजली कटौती के चलते पेयजलापूर्ति भी प्रभावित होती जा रही है। इससे पेयजल संकट गहराता जा रहा है। कुछ वर्ष पूर्व जलनिगम और जांच एजेंसियों के सर्वे में यह बात साफ हुई थी कि भूजल में टोटल डिजाल्ब सालिड्स (टीडीएस) और आर्सेनिक की मात्रा अधिक है। ऐसे में प्रदूषित भूजल का सेवन करने से पथरी और पेट संबंधी तमाम बीमारियों के होने की आशंका रहती है।
इसकी जानकारी होने के बाद जागरूक हुए लोगों ने अपने घरों में आरओ मशीन लगवाना शुरू किया। पेयजल के प्रति लोगों की जागरूकता का लाभ उठाते हुए तमाम लोगों ने पेयजल का धंधा शुरू किया और स्थिति यह है कि शहर में पंद्रह से अधिक और गांवों में तक छोटे-छोटे प्लांट लगाकर आरओ पानी की सप्लाई की जा रही है। बीस लीटर का आरओ पानी भरा प्रति बाटल बीस, 25 से तीस रुपये तक में बेचा जा रहा है। पैकेज्ड वाटर प्लांट लगाने के लिए पंजीकरण, आईएसआई मार्क लेना जरूरी होता है।
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प्लांट लगाने के लिए 250 स्क्वायर फीट का भूखंड होना चाहिए। नियमानुसार पैकेज्ड वाटर प्लांट लगाने पर कम से कम तीस लाख रुपये का खर्च आता है। वैध वाटर प्लांटों में लैब और पानी को शुद्ध करने संबंधी केमिकल होने चाहिए लेकिन जिले में चल रहे अधिकतर वाटर प्लांट मानक के अनुकूल नहीं हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि जिले में चल रहे वाटर प्लांटों की कभी जांच नहीं की गई। स्थिति यह है कि बगैर मानक के चल रहे वाटर प्लांटों में जलदोहन किया जा रहा है।
पैकेज्ड वाटर का लाइसेंस खाद्य सुरक्षा और औषधीय प्रशासन से मिलता है लेकिन जिले में पैकेज्ड वाटर नहीं बिक रहे हैं। अगर कोई पैकेज्ड वाटर की सप्लाई करता है तो इसके लिए लाइसेंस लेना जरूरी है। अगर कोई आरओ का पानी उपलब्ध करा रहा है तो उस पर कार्रवाई की कोई गाइड लाइन नहीं आई है। -चंद्रकिशोर, अभिहित अधिकारी, खाद्य सुरक्षा और औषधीय प्रशासन।
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तापमान चढ़ने के साथ ही भूजल खिसकता चला जा रहा है। बिजली कटौती के चलते पेयजलापूर्ति भी प्रभावित होती जा रही है। इससे पेयजल संकट गहराता जा रहा है। कुछ वर्ष पूर्व जलनिगम और जांच एजेंसियों के सर्वे में यह बात साफ हुई थी कि भूजल में टोटल डिजाल्ब सालिड्स (टीडीएस) और आर्सेनिक की मात्रा अधिक है। ऐसे में प्रदूषित भूजल का सेवन करने से पथरी और पेट संबंधी तमाम बीमारियों के होने की आशंका रहती है।
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इसकी जानकारी होने के बाद जागरूक हुए लोगों ने अपने घरों में आरओ मशीन लगवाना शुरू किया। पेयजल के प्रति लोगों की जागरूकता का लाभ उठाते हुए तमाम लोगों ने पेयजल का धंधा शुरू किया और स्थिति यह है कि शहर में पंद्रह से अधिक और गांवों में तक छोटे-छोटे प्लांट लगाकर आरओ पानी की सप्लाई की जा रही है। बीस लीटर का आरओ पानी भरा प्रति बाटल बीस, 25 से तीस रुपये तक में बेचा जा रहा है। पैकेज्ड वाटर प्लांट लगाने के लिए पंजीकरण, आईएसआई मार्क लेना जरूरी होता है।
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प्लांट लगाने के लिए 250 स्क्वायर फीट का भूखंड होना चाहिए। नियमानुसार पैकेज्ड वाटर प्लांट लगाने पर कम से कम तीस लाख रुपये का खर्च आता है। वैध वाटर प्लांटों में लैब और पानी को शुद्ध करने संबंधी केमिकल होने चाहिए लेकिन जिले में चल रहे अधिकतर वाटर प्लांट मानक के अनुकूल नहीं हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि जिले में चल रहे वाटर प्लांटों की कभी जांच नहीं की गई। स्थिति यह है कि बगैर मानक के चल रहे वाटर प्लांटों में जलदोहन किया जा रहा है।
पैकेज्ड वाटर का लाइसेंस खाद्य सुरक्षा और औषधीय प्रशासन से मिलता है लेकिन जिले में पैकेज्ड वाटर नहीं बिक रहे हैं। अगर कोई पैकेज्ड वाटर की सप्लाई करता है तो इसके लिए लाइसेंस लेना जरूरी है। अगर कोई आरओ का पानी उपलब्ध करा रहा है तो उस पर कार्रवाई की कोई गाइड लाइन नहीं आई है। -चंद्रकिशोर, अभिहित अधिकारी, खाद्य सुरक्षा और औषधीय प्रशासन।