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Ghazipur News: हिंदू पहले गाते हैं होली गीत, फिर ताजिया रखकर मातम मनाते हैं मुस्लिम
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कासिमाबाद। भारत के बारे में लोग कहते हैं कि यह देश विश्वास और परंपरा का देश है। यही बरेसर थानाक्षेत्र के मांटा गांव में देखा जा सकता है। जिले के उत्तरी छोर पर स्थित बाराचवर ब्लाॅक का यह गांव गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है।
सात दशक पहले शांति व्यवस्था के लिए अधिकारियों की ओर से दिया गया निर्देश आज परंपरा बन गई है। मुहर्रम के नवीं रात हिंदुओं की ओर से राम-जानकी मंदिर में रात 10 बजे तक होली के गीत गाते हुए खुशियां मनाई जाती हैं। वहीं मुस्लिम पक्ष ताजियों को चौक पर रखकर मातम करते हुए अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। आज से 70 वर्ष पहले होली और मुहर्रम की नवीं यानी कत्ल की रात एक साथ पड़ी थी। इसी को लेकर दोनों पक्षों में काफी तनातनी और विवाद गहरा गया था। दोनों पक्षों की मर्यादाओं को बचाते हुए तत्कालीन प्रशासन ने व्यवस्था दी थी कि आज से कभी भी दोनों पक्ष आपस में टकराव से बचेंगे और अपना अपना त्योहार सकुशल संपन्न कराएंगे। इसी समझौते के तहत हिंदू वर्ग को रात के 10 बजे तक राम जानकी मंदिर (ठाकुर जी) पर होली गीत गाने की इजाजत दी गई और मुस्लिम वर्ग को उसके बाद चौक पर ताजिया रखकर मातम मनाते हुए परंपराओं को करने का समय दिया गया।
यह समय मुहर्रम के नवीं रात के लिए ही निर्धारित किया गया है। उस समय प्रशासन की तरफ से लिए गए फैसले को परंपरा के रूप में अपनाते हुए दोनों वर्ग आज तक निभाते चले आ रहे हैं। हिंदू पक्ष रात 10 बजे तक होली के गीत गाकर खुशियां मनाता है तो मुस्लिम वर्ग उसके बाद अपनी ताजियों को लाकर इमामबाड़ा स्थित चौक पर रखकर मातम करते हुए अपनी कला का प्रदर्शन करता है।
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इस खास दिन का गांव के लोग बेसब्री से इंतजार भी करते हैं। इस बात का उल्लेख बरेसर थाने के त्योहार रजिस्टर में भी दर्ज है।
उस दिन पुलिस प्रशासन सुरक्षा के खास इंतजाम करता है। थानाध्यक्ष बरेसर राजीव पांडेय ने दोनों पक्षों से शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील की।
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सात दशक पहले शांति व्यवस्था के लिए अधिकारियों की ओर से दिया गया निर्देश आज परंपरा बन गई है। मुहर्रम के नवीं रात हिंदुओं की ओर से राम-जानकी मंदिर में रात 10 बजे तक होली के गीत गाते हुए खुशियां मनाई जाती हैं। वहीं मुस्लिम पक्ष ताजियों को चौक पर रखकर मातम करते हुए अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। आज से 70 वर्ष पहले होली और मुहर्रम की नवीं यानी कत्ल की रात एक साथ पड़ी थी। इसी को लेकर दोनों पक्षों में काफी तनातनी और विवाद गहरा गया था। दोनों पक्षों की मर्यादाओं को बचाते हुए तत्कालीन प्रशासन ने व्यवस्था दी थी कि आज से कभी भी दोनों पक्ष आपस में टकराव से बचेंगे और अपना अपना त्योहार सकुशल संपन्न कराएंगे। इसी समझौते के तहत हिंदू वर्ग को रात के 10 बजे तक राम जानकी मंदिर (ठाकुर जी) पर होली गीत गाने की इजाजत दी गई और मुस्लिम वर्ग को उसके बाद चौक पर ताजिया रखकर मातम मनाते हुए परंपराओं को करने का समय दिया गया।
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यह समय मुहर्रम के नवीं रात के लिए ही निर्धारित किया गया है। उस समय प्रशासन की तरफ से लिए गए फैसले को परंपरा के रूप में अपनाते हुए दोनों वर्ग आज तक निभाते चले आ रहे हैं। हिंदू पक्ष रात 10 बजे तक होली के गीत गाकर खुशियां मनाता है तो मुस्लिम वर्ग उसके बाद अपनी ताजियों को लाकर इमामबाड़ा स्थित चौक पर रखकर मातम करते हुए अपनी कला का प्रदर्शन करता है।
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इस खास दिन का गांव के लोग बेसब्री से इंतजार भी करते हैं। इस बात का उल्लेख बरेसर थाने के त्योहार रजिस्टर में भी दर्ज है।
उस दिन पुलिस प्रशासन सुरक्षा के खास इंतजाम करता है। थानाध्यक्ष बरेसर राजीव पांडेय ने दोनों पक्षों से शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील की।