जब जीव भक्ति की प्राप्ति करने को तैयार होता है तो माया ही बाधक होती है। जब हनुमान जी भक्ति रूपी माता सीता का पता लगाने के लिए सागर तट से प्रस्थान करते हैं तो उनको माया रूपी सतोगुणी सुरसा, तमोगुणी सिंहिका और रजोगुणी लंकिनी की बाधाओं का सामना करना पड़ा। हनुमानजी अपने बुद्धि कौशल से संसार सिंधु की उन बाधाओं से निपटते हैं। ये बातें ढ़ढनी गांव स्थित हनुमान मंदिर में चल रही संगीतमय श्रीराम कथा के तीसरे व अंतिम दिन कथावाचक चंद्रेश महाराज ने कहीं।
उन्होंने कहा कि सुरसा सतोगुणी, सिंहिका तमोगुणी तथा लंकिनी रजोगुणी माया हैं। इन तीन प्रकार की माया अर्थात वृत्तियों से साधक को कैसे निपटना चाहिए हनुमानजी ने अपने चरित्र के माध्यम से बताया है। सतोगुण का मतलब हैं व्यक्ति के अंदर पाए जाने वाला सद्गुण, दया, दान, परोपकार, शारीरिक और पवित्रता। सिंहिका का तमोगुण माया हैं। हनुमानजी उसका वध कर देते हैं। व्यक्ति के अंदर पाए जाने वाला दुर्गुण काम, क्रोध आदि विकार ही तमोगुण हैं। अत: साधक को भजन के द्वारा तमोगुणों के विकारों को नष्ट कर देना चाहिए। लंकिनी रजोगुण माया हैं। व्यक्ति का आहार तथा भोग वासना से जुड़ी हुई बुराइयां हैं जो तमोगुण से उत्पन्न होती हैं। हनुमान जी उसे अधमरा कर देते हैं अत: साधक को अपने आहार तथा भोग वासना आदि को पूरी तरह से नियंत्रित करके जीवन जीना चाहिए। सतोगुण को अपनाकर तमोगुण का विनाश करके ही भक्ति रूपा भगवती सीता की कृपा हो सकती है।