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पहचान से कारोबार तक गाजीपुर का इत्र कन्नौज से था आगे, अब एक इकाई तक नहीं
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गाजीपुर। जिले की पहचान इत्र, अफीम फैक्ट्री, सेना और यहां के क्रांतिकारियों से रही है। यहां इत्र का कारोबार कभी मुख्य व्यवसाय में शामिल था। साल 1950 में जिले में इत्र का वार्षिक कारोबार दो लाख रुपये आंका गया था। बताया जाता है कि जनपद का इत्र कन्नौज से भी बेहतर माना जाता था। ईस्ट इंडिया कंपनी के जमाने में यहां अफीम के साथ गुलाब की बड़े पैमाने पर खेती होती थी। यहां का निर्मित महाराजा ब्रांड इत्र की इंग्लैंड सहित उसके औपनिवेशिक बाजारों में बड़ी मांग थी।
जिले के कारोबारियों का कहना है कि जब गाजीपुर से इत्र की ट्रेन निकलती थी तो लोग गुलाब और केवड़ा की सुगंध से सराबोर हो जाते थे। उस समय सिटी स्टेशन के बगल में फुल्लनपुर में कई बीघे में गुलाब सहित अलग-अलग फूलों की खेती की जाती थी। इसी से उस इलाके का नाम फुल्लनपुर पड़ गया जो आज तक है।
इत्र के कारोबार से जुड़े केसरवानी परिवार के एक सदस्य लालजी केसरी ने बताया कि तीन पीढ़ियों से उनके खानदान में इत्र का कारोबार होता रहा। लेकिन अब फुल्लनपुर में फूलों की खेती नाम मात्र की रह गई है। आबादी के बढ़ते दबाव के बीच खेतों की प्लाटिंग कर आवासीय कालोनी बना दी गई। ऐसा करने से फूल की खेती के रकबे में भारी कमी आई। उपायुक्त उद्योग अजय गुप्ता का कहना है कि जिले में इत्र को लेकर कोई भी इकाई संचालित नहीं है। न ही नई पीढ़ी की ओर से इत्र के कारोबार को लेकर कोई प्रस्ताव ही आया। जिले में एक जिला एक उत्पाद के तहत जूट वॉल हैंडिंग को शामिल किया गया है। जिसको प्रोत्साहित करने के लिए प्रयास भी किया जा रहा है। इत्र उद्योग को लेकर कारोबारियों में रुझान नहीं होने से जिला प्रशासन ने भी अलग से कोई कार्ययोजना नहीं बनाई है। लेकिन इत्र कारोबार के लिए कोई आगे आना चाहता है तो एमएसएमई के तहत उसको प्रोत्साहित किया जाएगा। साथ ही कन्नौज में प्रशिक्षण की भी व्यवस्था की जा सकती है।
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इत्र कारोबार से जुड़े रहे केसरी परिवार के लालजी केसरी ने बताया कि इत्र के लिए देसी गुलाब मुफीद माना जाता है। साल 1974 में गाजीपुर में आई व्यापक बाढ़ के कारण फूल की पैदावार में काफी कमी हुई। 80 के दशक में देसी गुलाब की पैदावार कम होने की स्थिति में बनारस से फूल मंगाया जाने लगा। इससे लागत में काफी बढ़ोतरी होने लगी और कारोबार से जुड़े लोगों का मुनाफा कम होने लगा। 90 के दशक में ही परिवार के सभी लोग अपना व्यवसाय बदल लिए।
जिला उद्यान अधिकारी शैलेंद्र दुबे ने फूलों की खेती को लेकर बताया कि गेंदे की खेती के लिए विभाग की ओर से प्रति हेक्टेयर 12 हजार रुपये का अनुदान दिया जाता है। मनरेगा और नमामि गंगा उद्यान मिशन के तहत भी प्रोजेक्ट बनाकर फूलों की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। अभी जिले में करीब 100 हेक्टेयर में गेंदा की खेती हुई है। गुलाब की स्थानीय मांग न होने के कारण इसकी खेती बेहद हो रही है।
गाजीपुर में इत्र कारोबार खत्म होने को लेकर उद्योग विभाग के अधिकारियों का कहना है कि परंपरागत तरीके के साथ आधुनिक तकनीक पर जोर दिया गया होता और इस उद्योग की मार्केटिंग स्ट्रेटेजी में तब्दीली लाई गई होती तो कन्नौज की तरह आज जनपद भी इत्र कारोबार में पहचान बनाए रखता।
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जिले के कारोबारियों का कहना है कि जब गाजीपुर से इत्र की ट्रेन निकलती थी तो लोग गुलाब और केवड़ा की सुगंध से सराबोर हो जाते थे। उस समय सिटी स्टेशन के बगल में फुल्लनपुर में कई बीघे में गुलाब सहित अलग-अलग फूलों की खेती की जाती थी। इसी से उस इलाके का नाम फुल्लनपुर पड़ गया जो आज तक है।
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इत्र के कारोबार से जुड़े केसरवानी परिवार के एक सदस्य लालजी केसरी ने बताया कि तीन पीढ़ियों से उनके खानदान में इत्र का कारोबार होता रहा। लेकिन अब फुल्लनपुर में फूलों की खेती नाम मात्र की रह गई है। आबादी के बढ़ते दबाव के बीच खेतों की प्लाटिंग कर आवासीय कालोनी बना दी गई। ऐसा करने से फूल की खेती के रकबे में भारी कमी आई। उपायुक्त उद्योग अजय गुप्ता का कहना है कि जिले में इत्र को लेकर कोई भी इकाई संचालित नहीं है। न ही नई पीढ़ी की ओर से इत्र के कारोबार को लेकर कोई प्रस्ताव ही आया। जिले में एक जिला एक उत्पाद के तहत जूट वॉल हैंडिंग को शामिल किया गया है। जिसको प्रोत्साहित करने के लिए प्रयास भी किया जा रहा है। इत्र उद्योग को लेकर कारोबारियों में रुझान नहीं होने से जिला प्रशासन ने भी अलग से कोई कार्ययोजना नहीं बनाई है। लेकिन इत्र कारोबार के लिए कोई आगे आना चाहता है तो एमएसएमई के तहत उसको प्रोत्साहित किया जाएगा। साथ ही कन्नौज में प्रशिक्षण की भी व्यवस्था की जा सकती है।
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इत्र कारोबार से जुड़े रहे केसरी परिवार के लालजी केसरी ने बताया कि इत्र के लिए देसी गुलाब मुफीद माना जाता है। साल 1974 में गाजीपुर में आई व्यापक बाढ़ के कारण फूल की पैदावार में काफी कमी हुई। 80 के दशक में देसी गुलाब की पैदावार कम होने की स्थिति में बनारस से फूल मंगाया जाने लगा। इससे लागत में काफी बढ़ोतरी होने लगी और कारोबार से जुड़े लोगों का मुनाफा कम होने लगा। 90 के दशक में ही परिवार के सभी लोग अपना व्यवसाय बदल लिए।
जिला उद्यान अधिकारी शैलेंद्र दुबे ने फूलों की खेती को लेकर बताया कि गेंदे की खेती के लिए विभाग की ओर से प्रति हेक्टेयर 12 हजार रुपये का अनुदान दिया जाता है। मनरेगा और नमामि गंगा उद्यान मिशन के तहत भी प्रोजेक्ट बनाकर फूलों की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। अभी जिले में करीब 100 हेक्टेयर में गेंदा की खेती हुई है। गुलाब की स्थानीय मांग न होने के कारण इसकी खेती बेहद हो रही है।
गाजीपुर में इत्र कारोबार खत्म होने को लेकर उद्योग विभाग के अधिकारियों का कहना है कि परंपरागत तरीके के साथ आधुनिक तकनीक पर जोर दिया गया होता और इस उद्योग की मार्केटिंग स्ट्रेटेजी में तब्दीली लाई गई होती तो कन्नौज की तरह आज जनपद भी इत्र कारोबार में पहचान बनाए रखता।