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मुकुट पूजन के साथ हरिशंकरी की रामलीला शुरू
ब्यूरो/अमर उजाला/गाजीपुर
Updated Fri, 09 Oct 2015 11:43 PM IST
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अति प्राचीन रामलीला कमेटी हरिशंकरी की ओर से गुरुवार की देर शाम मुकुट पूजन के साथ श्रीरामलीला का शुभारंभ हुआ। हरिशंकरी स्थित श्रीराम चबूतरे पर धनुष एवं मुकुट पूजन के बाद नारद मोह प्रसंग पर लीला हुई।
मुकुट पूजन के दौरान रामलीला कमेटी के अध्यक्ष दीनानाथ गुप्ता, कोषाध्यक्ष अभय अग्रवाल, लक्ष्मी नारायण, मंत्री ओमप्रकाश तिवारी, प्रबंधक जैमिनी दत्त त्रिवेदी, अशोक अग्रवाल, डा. यूसी राय, विनय सिंह, रामसबद सिंह, श्रीप्रकाश
सिंह, योगेश वर्मा ने आरती की। इसके बाद नारद मोह का मंचन किया गया। कामदेव पर विजय के बाद देवर्षि नारद को अभिमान हो गया। उन्होंने ब्रह्म, विष्णु और महेश से कहा कि उनको कोई मोह माया में फंसा नहीं सकता। यह सुन
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विष्णु जी ने मायापुरी नगर का निर्माण किया। वहां के राजा शीलनिधि ने पुत्री विश्वमोहिनी का स्वयंवर रचाया। वहां पहुंचे नारद से राजा शीलनिधि ने पुत्री का भाग्य बताने के लिए कहा। नारद विश्वमोहिनी पर मोहित होते हैं और विष्णु
लोक में जाकर भगवान विष्णु से अपना रूप देने के लिए आग्रह करते हैं। भगवान विष्णु ने अपने रूप के बजाय नारद को बंदर का रूप दे दिया। इसी रूप में नारद फिर मायापुरी नगरी में पहुंचे। उन्होंने सोचा कि विश्वमोहिनी उनके गले
में जयमाला डालेगी लेकिन ठीक इसका उल्टा हुआ और भगवान विष्णु खुद वहां जाकर अपने गले जयमाला डलवाकर अपने धाम चले गए। नारद को जब पता चला कि विष्णु ने उनका चेहरा बंदर का बना दिया है तो उन्होंने विष्णु जी को शाप दिया। यह दृश्य देख दर्शक भावविभोर हो गए।
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मुकुट पूजन के दौरान रामलीला कमेटी के अध्यक्ष दीनानाथ गुप्ता, कोषाध्यक्ष अभय अग्रवाल, लक्ष्मी नारायण, मंत्री ओमप्रकाश तिवारी, प्रबंधक जैमिनी दत्त त्रिवेदी, अशोक अग्रवाल, डा. यूसी राय, विनय सिंह, रामसबद सिंह, श्रीप्रकाश
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सिंह, योगेश वर्मा ने आरती की। इसके बाद नारद मोह का मंचन किया गया। कामदेव पर विजय के बाद देवर्षि नारद को अभिमान हो गया। उन्होंने ब्रह्म, विष्णु और महेश से कहा कि उनको कोई मोह माया में फंसा नहीं सकता। यह सुन
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विष्णु जी ने मायापुरी नगर का निर्माण किया। वहां के राजा शीलनिधि ने पुत्री विश्वमोहिनी का स्वयंवर रचाया। वहां पहुंचे नारद से राजा शीलनिधि ने पुत्री का भाग्य बताने के लिए कहा। नारद विश्वमोहिनी पर मोहित होते हैं और विष्णु
लोक में जाकर भगवान विष्णु से अपना रूप देने के लिए आग्रह करते हैं। भगवान विष्णु ने अपने रूप के बजाय नारद को बंदर का रूप दे दिया। इसी रूप में नारद फिर मायापुरी नगरी में पहुंचे। उन्होंने सोचा कि विश्वमोहिनी उनके गले
में जयमाला डालेगी लेकिन ठीक इसका उल्टा हुआ और भगवान विष्णु खुद वहां जाकर अपने गले जयमाला डलवाकर अपने धाम चले गए। नारद को जब पता चला कि विष्णु ने उनका चेहरा बंदर का बना दिया है तो उन्होंने विष्णु जी को शाप दिया। यह दृश्य देख दर्शक भावविभोर हो गए।