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महापर्व के रूप में मनाया जाता है डाला छठ
Ghazipur
Updated Fri, 16 Nov 2012 12:00 PM IST
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गहमर। दीपावली पर्व के समाप्त होते ही जनमानस द्वारा डाला छठ की तैयारी शुरू कर दी जाती है। गंगा घाट की सफाई से लेकर घाटों पर वेदी बनाने का कार्य एवं अपनी जगह पक्की करने का कार्य महिलाओं और बच्चाें द्वारा शुरू कर दिया जाता है। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष के चतुर्थी तिथि को लौकी भात और नहाय खाय से प्रारंभ होकर सप्तमी तिथि को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने तक चलने वाले इस व्रत का प्रत्येक दिनों में अलग महत्व होता है।
पहला दिन- इस पर्व के पहले दिन को नहाया खाय या लौकी भात के नाम से मनाया जाता है। इस दिन व्रती सुबह उठ कर गंगा या अन्य नदियों में स्नान करके घर में अरवा चावल के साथ लौकी की सब्जी बनाती हैं और सर्व प्रथम वह उस भोजन को करती हैं। इसके बाद ही परिवार के अन्य सदस्य भोजन करते हैं। इस प्रकार हल्की साधना से शुरू होता है यह पर्व।
दूसरा दिन- इस दिन का एक विशेष महत्व होता है आज के दिन व्रती दिन भर निराजल उपवास करती हैं और शाम को केले के पत्ते पर छठ मइया की पूजा करती हैं। इसके साथ ही पूड़ी एवं खीर का सेवन करती हैं। इस दिन के भोजन की सबसे विशेष बात यह होती है कि अगर व्रती के भोजन करते समय किसी व्रती का नाम लेकर अथवा उसे संबोधन करते हुए आवाज लगा दी तो व्रती खाना छोड़ देगी। भले ही वह एक निवाला भी ना खा पायी हो। आज पंचमी तिथि के बाद वह सप्तमी तिथि को उगते हुए सूर्य के आराधना के बाद ही अन्न जल ग्रहण करती है। तीसरा दिन - आज के दिन सिर पर डाल दौरा लिए हुए लोग जलाशयों के किनारे जाते हैं, बच्चों में एक विशेष उत्साह होता है। आज के दिन व्रती हाथ में फलों एवं नारियल से भरे सूप को लेकर कमर भर जल में खड़ी होकर अस्ताचलगामी सूर्य की पूजा करती हैं। सूर्य के अस्त होने के साथ वह उनको अर्घ्य प्रदान कर अपने घर आ जाती हैं।
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चौथा एंव अंतिम दिन - आज महापर्व का अंतिम दिन होता है, आज के दिन व्रती उदय होते सूर्य की पूजा के साथ अपना उपवास समाप्त करती हैं। हाथ में सूर्य सूप एंव डाला लिये हुए व्रती जल में खड़ी होकर सूर्य पूजा करती हैं। सूर्य के उदय के साथ उनको दूध का अर्घ्य प्रदान करने के साथ वह अपना व्रत समाप्त करती हैं। महापर्व छठ के प्रारम्भ होने के विषय में कहा जाता है कि द्रौपदी ने महाभारत के समय पांडवाें की रक्षा के लिये सूर्य का पूजन किया था, जिससे पांडवों की जीत हुई थी। वहीं कुछ लोग इसे सूर्य के पुत्र कर्ण से जोड़ कर देखते हैं। बिहार के मिथिला प्रदेश से प्रारंभ होकर यह उत्तर प्रदेश दिल्ली एवं महाराष्ट्र तक पहुंच गया हैँ।
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पहला दिन- इस पर्व के पहले दिन को नहाया खाय या लौकी भात के नाम से मनाया जाता है। इस दिन व्रती सुबह उठ कर गंगा या अन्य नदियों में स्नान करके घर में अरवा चावल के साथ लौकी की सब्जी बनाती हैं और सर्व प्रथम वह उस भोजन को करती हैं। इसके बाद ही परिवार के अन्य सदस्य भोजन करते हैं। इस प्रकार हल्की साधना से शुरू होता है यह पर्व।
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दूसरा दिन- इस दिन का एक विशेष महत्व होता है आज के दिन व्रती दिन भर निराजल उपवास करती हैं और शाम को केले के पत्ते पर छठ मइया की पूजा करती हैं। इसके साथ ही पूड़ी एवं खीर का सेवन करती हैं। इस दिन के भोजन की सबसे विशेष बात यह होती है कि अगर व्रती के भोजन करते समय किसी व्रती का नाम लेकर अथवा उसे संबोधन करते हुए आवाज लगा दी तो व्रती खाना छोड़ देगी। भले ही वह एक निवाला भी ना खा पायी हो। आज पंचमी तिथि के बाद वह सप्तमी तिथि को उगते हुए सूर्य के आराधना के बाद ही अन्न जल ग्रहण करती है। तीसरा दिन - आज के दिन सिर पर डाल दौरा लिए हुए लोग जलाशयों के किनारे जाते हैं, बच्चों में एक विशेष उत्साह होता है। आज के दिन व्रती हाथ में फलों एवं नारियल से भरे सूप को लेकर कमर भर जल में खड़ी होकर अस्ताचलगामी सूर्य की पूजा करती हैं। सूर्य के अस्त होने के साथ वह उनको अर्घ्य प्रदान कर अपने घर आ जाती हैं।
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चौथा एंव अंतिम दिन - आज महापर्व का अंतिम दिन होता है, आज के दिन व्रती उदय होते सूर्य की पूजा के साथ अपना उपवास समाप्त करती हैं। हाथ में सूर्य सूप एंव डाला लिये हुए व्रती जल में खड़ी होकर सूर्य पूजा करती हैं। सूर्य के उदय के साथ उनको दूध का अर्घ्य प्रदान करने के साथ वह अपना व्रत समाप्त करती हैं। महापर्व छठ के प्रारम्भ होने के विषय में कहा जाता है कि द्रौपदी ने महाभारत के समय पांडवाें की रक्षा के लिये सूर्य का पूजन किया था, जिससे पांडवों की जीत हुई थी। वहीं कुछ लोग इसे सूर्य के पुत्र कर्ण से जोड़ कर देखते हैं। बिहार के मिथिला प्रदेश से प्रारंभ होकर यह उत्तर प्रदेश दिल्ली एवं महाराष्ट्र तक पहुंच गया हैँ।