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सीता स्वयंवर का प्रसंग देख मुग्ध हुए लोग
गाजीपुर
Updated Mon, 08 Oct 2018 11:37 PM IST
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रामलीला
गाजीपुर। सीता स्वयंवर में बड़े वीर जब प्राचीन शिव धनुष को हिला भी नहीं पाए तो यह देख राजा जनक शोक करने लगे। उन्होंने बड़ी मायूसी से कहा कि लगता है कि इस धरती पर धनुष को खंडित करने वाला कोई वीर नहीं बचा है। दूरदराज से आए राजाओं को उन्होंने कहा कि तजहू आस निज-निज गृह जाहूं, लिखा ना विधि वैदेही विवाहू। शहर के हरिशंकरी स्थित रामचबूतरा पर चल रही अति प्राचीन रामलीला में रविवार को यह दृश्य देखकर दर्शक भाव विह्वल हो गए। सीता स्वयंवर से लक्ष्मण परशुराम संवाद तक सभी प्रसंगों पर उपस्थित लोग तालियां बजाते रहे।
अगले प्रसंग में गुरु विश्वामित्र से आज्ञा लेकर राम धनुष के पास पहुंचे तथा उसे एक ही झटके में उठा लिया और प्रत्यंचा चढ़ाते ही धनुष टूट गया। इसके बाद जनक नंदिनी सीता वरमाला पहना देती हैं। देवता पुष्प वर्षा करने लगते हैं। उधर, धनुष टूटने की आवाज पर भगवान परशुराम की तंद्रा भंग हो जाती है। उन्हें शिव धनुष टूटने का आभास हो जाता है। वह स्वयंवर में पहुंच जाते हैं। क्रोधित होकर राजा जनक से पूछते हैं कि हमारे आराध्यदेव शिवजी के धनुष को किसने तोड़ा है। उनका गुस्सा बढ़ते देख बीच में लक्ष्मण जी आ जाते हैं। कहा कि हे मुनि इस पुराने धनुष के टूटने पर आपको इतना क्रोध कैसे हो गया, हमने तो ऐसे-ऐसे धनुष खेल ही में तोड़ डाला, लेकिन आपने कभी क्रोध नहीं किया। परशुराम और लक्ष्मण जी के संवाद पर उपस्थित लोग तालियां बजाते रहे। बाद में भगवान राम, परशुराम जी के गुस्से को शांत करते हैं। इधर परशुराम जी ने अपने तप बल से ध्यान लगाकर देखा कि श्रीराम वास्तव में विष्णु का रुप हैं। वह कहते हैं कि राम रमा पति कर धनु लेहू, खिचहू चाप मिटहि संदेहू। संदेह दूर हो जाने पर परशुराम जी भगवान को प्रणाम करके अपने धाम के लिए प्रस्थान कर देते हैं। इस मौके पर दीनानाथ गुप्ता, उपाध्यक्ष प्रकाशचंद्र श्रीवास्तव, मंत्री ओमप्रकाश तिवारी बच्चा, उपमंत्री लवकुमार त्रिवेदी उर्फ बड़े महाराज, विरेशराम वर्मा, शिवपूजन तिवारी, कृष्ण बिहारी त्रिवेदी ने सराहनीय भूमिका निभाई।
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अगले प्रसंग में गुरु विश्वामित्र से आज्ञा लेकर राम धनुष के पास पहुंचे तथा उसे एक ही झटके में उठा लिया और प्रत्यंचा चढ़ाते ही धनुष टूट गया। इसके बाद जनक नंदिनी सीता वरमाला पहना देती हैं। देवता पुष्प वर्षा करने लगते हैं। उधर, धनुष टूटने की आवाज पर भगवान परशुराम की तंद्रा भंग हो जाती है। उन्हें शिव धनुष टूटने का आभास हो जाता है। वह स्वयंवर में पहुंच जाते हैं। क्रोधित होकर राजा जनक से पूछते हैं कि हमारे आराध्यदेव शिवजी के धनुष को किसने तोड़ा है। उनका गुस्सा बढ़ते देख बीच में लक्ष्मण जी आ जाते हैं। कहा कि हे मुनि इस पुराने धनुष के टूटने पर आपको इतना क्रोध कैसे हो गया, हमने तो ऐसे-ऐसे धनुष खेल ही में तोड़ डाला, लेकिन आपने कभी क्रोध नहीं किया। परशुराम और लक्ष्मण जी के संवाद पर उपस्थित लोग तालियां बजाते रहे। बाद में भगवान राम, परशुराम जी के गुस्से को शांत करते हैं। इधर परशुराम जी ने अपने तप बल से ध्यान लगाकर देखा कि श्रीराम वास्तव में विष्णु का रुप हैं। वह कहते हैं कि राम रमा पति कर धनु लेहू, खिचहू चाप मिटहि संदेहू। संदेह दूर हो जाने पर परशुराम जी भगवान को प्रणाम करके अपने धाम के लिए प्रस्थान कर देते हैं। इस मौके पर दीनानाथ गुप्ता, उपाध्यक्ष प्रकाशचंद्र श्रीवास्तव, मंत्री ओमप्रकाश तिवारी बच्चा, उपमंत्री लवकुमार त्रिवेदी उर्फ बड़े महाराज, विरेशराम वर्मा, शिवपूजन तिवारी, कृष्ण बिहारी त्रिवेदी ने सराहनीय भूमिका निभाई।
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