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मोह का क्षय होना ही मुक्ति की पहचान
Updated Mon, 05 Nov 2018 11:41 PM IST
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मतसा। राम जानकी मंदिर गरूआ मकसूदपुर के प्रांगण में चल रहे भागवत कथा में रविवार को संत श्री रामदास फलाहारी बाबा ने कहा कि विद्या और ज्ञान का फल भोग नहीं होना चाहिए, बल्कि ज्ञान का उपयोग भगवान को पाने के लिए होना चाहिए। आज लोगों के जीवन में पैसा प्रमुख हो गया है और यहीं कारण है कि हर तरफ पाप की बढ़ोतरी होती जा रही है। जिसने अपने जीवन में पैसा गौड़ कर लिया और परमात्मा प्राप्ति को मुख्य ध्येय बना लिया उसे तो सुख के साथ-साथ शांति भी मिलेगी।
फलाहारी बाबा ने कहा कि पत्नी और मित्र की परीक्षा, सुख तथा संपत्ति में नहीं लिया जा सकता। उनकी असली पहचान दु:ख और विपत्ति में होती है। पत्नी के लिए पति सबसे बड़ी संपत्ति तथा परमात्मा का रूप होता है। पति के लिए भी पत्नी शक्ति स्वरूपा तथा परमात्मा की दी हुई अनमोल उपहार होती है। कहा कि पति और पत्नी जब एकांत में बैठे तो केवल काम की चर्चा न करें। अगर वह आपस में थोड़ा भी सत्संग करें तो जीवन स्वर्ग बन जाता है। परमात्मा जीवात्मा के साथ नि:स्वार्थ प्रेम करता है। जीव को भी अपना जीवन परमार्थमय बनाना चाहिए। परमार्थ करने पर स्वार्थ की सिद्धि करनी नहीं पड़ती, स्वार्थ तो स्वयं सिद्ध हो जाया करता है। लोभ ही पाप का बाप है। लोभ से सारे पाप जन्म लेते हैं। पैसा के लिए प्रयास करना चाहिए परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि इसके लिए पाप न किया जाय। पाप से कमाई हुई संपत्ति सुखी तो कर सकती है पर सुकून और शांति नहीं देती है। पुत्र को संपत्तिवान नहीं संस्कारवान बनाने का प्रयास करना चाहिए। भगवत कथा जीवो के उद्धार करने की सर्वोत्तम साधन है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य आवागमन के चक्कर से रहित होना, भव रूपसी सागर को पार करना, जन्म मृत्यु के दुख से परे होना है। मोह का क्षय होना ही मुक्ति की पहचान है।
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फलाहारी बाबा ने कहा कि पत्नी और मित्र की परीक्षा, सुख तथा संपत्ति में नहीं लिया जा सकता। उनकी असली पहचान दु:ख और विपत्ति में होती है। पत्नी के लिए पति सबसे बड़ी संपत्ति तथा परमात्मा का रूप होता है। पति के लिए भी पत्नी शक्ति स्वरूपा तथा परमात्मा की दी हुई अनमोल उपहार होती है। कहा कि पति और पत्नी जब एकांत में बैठे तो केवल काम की चर्चा न करें। अगर वह आपस में थोड़ा भी सत्संग करें तो जीवन स्वर्ग बन जाता है। परमात्मा जीवात्मा के साथ नि:स्वार्थ प्रेम करता है। जीव को भी अपना जीवन परमार्थमय बनाना चाहिए। परमार्थ करने पर स्वार्थ की सिद्धि करनी नहीं पड़ती, स्वार्थ तो स्वयं सिद्ध हो जाया करता है। लोभ ही पाप का बाप है। लोभ से सारे पाप जन्म लेते हैं। पैसा के लिए प्रयास करना चाहिए परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि इसके लिए पाप न किया जाय। पाप से कमाई हुई संपत्ति सुखी तो कर सकती है पर सुकून और शांति नहीं देती है। पुत्र को संपत्तिवान नहीं संस्कारवान बनाने का प्रयास करना चाहिए। भगवत कथा जीवो के उद्धार करने की सर्वोत्तम साधन है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य आवागमन के चक्कर से रहित होना, भव रूपसी सागर को पार करना, जन्म मृत्यु के दुख से परे होना है। मोह का क्षय होना ही मुक्ति की पहचान है।
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