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जीवन को संकट में डाल रहा जल प्रदूषण
Updated Fri, 01 Jun 2018 10:55 PM IST
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गाजीपुर। जिले में बढ़ता जल प्रदूषण जीवन के लिए खतरे की घंटी बजा रहा है। ध्वनि प्रदूषण का मानक अभी नियंत्रित है, लेकिन एसी के बढ़ते प्रचलन से वायु प्रदूषण मानव जीवन के लिए खतरा बन गया है। सिमटती नदियां, सूखते जलाशय, हैँडपंपों में आर्सेनिक का प्रभाव, गंदे नालों का नदियों में गिरना और कूड़े -कचरे के निस्तारण की व्यवस्था न होना प्रदूषण को तेजी से बढ़ावा दे रहा है। नालों का गंदा पानी जनपद के हिस्से में आठ स्थानों पर गंगा नदी में जाकर मिलता है और पतित पावनी गंगा को दूषित गंगा में बदल देता है। ध्वनि और वायु प्रदूषण जिले में खतरे की घंटी भले ही न बजाए, लेकिन जल प्रदूषण लोगों के लिए खतरा बनता जा रहा है। गंगा नदी के साथ सहायक नदियां, पोखरे, तालाब सूखते जा रहे हैं। जलीय जीव नदी के दूषित एवं जहरीले पानी में रहने से काल के गाल में समा रहे हैं।
पर्यावरणविदों तथा चिकित्सकों की राय माने तो जिले में जल प्रदूषण की स्थिति खतरे की सीमा से ऊपर है। जबकि वायु प्रदूषण दूसरे नंबर पर है और ध्वनि प्रदूषण से जनपदवासियों को फिलहाल कोई खतरा नहीं है। जल प्रदूषण की बात करें तो गंगा नदी का जलस्तर दिनों-दिन नीचे खिसकता जा रहा है। शहर के नाले सीधे नदी में गिर रहे हैँ। जिससे पानी दूषित हो गया है। वरिष्ठ फिजिशियन डा. नेसार अहमद ने बताया कि जिले के एक तिहाई हिस्से में आर्सेनिक का असर होने से लोग तरह-तरह की बीमारियों की जद में आ रहे हैँ। लोगों में स्किन संबंधी रोग बढ़ रहे हैं। यही हाल वायु प्रदूषण का है। धूल और धुआं से दिनों-दिन सांस और दमा के मरीजों में इजाफा हुआ है। पहले की अपेक्षा इनकी संख्या में बढ़ती जा रही है।
पीजी कॉलेज के पर्यावरणविद डा. पीके मिश्रा की माने तो जिले में सबसे बड़ी समस्या कूड़े-कचरे का निस्तारण है। इनका निस्तारण न होने से इसके रासायनिक तत्वों का असर भू- जल पर पड़ता है, जो स्वास्थ्य के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक साबित होते हैँ। वायु प्रदूषण भी स्वास्थ्य के लिए कम खतरनाक नहीं हैं। इसमें अहम भूमिका निभा रहा है एसी का प्रचलन। इससे निकलने वाली गैस स्वास्थ्य को भी हानि पहुंचाती है। एसी से क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस निकलती है। यह धरती से 20 किमी ऊपर ओजोन परत को नष्ट करने का काम करती है। ऐसा होने से सूरज से निकलने वाली अल्ट्रा वायलेट किरणें सीधे धरती पर पड़ती हैं और जिससे लोगों को स्किन कैंसर तक का खतरा रहता है। वायु प्रदूषण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कई साल पहले आदेश दिया था कि ईंट भट्ठे पर इस तरह की चिमनियां बनाई जाए, जिससे सफेद धुंए निकले, लेकिन सभी चिमनियों से आज भी काले धुएं ही निकलते हैँ। यही हाल खटारा वाहनों का है। ध्वनि प्रदूषण का मानक जिले में ठीक है। 45 डेसीबल तक का मानक है, लेकिन घनी आबादी, रेलवे स्टेशन तथा बस स्टैंडों पर 45 से 55 डेसीबल तक कुछ समय के लिए पहुंच जाता है। लेकिन इसका असर अभी आम जनजीवन पर नहीं है।
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पर्यावरणविदों तथा चिकित्सकों की राय माने तो जिले में जल प्रदूषण की स्थिति खतरे की सीमा से ऊपर है। जबकि वायु प्रदूषण दूसरे नंबर पर है और ध्वनि प्रदूषण से जनपदवासियों को फिलहाल कोई खतरा नहीं है। जल प्रदूषण की बात करें तो गंगा नदी का जलस्तर दिनों-दिन नीचे खिसकता जा रहा है। शहर के नाले सीधे नदी में गिर रहे हैँ। जिससे पानी दूषित हो गया है। वरिष्ठ फिजिशियन डा. नेसार अहमद ने बताया कि जिले के एक तिहाई हिस्से में आर्सेनिक का असर होने से लोग तरह-तरह की बीमारियों की जद में आ रहे हैँ। लोगों में स्किन संबंधी रोग बढ़ रहे हैं। यही हाल वायु प्रदूषण का है। धूल और धुआं से दिनों-दिन सांस और दमा के मरीजों में इजाफा हुआ है। पहले की अपेक्षा इनकी संख्या में बढ़ती जा रही है।
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पीजी कॉलेज के पर्यावरणविद डा. पीके मिश्रा की माने तो जिले में सबसे बड़ी समस्या कूड़े-कचरे का निस्तारण है। इनका निस्तारण न होने से इसके रासायनिक तत्वों का असर भू- जल पर पड़ता है, जो स्वास्थ्य के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक साबित होते हैँ। वायु प्रदूषण भी स्वास्थ्य के लिए कम खतरनाक नहीं हैं। इसमें अहम भूमिका निभा रहा है एसी का प्रचलन। इससे निकलने वाली गैस स्वास्थ्य को भी हानि पहुंचाती है। एसी से क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस निकलती है। यह धरती से 20 किमी ऊपर ओजोन परत को नष्ट करने का काम करती है। ऐसा होने से सूरज से निकलने वाली अल्ट्रा वायलेट किरणें सीधे धरती पर पड़ती हैं और जिससे लोगों को स्किन कैंसर तक का खतरा रहता है। वायु प्रदूषण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कई साल पहले आदेश दिया था कि ईंट भट्ठे पर इस तरह की चिमनियां बनाई जाए, जिससे सफेद धुंए निकले, लेकिन सभी चिमनियों से आज भी काले धुएं ही निकलते हैँ। यही हाल खटारा वाहनों का है। ध्वनि प्रदूषण का मानक जिले में ठीक है। 45 डेसीबल तक का मानक है, लेकिन घनी आबादी, रेलवे स्टेशन तथा बस स्टैंडों पर 45 से 55 डेसीबल तक कुछ समय के लिए पहुंच जाता है। लेकिन इसका असर अभी आम जनजीवन पर नहीं है।
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