{"_id":"111-25074","slug":"Ghaziabad-25074-111","type":"story","status":"publish","title_hn":"‘जिला गाजियाबाद’ का धमाका","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
‘जिला गाजियाबाद’ का धमाका
Ghaziabad
Updated Sat, 23 Feb 2013 05:30 AM IST
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गाजियाबाद। विवादों के बाद पर्दे पर पहुंची ‘जिला गाजियाबाद’ ने पहले ही दिन धमाका कर डाला। शहर में मौजूद तीनों मल्टीप्लेक्स के सातों शो हाउसफुल रहे। दर्शकों में सबसे ज्यादा संख्या युवाओं की रही। कॉलेज बंक करके फिल्म देखने पहुंचे स्टूडेंट्स भी सैकड़ों की संख्या में थे। दर्शकों ने बताया कि फिल्म बेहद शानदार थी। उन्हें कहीं कुछ विवादास्पद नहीं लगा।
90 के दशक की गैंगवार
a जमीन पर कब्जे को लेकर हुई थी गैंगवार
a गैंगवार काबू करने भेजे गए थे इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह
a 5 नवंबर 1998 को हुआ था प्रीतम सिंह का मर्डर
ये है रियल ‘जिला गाजियाबाद’
रील लाइफ की ‘जिला गाजियाबाद’ रिलीज हो चुकी है। जिस घटना को लेकर फिल्म बनाई गई है, उसकी शुरूआत 90 के दशक में हुई गैंगवार से होती है। इसके मुख्य किरदार थे सतबीर गुर्जर और महेंद्र फौजी। सतबीर ने एलएलबी की थी और महेंद्र फौज से रिटायर्ड था। दोनों ही लोनी के मेवला भट्ठी गांव के रहने वाले थे। पहले दोनों एक ही ग्रुप में थे। बाद में वर्चस्व की जंग ने दोनों को अलग-अलग कर दिया। दोनों ने अपने गैंग बनाए और फिर शुरू हुई खूनी गैंगवार। इसमें कई लाशें बिछीं और रंजिश बढ़ती चली गई। इसी गैंगवार को रोकने के लिए इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह को गाजियाबाद भेजा गया था। इसके कुछ समय बाद ये दावा किया गया कि दोनों को अलग-अलग समय में एनकाउंटर में मार गिराया गया।
सुुपारी देकर इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह की हत्या
गैंगवार का खात्मा करने वाले इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह की पांच नवंबर 1998 को कविनगर में उनके गेट पर सुबह सात बजे हत्या कर दी गई थी। एके-47 और 9 एमएम की पिस्टलों से गोलियां बरसाई थीं। प्रीतम सिंह उस वक्त मुरादाबाद में तैनात थे और घर आए हुए थे। प्रीतम सिंह बिजनौर जिले के रहने वाले थे। इस केस में चार लोग नामजद थे। 13 फरवरी 1999 को दिल्ली पुलिस ने चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर खुलासा किया था। इनमें मुख्य आरोपी रजनी कुख्यात श्रीप्रकाश शुक्ला गैंग का सदस्य था। पुलिस ने खुलासा किया था प्रीतम सिंह की हत्या 15 लाख रुपये सुपारी देकर कराई गई थी। हत्याकांड में कई रसूखदार लोगों के नाम भी सामने आए थे।
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पहले भी बनी है फिल्म
बताते हैं कि सुपारी किलर श्रीप्रकाश शुक्ला का एनकाउंटर भी गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में 22 सितंबर 1998 में किया था। इस पर 2005 में ‘सहर’ फिल्म बनी थी।
फैमिली को मलाल
प्रीतम सिंह का परिवार गाजियाबाद में रहता है। प्रीतम सिंह की पत्नी नीरू ने बताया कि उनकी जानकारी में आया है कि ‘जिला गाजियाबाद’ फिल्म की कहानी उनके पति के इर्द-गिर्द बुनी गई है। इस बात की तकलीफ है कि फिल्म के डायरेक्टर, प्रोड्यूसर या स्क्रिप्ट राइटर ने उनसे कोई संपर्क नहीं साधा। फिलहाल उनका किसी तरह के विरोध या एक्शन लेने का इरादा नहीं है।
थोड़ा इधर, थोड़ा उधर से
नाम से ही अंदाजा लग गया था कि यह फिल्म विशुद्ध रूप से बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रखकर बनाई गई है। दो गुज्जर गैंग्स के खूंरेजी टकराव के बीच एक पुलिस इंस्पेक्टर की हीरोगीरी। लंबी-चौड़ी स्टारकास्ट और कई किस्म के मसाले। लेकिन फिल्म जिला गाजियाबाद में ऐसा कुछ भी नहीं है कि कोई विवाद खड़ा हो। फिल्म में फौजी, सतबीर गुज्जर और प्रीतम सिंह जैसे कुछ नाम अवश्य आभास देते हैं कि यह रियल कहानी पर बनी फिल्म है, परंतु यह सच नहीं है। सच तो यह है कि जिला गाजियाबाद में पिछली कुछ हिट और चर्चित गैंगस्टर और पुलिसिया फिल्मों की छाया है। इस फिल्म को बिना किसी संकोच के ओमकारा, दबंग, सिंघम और राउडी राठौर की कॉकटेल भी कहा जा सकता है। कुल मिलाकर यही कि टाइटल के अलावा इस फिल्म का संबंध किसी भी मामले में गाजियाबाद से नहीं है। कुछ दृश्यों को छोड़ दें, तो इसकी ज्यादातर शूटिंग महाराष्ट्र के वाई शहर में हुई है। जिला गाजियाबाद में दो गुर्जर गैंग्स के टकराव की कहानी है। एक गैंग है फौजी का और दूसरा सतबीर गुज्जर का। जब इन दोनों गैंग्स की आपसी लड़ाई जिले के आम निवासियों के लिए मुसीबत बन जाती है, तो एंट्री होती है इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह की। प्रीतम सिंह कूटनीतिक तरीके से दोनों गैंग्स का खात्मा करता है। फिल्म में गोलीबारी के लिए तो पर्याप्त जगह है ही, आइटम सॉग्स के लिए भी स्पेस है। फिल्म से न तो पुलिस की छवि पर कोई असर पड़ना है और न ही जिला गाजियाबाद की कोई बदनामी होनी है। निर्देशन की बात करें, तो आनंद का काम औसत है। अदाकारों के अभिनय में भी संजीदगी नहीं है। संजय दत्त और अरशद वारसी ने बतौर एक्टर अपनी नई इमेज बनाने की कोशिश की है।
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90 के दशक की गैंगवार
a जमीन पर कब्जे को लेकर हुई थी गैंगवार
a गैंगवार काबू करने भेजे गए थे इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह
a 5 नवंबर 1998 को हुआ था प्रीतम सिंह का मर्डर
ये है रियल ‘जिला गाजियाबाद’
रील लाइफ की ‘जिला गाजियाबाद’ रिलीज हो चुकी है। जिस घटना को लेकर फिल्म बनाई गई है, उसकी शुरूआत 90 के दशक में हुई गैंगवार से होती है। इसके मुख्य किरदार थे सतबीर गुर्जर और महेंद्र फौजी। सतबीर ने एलएलबी की थी और महेंद्र फौज से रिटायर्ड था। दोनों ही लोनी के मेवला भट्ठी गांव के रहने वाले थे। पहले दोनों एक ही ग्रुप में थे। बाद में वर्चस्व की जंग ने दोनों को अलग-अलग कर दिया। दोनों ने अपने गैंग बनाए और फिर शुरू हुई खूनी गैंगवार। इसमें कई लाशें बिछीं और रंजिश बढ़ती चली गई। इसी गैंगवार को रोकने के लिए इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह को गाजियाबाद भेजा गया था। इसके कुछ समय बाद ये दावा किया गया कि दोनों को अलग-अलग समय में एनकाउंटर में मार गिराया गया।
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सुुपारी देकर इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह की हत्या
गैंगवार का खात्मा करने वाले इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह की पांच नवंबर 1998 को कविनगर में उनके गेट पर सुबह सात बजे हत्या कर दी गई थी। एके-47 और 9 एमएम की पिस्टलों से गोलियां बरसाई थीं। प्रीतम सिंह उस वक्त मुरादाबाद में तैनात थे और घर आए हुए थे। प्रीतम सिंह बिजनौर जिले के रहने वाले थे। इस केस में चार लोग नामजद थे। 13 फरवरी 1999 को दिल्ली पुलिस ने चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर खुलासा किया था। इनमें मुख्य आरोपी रजनी कुख्यात श्रीप्रकाश शुक्ला गैंग का सदस्य था। पुलिस ने खुलासा किया था प्रीतम सिंह की हत्या 15 लाख रुपये सुपारी देकर कराई गई थी। हत्याकांड में कई रसूखदार लोगों के नाम भी सामने आए थे।
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पहले भी बनी है फिल्म
बताते हैं कि सुपारी किलर श्रीप्रकाश शुक्ला का एनकाउंटर भी गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में 22 सितंबर 1998 में किया था। इस पर 2005 में ‘सहर’ फिल्म बनी थी।
फैमिली को मलाल
प्रीतम सिंह का परिवार गाजियाबाद में रहता है। प्रीतम सिंह की पत्नी नीरू ने बताया कि उनकी जानकारी में आया है कि ‘जिला गाजियाबाद’ फिल्म की कहानी उनके पति के इर्द-गिर्द बुनी गई है। इस बात की तकलीफ है कि फिल्म के डायरेक्टर, प्रोड्यूसर या स्क्रिप्ट राइटर ने उनसे कोई संपर्क नहीं साधा। फिलहाल उनका किसी तरह के विरोध या एक्शन लेने का इरादा नहीं है।
थोड़ा इधर, थोड़ा उधर से
नाम से ही अंदाजा लग गया था कि यह फिल्म विशुद्ध रूप से बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रखकर बनाई गई है। दो गुज्जर गैंग्स के खूंरेजी टकराव के बीच एक पुलिस इंस्पेक्टर की हीरोगीरी। लंबी-चौड़ी स्टारकास्ट और कई किस्म के मसाले। लेकिन फिल्म जिला गाजियाबाद में ऐसा कुछ भी नहीं है कि कोई विवाद खड़ा हो। फिल्म में फौजी, सतबीर गुज्जर और प्रीतम सिंह जैसे कुछ नाम अवश्य आभास देते हैं कि यह रियल कहानी पर बनी फिल्म है, परंतु यह सच नहीं है। सच तो यह है कि जिला गाजियाबाद में पिछली कुछ हिट और चर्चित गैंगस्टर और पुलिसिया फिल्मों की छाया है। इस फिल्म को बिना किसी संकोच के ओमकारा, दबंग, सिंघम और राउडी राठौर की कॉकटेल भी कहा जा सकता है। कुल मिलाकर यही कि टाइटल के अलावा इस फिल्म का संबंध किसी भी मामले में गाजियाबाद से नहीं है। कुछ दृश्यों को छोड़ दें, तो इसकी ज्यादातर शूटिंग महाराष्ट्र के वाई शहर में हुई है। जिला गाजियाबाद में दो गुर्जर गैंग्स के टकराव की कहानी है। एक गैंग है फौजी का और दूसरा सतबीर गुज्जर का। जब इन दोनों गैंग्स की आपसी लड़ाई जिले के आम निवासियों के लिए मुसीबत बन जाती है, तो एंट्री होती है इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह की। प्रीतम सिंह कूटनीतिक तरीके से दोनों गैंग्स का खात्मा करता है। फिल्म में गोलीबारी के लिए तो पर्याप्त जगह है ही, आइटम सॉग्स के लिए भी स्पेस है। फिल्म से न तो पुलिस की छवि पर कोई असर पड़ना है और न ही जिला गाजियाबाद की कोई बदनामी होनी है। निर्देशन की बात करें, तो आनंद का काम औसत है। अदाकारों के अभिनय में भी संजीदगी नहीं है। संजय दत्त और अरशद वारसी ने बतौर एक्टर अपनी नई इमेज बनाने की कोशिश की है।