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Firozabad News: अंडर-19 क्रिकेट टीम की कमान यशवर्धन को मिलने पर जसराना में जश्न
Fri, 12 Jun 2026 11:50 PM IST
आगरा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, फिरोजाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फिरोजाबाद
Updated Fri, 12 Jun 2026 11:50 PM IST
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पिता अनामी सिंह चौहान के साश्यशवर्धन सिंह चौहान। स्रोत परिजन
- फोटो : पिता अनामी सिंह चौहान के साश्यशवर्धन सिंह चौहान। स्रोत परिजन
फिरोजाबाद/जसराना। जसराना क्षेत्र के गांव कौरारा बुजुर्ग से निकली क्रिकेट प्रतिभा यशवर्धन सिंह चौहान को श्रीलंका दौरे के लिए भारतीय अंडर-19 क्रिकेट टीम का कप्तान बनाया गया है। ओपनर बल्लेबाज और ऑफ स्पिन गेंदबाज यशवर्धन की इस उपलब्धि से पूरे जिले के खेल प्रेमियों में उत्साह का माहौल है। इस दौरे पर भारतीय टीम वहां वनडे मैच खेलेगी। इस गौरवपूर्ण खबर के बाद शुक्रवार को गांव में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। गांव में मिष्ठान वितरण किया गया।
यशवर्धन मूल रूप से कौरारा बुजुर्ग निवासी अनामी सिंह चौहान के पुत्र हैं। उनके पिता वर्ष 2003 में बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए मध्य प्रदेश के भिंड और बाद में ग्वालियर में जाकर बस गए थे, लेकिन इस परिवार की जड़ें आज भी अपने पैतृक गांव से जुड़ी हैं। यशवर्धन की माता रीना चौहान गांव की दो बार ग्राम प्रधान रह चुकी हैं और उनके चाचा गंभीर सिंह चौहान वर्तमान में गांव में ही रहकर खेती-किसानी संभालते हैं। कप्तान बनने की खबर मिलते ही ग्रामीणों ने उनके पैतृक आवास पर पहुंचकर बाबा वीर बहादुर सिंह, चाचा नरश्रेष्ठ सिंह, गंभीर सिंह, सुरेंद्र सिंह और बजरंग चौहान सहित अन्य परिजन को मिठाई खिलाकर बधाई दी।
कूच बिहार ट्रॉफी में चमके, 8 मैचों में ठोके 550 रन यशवर्धन को भारतीय अंडर-19 टीम की कप्तानी तक पहुंचाने में अंडर-19 कूच बिहार ट्रॉफी के प्रदर्शन की सबसे अहम भूमिका रही। मध्य प्रदेश की तरफ से खेलते हुए यशवर्धन ने इस टूर्नामेंट में शानदार बल्लेबाजी की। उन्होंने 8 मैचों में 550 रन बनाए और मैन ऑफ द टूर्नामेंट का खिताब जीता था। इसी प्रदर्शन के इनाम के तौर पर बीसीसीआई ने उन्हें श्रीलंका दौरे के लिए भारतीय टीम का कप्तान नियुक्त किया है।
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पिता का अधूरा सपना बेटे ने किया पूरा, खेत में बनवा दी थी सीमेंट की पिच यशवर्धन की इस स्वर्णिम सफलता के पीछे उनके पिता अनामी सिंह चौहान का जुनून और अटूट समर्पण रहा है। पिता का खुद क्रिकेटर बनने का सपना था और वह मंडल स्तर तक क्रिकेट खेलने भी गए थे, लेकिन किन्हीं कारणों से उनका सपना अधूरा रह गया। इसके बाद उन्होंने जसराना में प्रदेश स्तरीय क्रिकेट टूर्नामेंटों का आयोजन भी कराया, जिसमें दीपक चाहर और स्टार क्रिकेटर रिंकू सिंह जैसे भारतीय खिलाड़ी खेल चुके हैं।
चाचा गंभीर सिंह चौहान ने बताया कि भाई अनामी सिंह ने बेटे को बड़ा क्रिकेटर बनाने की कमान अपने हाथ में ली थी। इसके लिए उन्होंने अपने गांव वाले खेत में ही सीमेंट की एक पिच बनवा दी थी, जिस पर वह खुद यशवर्धन के साथ घंटों अभ्यास किया करते थे। वर्ष 2015 में उन्होंने बेटे को ग्वालियर की तानसेन क्रिकेट एकेडमी में दाखिला दिलाया। बेहतर गुरुओं के मार्गदर्शन और पिता की मेहनत के चलते यशवर्धन ने 2018 में अंडर-13 टूर्नामेंट खेला और इसके बाद अंडर-15 व अंडर-19 मध्य प्रदेश टीम का हिस्सा बने। बड़ा बेटा आदित्य वर्धन फिलहाल बीपीएड की पढ़ाई कर रहा है।
21 साल बाद सिंधिया स्कूल को दिलाई ट्रॉफी, मिली निशुल्क शिक्षा
यशवर्धन सिंह चौहान ने न सिर्फ घरेलू क्रिकेट बल्कि स्कूल स्तर पर भी अपनी कप्तानी का लोहा मनवाया है। उन्होंने ग्वालियर के सुप्रसिद्ध सिंधिया स्कूल को 21 साल के लंबे इंतजार के बाद प्रतिष्ठित माधवराव सिंधिया क्रिकेट ट्रॉफी दिलाई। देश के प्रमुख बोर्डिंग स्कूलों के बीच प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले इस टूर्नामेंट में सिंधिया स्कूल पिछले दो दशकों से खिताब का इंतजार कर रहा था।
यशवर्धन की जादुई अगुवाई में टीम ने न सिर्फ यह ट्रॉफी जीती, बल्कि लगातार तीन वर्षों तक इस खिताब पर अपना कब्जा बरकरार रखा। उनकी इस असाधारण खेल प्रतिभा को देखते हुए सिंधिया स्कूल प्रबंधन ने उन्हें स्कूल में निशुल्क शिक्षा की सुविधा भी प्रदान की, जिसने उनके क्रिकेट कॅरिअर और व्यक्तित्व को तराशने में एक मील का पत्थर साबित होने का काम किया।
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यशवर्धन मूल रूप से कौरारा बुजुर्ग निवासी अनामी सिंह चौहान के पुत्र हैं। उनके पिता वर्ष 2003 में बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए मध्य प्रदेश के भिंड और बाद में ग्वालियर में जाकर बस गए थे, लेकिन इस परिवार की जड़ें आज भी अपने पैतृक गांव से जुड़ी हैं। यशवर्धन की माता रीना चौहान गांव की दो बार ग्राम प्रधान रह चुकी हैं और उनके चाचा गंभीर सिंह चौहान वर्तमान में गांव में ही रहकर खेती-किसानी संभालते हैं। कप्तान बनने की खबर मिलते ही ग्रामीणों ने उनके पैतृक आवास पर पहुंचकर बाबा वीर बहादुर सिंह, चाचा नरश्रेष्ठ सिंह, गंभीर सिंह, सुरेंद्र सिंह और बजरंग चौहान सहित अन्य परिजन को मिठाई खिलाकर बधाई दी।
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कूच बिहार ट्रॉफी में चमके, 8 मैचों में ठोके 550 रन यशवर्धन को भारतीय अंडर-19 टीम की कप्तानी तक पहुंचाने में अंडर-19 कूच बिहार ट्रॉफी के प्रदर्शन की सबसे अहम भूमिका रही। मध्य प्रदेश की तरफ से खेलते हुए यशवर्धन ने इस टूर्नामेंट में शानदार बल्लेबाजी की। उन्होंने 8 मैचों में 550 रन बनाए और मैन ऑफ द टूर्नामेंट का खिताब जीता था। इसी प्रदर्शन के इनाम के तौर पर बीसीसीआई ने उन्हें श्रीलंका दौरे के लिए भारतीय टीम का कप्तान नियुक्त किया है।
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पिता का अधूरा सपना बेटे ने किया पूरा, खेत में बनवा दी थी सीमेंट की पिच यशवर्धन की इस स्वर्णिम सफलता के पीछे उनके पिता अनामी सिंह चौहान का जुनून और अटूट समर्पण रहा है। पिता का खुद क्रिकेटर बनने का सपना था और वह मंडल स्तर तक क्रिकेट खेलने भी गए थे, लेकिन किन्हीं कारणों से उनका सपना अधूरा रह गया। इसके बाद उन्होंने जसराना में प्रदेश स्तरीय क्रिकेट टूर्नामेंटों का आयोजन भी कराया, जिसमें दीपक चाहर और स्टार क्रिकेटर रिंकू सिंह जैसे भारतीय खिलाड़ी खेल चुके हैं।
चाचा गंभीर सिंह चौहान ने बताया कि भाई अनामी सिंह ने बेटे को बड़ा क्रिकेटर बनाने की कमान अपने हाथ में ली थी। इसके लिए उन्होंने अपने गांव वाले खेत में ही सीमेंट की एक पिच बनवा दी थी, जिस पर वह खुद यशवर्धन के साथ घंटों अभ्यास किया करते थे। वर्ष 2015 में उन्होंने बेटे को ग्वालियर की तानसेन क्रिकेट एकेडमी में दाखिला दिलाया। बेहतर गुरुओं के मार्गदर्शन और पिता की मेहनत के चलते यशवर्धन ने 2018 में अंडर-13 टूर्नामेंट खेला और इसके बाद अंडर-15 व अंडर-19 मध्य प्रदेश टीम का हिस्सा बने। बड़ा बेटा आदित्य वर्धन फिलहाल बीपीएड की पढ़ाई कर रहा है।
21 साल बाद सिंधिया स्कूल को दिलाई ट्रॉफी, मिली निशुल्क शिक्षा
यशवर्धन सिंह चौहान ने न सिर्फ घरेलू क्रिकेट बल्कि स्कूल स्तर पर भी अपनी कप्तानी का लोहा मनवाया है। उन्होंने ग्वालियर के सुप्रसिद्ध सिंधिया स्कूल को 21 साल के लंबे इंतजार के बाद प्रतिष्ठित माधवराव सिंधिया क्रिकेट ट्रॉफी दिलाई। देश के प्रमुख बोर्डिंग स्कूलों के बीच प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले इस टूर्नामेंट में सिंधिया स्कूल पिछले दो दशकों से खिताब का इंतजार कर रहा था।
यशवर्धन की जादुई अगुवाई में टीम ने न सिर्फ यह ट्रॉफी जीती, बल्कि लगातार तीन वर्षों तक इस खिताब पर अपना कब्जा बरकरार रखा। उनकी इस असाधारण खेल प्रतिभा को देखते हुए सिंधिया स्कूल प्रबंधन ने उन्हें स्कूल में निशुल्क शिक्षा की सुविधा भी प्रदान की, जिसने उनके क्रिकेट कॅरिअर और व्यक्तित्व को तराशने में एक मील का पत्थर साबित होने का काम किया।