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कान्हा गोशाला में तैयार होंगी गिरी, साहीवाल, जर्सी नस्लों के गाय
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फतेहपुर। कान्हा गोशाला में गिरी, साहीवाल और जर्सी नस्ल की गायों को तैयार करने पर काम शुरू हो गया है। अगले तीन से चार साल में तीन चरणों में यहां इन नस्लों की गायें तैयार होंगी। इसके पहले चरण में 80 देसी गायें कृत्रिम गर्भाधान के जरिये अप्रैल 2022 में बच्चों को जन्म देंगी। इन बच्चों में गिरी, साहीवाल और जर्सी नस्ल के 50 फीसदी लक्षण होंगे। जैसे-जैसे गर्भाधान की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी नस्लों में सुधार होगा।
नगर पालिका की कान्हा गोशाला में वर्तमान समय में 190 गोवंश हैं। इनमें 178 मादा और 12 नर गोवंश शामिल हैं। इनमें 80 गायों का कृत्रिम गर्भाधान कराया गया है। गर्भाधान में साहीवाल, गिरी और जर्सी नस्ल के सीमन का इस्तेमाल किया गया है।
ये सभी गायें अप्रैल से मई के बीच 50 प्रतिशत लक्षणों वाले बच्चे जन्मेंगी। शेष 98 गायें गर्भाधान के लिए गोशाला में तैयार हो रही हैं। हालांकि कुछ गायें वृद्ध हैं। इस तरह की प्रक्रिया लगातार तीन-चार साल में तीन चरणों में चलेगी। इसके बाद 80 से 90 फीसदी लक्षण वाले साहीवाल, गिरी और जर्सी गायों की नस्लें तैयार होंगी।
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नगर पालिका कान्हा गोशाला को अधिक दुधारू किस्म की गायों का हब बनाने का प्रयास कर रही है। देसी गायें इन नस्लों के स्वस्थ बच्चे दें, इसके लिए गोशाला में अलग व्यवस्था की गई है। इनके खाने में खली, पशु आहार, चोकर और भूसे के साथ हरे चारे की व्यवस्था की गई है। ऐसी गायों को खुले मैदान में चराने की व्यवस्था भी है। गोशाला में नस्लों के आधार पर गायों को अलग-अलग रखा गया है। गर्भवती गायों को प्रतिदिन नहलाने का भी इंतजाम है।
गोशाला प्रबंधक सागर का कहना है कि कान्हा गोशाला अधिक दुधारू किस्म की गायों के बच्चे पैदा करने की नर्सरी की तरह होगाी। गोशाला में किसी भी देशी गाय से दूध नहीं निकाला जाएगा। पूरा दूध बच्चों को पिलाया जाएगा। ऐसा करने से बच्चे स्वस्थ होंगे। पूरा दूध पीने से जर्सी, साहीवाल और गिरी नस्ल के बच्चे दो साल में तैयार होकर बच्चा देने की क्षमता में पहुंच जाएंगे।
पशु चिकित्साधिकारी डॉ. अनिल कुमार का कहना है कि पहले चरण में जो बच्चे होंगे उनमें माता-पिता के 50 प्रतिशत लक्षण होंगे। दूसरे चरण में होने वाले बच्चों में 75 प्रतिशत तक इन नस्लों के लक्षण आ जाएंगे। जबकि तीसरे चरण में यह लक्षण 80 से ऊपर तक पहुंच जाएंगे।
कान्हा गोशाला में अब तक 80 गायों की मौत हो चुकी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गायों के मरने का कारण पेट में अधिक मात्रा में पॉलिथीन पाया जाना है। शहर में अन्ना घूमने वाली गायें सब्जियों के छिलके और बासी खाने के साथ पॉलिथीन खा जाती हैं। यही पॉलिथीन पेट में जमा होने के कारण गायों की मौत हो जाती है। इसकी पुष्टि गोशाला प्रबंधक सागर ने की है।
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नगर पालिका की कान्हा गोशाला में वर्तमान समय में 190 गोवंश हैं। इनमें 178 मादा और 12 नर गोवंश शामिल हैं। इनमें 80 गायों का कृत्रिम गर्भाधान कराया गया है। गर्भाधान में साहीवाल, गिरी और जर्सी नस्ल के सीमन का इस्तेमाल किया गया है।
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ये सभी गायें अप्रैल से मई के बीच 50 प्रतिशत लक्षणों वाले बच्चे जन्मेंगी। शेष 98 गायें गर्भाधान के लिए गोशाला में तैयार हो रही हैं। हालांकि कुछ गायें वृद्ध हैं। इस तरह की प्रक्रिया लगातार तीन-चार साल में तीन चरणों में चलेगी। इसके बाद 80 से 90 फीसदी लक्षण वाले साहीवाल, गिरी और जर्सी गायों की नस्लें तैयार होंगी।
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नगर पालिका कान्हा गोशाला को अधिक दुधारू किस्म की गायों का हब बनाने का प्रयास कर रही है। देसी गायें इन नस्लों के स्वस्थ बच्चे दें, इसके लिए गोशाला में अलग व्यवस्था की गई है। इनके खाने में खली, पशु आहार, चोकर और भूसे के साथ हरे चारे की व्यवस्था की गई है। ऐसी गायों को खुले मैदान में चराने की व्यवस्था भी है। गोशाला में नस्लों के आधार पर गायों को अलग-अलग रखा गया है। गर्भवती गायों को प्रतिदिन नहलाने का भी इंतजाम है।
गोशाला प्रबंधक सागर का कहना है कि कान्हा गोशाला अधिक दुधारू किस्म की गायों के बच्चे पैदा करने की नर्सरी की तरह होगाी। गोशाला में किसी भी देशी गाय से दूध नहीं निकाला जाएगा। पूरा दूध बच्चों को पिलाया जाएगा। ऐसा करने से बच्चे स्वस्थ होंगे। पूरा दूध पीने से जर्सी, साहीवाल और गिरी नस्ल के बच्चे दो साल में तैयार होकर बच्चा देने की क्षमता में पहुंच जाएंगे।
पशु चिकित्साधिकारी डॉ. अनिल कुमार का कहना है कि पहले चरण में जो बच्चे होंगे उनमें माता-पिता के 50 प्रतिशत लक्षण होंगे। दूसरे चरण में होने वाले बच्चों में 75 प्रतिशत तक इन नस्लों के लक्षण आ जाएंगे। जबकि तीसरे चरण में यह लक्षण 80 से ऊपर तक पहुंच जाएंगे।
कान्हा गोशाला में अब तक 80 गायों की मौत हो चुकी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गायों के मरने का कारण पेट में अधिक मात्रा में पॉलिथीन पाया जाना है। शहर में अन्ना घूमने वाली गायें सब्जियों के छिलके और बासी खाने के साथ पॉलिथीन खा जाती हैं। यही पॉलिथीन पेट में जमा होने के कारण गायों की मौत हो जाती है। इसकी पुष्टि गोशाला प्रबंधक सागर ने की है।