डूंडेश्वर महादेव जहां पूरी होती हर मुराद
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सावन लगने के साथ ही नगर से दो किलोमीटर दूर जंगल में स्थित डूंडेश्वर मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ने लगी। ऐसी मान्यता है कि यहां शिवलिंग मुगल शासनकाल के पूर्व पाताल से निकला था। मंदिर व शिवलिंग को तोड़ने के लिए यहां पहुंची औरंगजेब की सेना को बैरंग लौटना पड़ा था। ऐसा बताते हैं कि शिवलिंग को तोड़ने के समय चारों ओर जहरीले कीड़े निकल आए। सेना को यहां से भागना पड़ा था। मंदिर में सावन माह व शिव पर्वों में अपार भीड़ जुटती है। मन से मांगी गई मुरादें पूरी होती हैं। भक्त रुद्राभिषेक, अंखड पाठ, महामृत्युंजय जाप, भंडारे आदि अनुष्ठान कराते रहते हैं।
मुगल शासन के पूर्व के डूंडेश्वर धाम के शिव मंदिर का शिवलिंग पाताली है। बुजुर्ग बताते हैं कि मुगल शासन काल के पूर्व यहां विशाल जंगल था। चरवाहे मवेशियों को लेकर चारा खिलाने के लिए लाते थे। उसी दौरान एक गाय इस स्थान पर आकर खड़ी हो गई और उसके स्तन से दूध टपकने लगा यह देखकर सभी आश्चर्य में पड़ गए। जब इस स्थान में खड़ी घास फूस को हटाया गया तो शिवलिंग के दर्शन हुए। तभी से यह स्थान भक्तों के बीच आस्था का केंद्र बन गया। धीरे-धीरे इस शिवलिंग को सुरक्षित करने के लिए मंदिर की स्थापना व कुआं आदि बनाया गया। यहां आज भी सावन माह व शिव पर्वों में भारी संख्या में भक्त एकत्र होते हैं। शिवरात्रि पर्व पर शिव पार्वती का विवाह संपन्न कराया जाता है। इसे देखने के लिए नगर ही नहीं आस-पास के गांव से हजारों की संख्या में भक्त जुटते हैं। यहां मेला का भी आयोजन किया जाता है। मंदिर की देख रेख कर रहे श्याम नरायण मिश्रा का कहना है कि सावन मास में भक्तों की अपार भीड़ जुटती है। भक्तगण बारहों महीने अनेक धार्मिक अनुष्ठान कराते रहते हैं। यहां मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। ऐसी यहां की मान्यता है।