{"_id":"625ef796f873bf19db5d8967","slug":"civic-fatehpur-news-knp692129691","type":"story","status":"publish","title_hn":"डीएम ने छुड़ाई 90 करोड़ की जमीन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
डीएम ने छुड़ाई 90 करोड़ की जमीन
विज्ञापन
जेल रोड स्थित भूखंड का निरीक्षण करतीं डीएम अपूर्वा दुबे साथ में एसपी राजेश कुमार सिंह। संवाद
- फोटो : FATEHPUR
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
फतेहपुर। शहर के जेल रोड में स्थित बेशकीमती जमीन को जिलाधिकारी ने माफिया के चंगुल से छुड़ाकर ऊसर खाते में दर्ज करा दी है। 21 बीघे के एकमुश्त इस भूखंड की कीमत 90 करोड़ आंकी जा रही है। इस जमीन पर काबिज होने के लिए कुछ सफेदपोश और जमीनों के सौदागर चार वर्षों से भूमिका बना रहे थे। अब इन्हें बड़ा झटका लगा है। जमीन ऊसर खाते में दर्ज कराने के बाद जिलाधिकारी अपूर्वा दुबे ने पुलिस अधीक्षक राजेश सिंह, एसडीएम नंद प्रकाश मौर्य और राजस्व टीम के साथ मौके पर जाकर स्थलीय निरीक्षण किया।
अक्तूबर माह में जिलाधिकारी को शिकायत मिली थी कि डीएम आवास के पीछे जेल रोड स्थित जो जमीन यूसुफ क्लब की बताई जा रहा है, उसे फर्जी तरीके से अस्तित्व में लाया गया है। डीएम ने इसकी जांच एसडीएम नंद प्रकाश मौर्य से कराई। जांच में सन 1913 के फसली वर्ष 1320 के रिकार्ड निकाले गए। इससे पता चला कि जमीन उस वक्त ऊसर खाते में दर्ज थी। तत्कालीन लेखपाल ने फर्जी तरीके से मोहम्मद हसन फातमा और मुन्नू निवासी अरबपुर के नाम दर्ज कर दी थी। यह नाम किस आदेेश से दर्ज किए, इसका कहीं कोई अभिलेेख नहीं मिला। सन 1951-52 में 1359 फसली में फिर बिना किसी आदेश के यूसुफ क्लब का नाम बढ़ाया गया। डीएम ने 1320 फसली की खतौनी को आधार बनाते हुए पूरे भूखंड को पुन: ऊसर खाते में दर्ज कराने के लिए कहा। एसडीएम नंद प्रकाश मौर्य की अदालत ने जमीन को ऊसर के खाते में दर्ज करने का आदेश कर दिया। मंगलवार को डीएम और एसपी ने पूरी टीम के साथ मौके का निरीक्षण जमीन का मुआयना भी किया। 21 बीघे के इस भूखंड में से पांच बीघे में एफसीआई का गोदाम बना हुआ है। शेष 16 बीघा जमीन को ऊसर खाते में दर्ज कर दिया गया है।
1320 फसली वर्ष में मोहम्मद हसन फातमा और मुन्नू के नाम बढ़ाने की लिखावट ने ही फर्जीवाड़ा खोल दिया। दरअसल उस वक्त जब कोई खतौनी लिखी जाती थी तो कलम और लिखावट एक ही रखी जाती थी। दूसरी कलम और स्याही का प्रयोग वर्जित था। लेखपाल ने जिस कलम से दोनों नाम बढ़ाए उसकी लिखावट और स्याही में फर्क पकड़ में आ गया। इससे पूरा खेल उजागर हो गया।
विज्ञापन
वर्ष 1951-52 में जमींदारी प्रथा खत्म होने के दौरान यूसुफ क्लब की फर्जी इंट्री की गई। एसडीएम के आदेश पर ही खतौनी में बदलाव या संशोधन किया जाता है। तत्कालीन लेखपाल ने जब यूसुफ क्लब का नाम खतौनी में चढ़ाया तो इस आदेश के तहत यह नाम आया, इसका कहीं कोई जिक्र या आधार दर्शाया ही नहीं। इससे क्लब का नाम भी फर्जी तरीके से प्रकाश में लाने का मामला उजागर हुआ।
जिले के मिनरल फंड से फिलहाल इस जमीन के एक हिस्से पर पार्क बनवाने के प्रस्ताव के बारे में होमवर्क चल रहा है। प्रस्ताव के सापेक्ष बजट की उपलब्धता के अनुसार इस पूरे भू भाग को विकसित कराया जाएगा। जमीन कानूनी तौर पर ऊसर खाते में दर्ज हो जाने के बाद अब इसमें सरकारी धन के उपयोग को लेकर भी कोई संशय नहीं रह गया है।
- अपूूर्वा दुबे, जिलाधिकारी
विज्ञापन
अक्तूबर माह में जिलाधिकारी को शिकायत मिली थी कि डीएम आवास के पीछे जेल रोड स्थित जो जमीन यूसुफ क्लब की बताई जा रहा है, उसे फर्जी तरीके से अस्तित्व में लाया गया है। डीएम ने इसकी जांच एसडीएम नंद प्रकाश मौर्य से कराई। जांच में सन 1913 के फसली वर्ष 1320 के रिकार्ड निकाले गए। इससे पता चला कि जमीन उस वक्त ऊसर खाते में दर्ज थी। तत्कालीन लेखपाल ने फर्जी तरीके से मोहम्मद हसन फातमा और मुन्नू निवासी अरबपुर के नाम दर्ज कर दी थी। यह नाम किस आदेेश से दर्ज किए, इसका कहीं कोई अभिलेेख नहीं मिला। सन 1951-52 में 1359 फसली में फिर बिना किसी आदेश के यूसुफ क्लब का नाम बढ़ाया गया। डीएम ने 1320 फसली की खतौनी को आधार बनाते हुए पूरे भूखंड को पुन: ऊसर खाते में दर्ज कराने के लिए कहा। एसडीएम नंद प्रकाश मौर्य की अदालत ने जमीन को ऊसर के खाते में दर्ज करने का आदेश कर दिया। मंगलवार को डीएम और एसपी ने पूरी टीम के साथ मौके का निरीक्षण जमीन का मुआयना भी किया। 21 बीघे के इस भूखंड में से पांच बीघे में एफसीआई का गोदाम बना हुआ है। शेष 16 बीघा जमीन को ऊसर खाते में दर्ज कर दिया गया है।
विज्ञापन
1320 फसली वर्ष में मोहम्मद हसन फातमा और मुन्नू के नाम बढ़ाने की लिखावट ने ही फर्जीवाड़ा खोल दिया। दरअसल उस वक्त जब कोई खतौनी लिखी जाती थी तो कलम और लिखावट एक ही रखी जाती थी। दूसरी कलम और स्याही का प्रयोग वर्जित था। लेखपाल ने जिस कलम से दोनों नाम बढ़ाए उसकी लिखावट और स्याही में फर्क पकड़ में आ गया। इससे पूरा खेल उजागर हो गया।
विज्ञापन
वर्ष 1951-52 में जमींदारी प्रथा खत्म होने के दौरान यूसुफ क्लब की फर्जी इंट्री की गई। एसडीएम के आदेश पर ही खतौनी में बदलाव या संशोधन किया जाता है। तत्कालीन लेखपाल ने जब यूसुफ क्लब का नाम खतौनी में चढ़ाया तो इस आदेश के तहत यह नाम आया, इसका कहीं कोई जिक्र या आधार दर्शाया ही नहीं। इससे क्लब का नाम भी फर्जी तरीके से प्रकाश में लाने का मामला उजागर हुआ।
जिले के मिनरल फंड से फिलहाल इस जमीन के एक हिस्से पर पार्क बनवाने के प्रस्ताव के बारे में होमवर्क चल रहा है। प्रस्ताव के सापेक्ष बजट की उपलब्धता के अनुसार इस पूरे भू भाग को विकसित कराया जाएगा। जमीन कानूनी तौर पर ऊसर खाते में दर्ज हो जाने के बाद अब इसमें सरकारी धन के उपयोग को लेकर भी कोई संशय नहीं रह गया है।
- अपूूर्वा दुबे, जिलाधिकारी