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गांधीवादी मूल्यों की प्रासंगिकता पर मंथन
ब्यूरो, अमर उजाला फतेहपुर
Updated Sat, 21 Jan 2017 12:06 AM IST
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डॉ. बाबा साहब भीमराव अंबेडकर राजकीय महिला महाविद्यालय में राष्ट्रीय सेमिनार में बोलती छात्रा।
- फोटो : Amar ujala
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डॉ. भीमराव अंबेडकर राजकीय महिला महाविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के अंतिम दिन पर्यावरण एवं गांधीवादी मूल्यों की प्रासंगिकता विषय पर गंभीरता से मंथन किया गया। चार सत्रों वाले सेमिनार के अंतिम दिन तृतीय एवं चतुर्थ सत्र में शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।
तृतीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश की प्राचार्य डॉ. नीलम चौरे ने कहा कि महात्मा गांधी का मानना था कि विश्व का हीन से हीनतम प्राणी भी मनुष्य प्रेम का अधिकारी है। इसी में ही पर्यावरणवाद तथा सतत विकास का बीज निहित है। गांधीवाद दर्शन ऐसे विवेकशील नैतिक चरित्र से युक्त मानव समाज की रचना चाहता है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता ही न पड़े। हमारा विकास ही मनुष्य पर्यावरण सहसंबंध पर आधारित हो और पर्यावरण संवर्धन स्वमेव होता रहे।
चौथे सत्र की अध्यक्षता करते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय की डॉ. विमला व्यास ने कहा कि महात्मा गांधी ने 1920 में ही सतत विकास की परिकल्पना की थी। उनको पहले ही यह आभास हो गया था कि मनुष्य की लालची प्रवृत्ति निश्चय ही भविष्य में उसके अस्तित्व पर खतरा पैदा करेगी। राष्ट्रीय सेमिनार 150 शोधपत्र विभिन्न तकनीकी सत्रों में प्रस्तुत किए गए। इनमें गांधी दर्शन से पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान पर प्रकाश डाला गया। सत्र का समापन राजकीय महाविद्यालय बहुआ के प्राचार्य एके वर्मा ने किया। छात्राओं ने भी विचार रखे। महिला महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. स्वप्ना चट्टोपाध्याय ने अतिथियों का आभार व्यक्त किया। इस मौके पर कार्यक्रम संयोजक डॉ. शकुंतला, डॉ. प्रशांत द्विवेदी ने भी विचार व्यक्त किए।
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तृतीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश की प्राचार्य डॉ. नीलम चौरे ने कहा कि महात्मा गांधी का मानना था कि विश्व का हीन से हीनतम प्राणी भी मनुष्य प्रेम का अधिकारी है। इसी में ही पर्यावरणवाद तथा सतत विकास का बीज निहित है। गांधीवाद दर्शन ऐसे विवेकशील नैतिक चरित्र से युक्त मानव समाज की रचना चाहता है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता ही न पड़े। हमारा विकास ही मनुष्य पर्यावरण सहसंबंध पर आधारित हो और पर्यावरण संवर्धन स्वमेव होता रहे।
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चौथे सत्र की अध्यक्षता करते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय की डॉ. विमला व्यास ने कहा कि महात्मा गांधी ने 1920 में ही सतत विकास की परिकल्पना की थी। उनको पहले ही यह आभास हो गया था कि मनुष्य की लालची प्रवृत्ति निश्चय ही भविष्य में उसके अस्तित्व पर खतरा पैदा करेगी। राष्ट्रीय सेमिनार 150 शोधपत्र विभिन्न तकनीकी सत्रों में प्रस्तुत किए गए। इनमें गांधी दर्शन से पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान पर प्रकाश डाला गया। सत्र का समापन राजकीय महाविद्यालय बहुआ के प्राचार्य एके वर्मा ने किया। छात्राओं ने भी विचार रखे। महिला महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. स्वप्ना चट्टोपाध्याय ने अतिथियों का आभार व्यक्त किया। इस मौके पर कार्यक्रम संयोजक डॉ. शकुंतला, डॉ. प्रशांत द्विवेदी ने भी विचार व्यक्त किए।
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