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तेइस साल पहले ध्वस्त हुआ था सामान्य जाति का यह किला
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फतेहपुर। लोकसभा चुनाव में 23 साल पहले फतेहपुर संसदीय सीट पर प्रमुख राजनैतिक दलों ने जब भी सामान्य जाति का प्रत्याशी मैदान में उतारा, तो उसे करारी शिकस्त का मुंह देखना पड़ा। कभी सामान्य जाति के जन प्रतिनिधियों के लिए सुरक्षित कही जाने वाली यह सीट वर्तमान में ओबीसी प्रत्याशियों का गढ़ है।
लोकसभा चुनाव 1952 में शिवदत्त उपाध्याय, 1967 और 1971 में लगातार दो बार कालाकांकर स्टेट के मालिक संतबक्स सिंह और इसके बाद 1989, 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, इससे पहले 1980, 1984 में दो बार हरीकृष्ण शास्त्री (सामान्य जाति) के जनप्रतिनिधियों ने देश की सबसे बड़ी पंचायत में जिले का प्रतिनिधित्व किया। इस सीट के लिए 1996 का चुनाव काला साबित हुआ और कांग्रेस से रामप्यारे पांडेय, जद से
कृष्णकुमार सिंह उर्फ केके सिंह, भाजपा से महेंद्र प्रताप नारायण सिंह की भिड़ंत हुई। परिणाम स्वरूप निषाद बिरादरी के बसपा प्रत्याशी विशंभर निषाद ने पशली बार विजय पताका फहराई। इसके बाद से अब तक सामान्य जाति के प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे तो लेकिन रनर तक नहीं बन पाए। 1999 के लोकसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस से बुलाकर देवेंद्र सिंह गौतम को चुनाव लड़ाया लेकिन यह तीसरे नंबर पर रहे। सांसद बनने का अवसर भजपा गठबंधन के डा. अशोक पटेल को मिला। 2004 लोकसभा चुनाव में सपा एक बार फिर से क्षत्रिय बिरादरी के पूर्व मंत्री अचल सिंह को चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन यह रनर तक नहीं बन पाए। बसपा के महेंद्र निषाद ने सांसद बनकर देश की सबसे बड़ी पंचायत में जिले का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 2009 के चुनाव में सपा के राकेश सचान, 2014 में भाजपा की साध्वी निरंजन ज्योति सांसद बनी। अब 2019 लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है, लेकिन फिलहाल कोई भी राजनैतिक दल सामान्य जाति का प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारने के मूड में नहीं दिखा है। भाजपा ने निषाद, कांग्रेस ने कुर्मी और बसपा-सपा गठबंधन ने भी कुर्मी चेहरे पर दांव लगाया है।
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लोकसभा चुनाव 1952 में शिवदत्त उपाध्याय, 1967 और 1971 में लगातार दो बार कालाकांकर स्टेट के मालिक संतबक्स सिंह और इसके बाद 1989, 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, इससे पहले 1980, 1984 में दो बार हरीकृष्ण शास्त्री (सामान्य जाति) के जनप्रतिनिधियों ने देश की सबसे बड़ी पंचायत में जिले का प्रतिनिधित्व किया। इस सीट के लिए 1996 का चुनाव काला साबित हुआ और कांग्रेस से रामप्यारे पांडेय, जद से
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कृष्णकुमार सिंह उर्फ केके सिंह, भाजपा से महेंद्र प्रताप नारायण सिंह की भिड़ंत हुई। परिणाम स्वरूप निषाद बिरादरी के बसपा प्रत्याशी विशंभर निषाद ने पशली बार विजय पताका फहराई। इसके बाद से अब तक सामान्य जाति के प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे तो लेकिन रनर तक नहीं बन पाए। 1999 के लोकसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस से बुलाकर देवेंद्र सिंह गौतम को चुनाव लड़ाया लेकिन यह तीसरे नंबर पर रहे। सांसद बनने का अवसर भजपा गठबंधन के डा. अशोक पटेल को मिला। 2004 लोकसभा चुनाव में सपा एक बार फिर से क्षत्रिय बिरादरी के पूर्व मंत्री अचल सिंह को चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन यह रनर तक नहीं बन पाए। बसपा के महेंद्र निषाद ने सांसद बनकर देश की सबसे बड़ी पंचायत में जिले का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 2009 के चुनाव में सपा के राकेश सचान, 2014 में भाजपा की साध्वी निरंजन ज्योति सांसद बनी। अब 2019 लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है, लेकिन फिलहाल कोई भी राजनैतिक दल सामान्य जाति का प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारने के मूड में नहीं दिखा है। भाजपा ने निषाद, कांग्रेस ने कुर्मी और बसपा-सपा गठबंधन ने भी कुर्मी चेहरे पर दांव लगाया है।
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