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अतिविश्वास, टिकट वितरण में चूक से डूबी सपा की नैया
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फर्रुखाबाद। सपा को जिले की चारों सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा। सभाओं में भीड़ जुटी, भौकाल भी बना, मगर एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई। हार की मुख्य वजह अतिविश्वास के साथ ही टिकट वितरण में चूक को माना जा रहा है। जिले में खुद को मजबूत मानकर पार्टी पदाधिकारियों और प्रत्याशियों के लहजे में अकड़ आ गई थी। कायमगंज व सदर सीट पर स्थानीय प्रत्याशियों का न होना भी हार की एक वजह रही।
सपा की सभाओं में भीड़ जुटने से जिला संगठन के नेता और प्रत्याशी खासे उत्साहित थे। बावजूद इसके गुरुवार को परिणाम आया, तो एक भी प्रत्याशी जीत नहीं पा सका। इसकी कुछ खास वजह रहीं। पार्टी का हर कार्यकर्ता अतिविश्वास से भरा था। लिहाजा उनके बातचीत के तरीकों में भी मतदान से पहले ही बदलाव आ गया। इसे जनता बखूबी समझ रही थी। इसके अलावा सदर और कायमगंज सीट पर बाहरी प्रत्याशियों पर भरोसा जताया।
इन दोनों ही सीटों पर स्थानीय लोगों ने काफी हो-हल्ला मचाया था। सदर सीट से मुस्लिमों के बड़े गुट ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र भेजकर स्थानीय प्रत्याशी उतारने की मांग की थी, मगर हाईकमान ने कोई तवज्जो नहीं दी। इसके पीछे जिले के कुछ बड़े नेताओं का हाथ था। यही नहीं सदर प्रत्याशी सुमन शाक्य एक पूर्व विधायक के परिजनों के इर्द-गिर्द ही घूमती रहीं। उन्होंने संगठन नेताओं से भी दूरी बनाए रखी।
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कायमगंज सीट पर भी बाहरी का मुद्दा रहा। जिस दिन सर्वेश आंबेडकर को टिकट मिली, उसके बाद कई दिन तक विरोध होता रहा। पुतला दहन तक हुआ। समर्थक चाहते थे कि जिस नेता ने पांच साल विपक्ष में रहकर काम किया, उसे टिकट मिले। इस वजह से भी लोगों में खासी नाखुशी रही। इसके अलावा चुनाव भी काफी हल्के से लड़ा गया।
अमृतपुर में पूर्व राज्यमंत्री नरेंद्र सिंह यादव का टिकट काटकर सपा ने डॉ. जितेंद्र यादव पर विश्वास जताया। जितेंद्र ने चुनाव तो पूरी दमदारी से लड़ा, मगर परिणाम काफी खराब रहा। हालांकि नरेंद्र सिंह को वोट उनके कद को देखते हुए काफी कम मिले। इसके पीछे बताया जाता है कि नरेंद्र सिंह का वोट बूथ तक मतदान करने नहीं पहुंचा।
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सपा की सभाओं में भीड़ जुटने से जिला संगठन के नेता और प्रत्याशी खासे उत्साहित थे। बावजूद इसके गुरुवार को परिणाम आया, तो एक भी प्रत्याशी जीत नहीं पा सका। इसकी कुछ खास वजह रहीं। पार्टी का हर कार्यकर्ता अतिविश्वास से भरा था। लिहाजा उनके बातचीत के तरीकों में भी मतदान से पहले ही बदलाव आ गया। इसे जनता बखूबी समझ रही थी। इसके अलावा सदर और कायमगंज सीट पर बाहरी प्रत्याशियों पर भरोसा जताया।
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इन दोनों ही सीटों पर स्थानीय लोगों ने काफी हो-हल्ला मचाया था। सदर सीट से मुस्लिमों के बड़े गुट ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र भेजकर स्थानीय प्रत्याशी उतारने की मांग की थी, मगर हाईकमान ने कोई तवज्जो नहीं दी। इसके पीछे जिले के कुछ बड़े नेताओं का हाथ था। यही नहीं सदर प्रत्याशी सुमन शाक्य एक पूर्व विधायक के परिजनों के इर्द-गिर्द ही घूमती रहीं। उन्होंने संगठन नेताओं से भी दूरी बनाए रखी।
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कायमगंज सीट पर भी बाहरी का मुद्दा रहा। जिस दिन सर्वेश आंबेडकर को टिकट मिली, उसके बाद कई दिन तक विरोध होता रहा। पुतला दहन तक हुआ। समर्थक चाहते थे कि जिस नेता ने पांच साल विपक्ष में रहकर काम किया, उसे टिकट मिले। इस वजह से भी लोगों में खासी नाखुशी रही। इसके अलावा चुनाव भी काफी हल्के से लड़ा गया।
अमृतपुर में पूर्व राज्यमंत्री नरेंद्र सिंह यादव का टिकट काटकर सपा ने डॉ. जितेंद्र यादव पर विश्वास जताया। जितेंद्र ने चुनाव तो पूरी दमदारी से लड़ा, मगर परिणाम काफी खराब रहा। हालांकि नरेंद्र सिंह को वोट उनके कद को देखते हुए काफी कम मिले। इसके पीछे बताया जाता है कि नरेंद्र सिंह का वोट बूथ तक मतदान करने नहीं पहुंचा।