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कल्पवासियों ने श्रद्धा भरी नम आखों से ली भागीरथी से विदाई

Mon, 10 Feb 2020 11:24 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Mon, 10 Feb 2020 11:24 PM IST
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Kalpavasi goes to Nizdham to bid farewell to Ganga Maiya
रामनगरिया मेले से ट्रैक्टर ट्राली पर सामान लाद कर घरों को लौटते कल्पवासी। - फोटो : FARRUKHABAD
फर्रुखाबाद: कल्पवासियों व साधु-संतों ने सोमवार को मां गंगा में पुण्य की डुबकी लगाकर आशीर्वाद लिया। अगले वर्ष आने की अनुमति लेकर अपने-अपने घरों के लिए प्रस्थान किया। वहीं मेला क्षेत्र व गंगा के तटों पर गंदगी छोड़ गये। बाजार व मनोरंजन क्षेत्र में खासी भीड़ रही।
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पांचाल घाट स्थित मां भागीरथी के तट पर मेला रामनगरिया में माघ में एक माह का कल्पवास कर दान-पुण्य, भंडारे आदि धार्मिक आयोजन किए गए। इससे तंबू की नगरी में कुंभ का नजारा दिखता रहा। बड़े हनुमान भोलेपुर मंदिर के महंत बाबा बालकदास महाराज कहते हैं माघ के पवित्र माह में सभी देवता गंगा किनारे रहते हैं।
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एक माह कल्पवास कर गंगा स्नान करने से चारो युगों का फल मिलता है। कल्पवासी रविवार को माघ पूर्णिमा पर गंगा स्नान के साथ घर वापस जाने की तैयारी में लग गए थे। भीड़ अधिक होने से अधिकांश कल्पवासियों ने कार्यक्रम निरस्त कर दिया। सोमवार सुबह होते ही गंगा में स्नान किया और श्रद्धा भरी नम आंखों से मइया से विदाई लेकर घर को रवाना हो गए।
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अपने साथ गंगा जल भी भरकर ले गए। हालांकि साधु-संतों की अभी राऊटी लगी हैं। कल्पवासियों के जाने से गंगा तट वीरान हुए तो क्षेत्र में गंदगी के अंबार लग गए हैं। कल्पवास क्षेत्र पुआल, दोना व पत्तलों से पटा है। सफाई कर्मचारी भी नजर नहीं आए। मेला बाजार व मनोरंजन क्षेत्र में भीड़ रहने के साथ खरीदारी भी खूब हुई।
धूनी पूजा कर मनाते हैं भगवान को
कल्पवास करने आये त्यागी बजरंगदास, मोहनदास, कृष्णदास का कहना है कि वसंत पंचमी से धूनी पूजा शुरू करते हैं। जेठ दशहरा तक चार माह का यह अनुष्ठान चलता है। इस पूजा से प्रभु राम को मनाने का प्रयास करते हैं। भीषण गर्मी में भी मंत्रोच्चार के साथ धूनी प्रचंड की जाती है। करीब दो घंटे धूनी शांत होने तक पूजा चलती है। प्रभु की आस में गर्मी का एहसास भी नहीं करते।

मेले का नहीं हुआ समापन सरोह
पांचालघाट पर लगे मेला रामनगरिया का उद्घाटन जिलाधिकारी मानवेंद्र सिंह ने बड़े धूमधाम से किया था। माघ पूर्णिमा स्नान के बाद सोमवार को समापन समारोह था, जो मेला रामनगरिया के कार्यक्रमों में शामिल था। इसके बावजूद मेला प्रबंधन की लापरवाही कहें या फिर दुर्भाग्य, लगातार दूसरे वर्ष मेले का समापन समारोह नहीं किया गया।
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