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गुलाल की तरह महक उठा फुलवा आलू

Tue, 22 Mar 2016 12:33 AM IST
चंद्रपाल सिंह सेंगर,फर्रुखाबाद
चंद्रपाल सिंह सेंगर,फर्रुखाबाद Updated Tue, 22 Mar 2016 12:33 AM IST
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Gualala was filled like potato Fulwa
potato - फोटो : getty images
होली के त्योहार पर पुरानी प्रजाति के फुलवा आलू की पैदावार से उमेश अग्रवाल के घर में खुशी है, जबकि अन्य आलू किसान होली पर अच्छे भाव न मिलने के कारण अपने बच्चों को कपड़े तक नहीं दिला सके हैं। फुलवा आलू दो हजार रुपया प्रति क्विंटल बिकने से जहां 19 हजार रुपया प्रति बीघा का शुद्ध लाभ हुआ है। वहीं दूसरी तरफ अन्य प्रजाति के आलू 400 से 700 रुपये प्रति क्विंटल बिकने से किसानों को लागत के दाम बामुश्किल मिल रहे हैं।
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खाने में सबसे लजीज और शर्करा से मुक्त फुलवा आलू की प्रजाति लगभग विलुप्त सी हो रही थी। उमेश अग्रवाल ने हरियारी बाजार के निकट आठ बीघा खेत में इस प्रजाति को बचाने के लिए आलू कराया। यह आलू गांव चौकी महमदपुर के रहने वाले प्रगतिशील किसान नारद सिंह की देखरेख में किया गया।
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फुलवा आलू को एक बीघा खेत में पैदा करने में तकरीबन छह हजार रुपये की लागत आई और प्रतिबीघा 25 पैकेट की पैदावार हुई। आलू खुदते ही शहर के लोग खेत में पहुंचने लगे और खेत से ही उनका आठ बीघा खेत में तैयार हुआ आलू दो हजार रुपया प्रति क्विंटल बिक गया। उमेश अग्रवाल का कहना है कि उन्हें 19 हजार रुपया शुद्घ लाभ हुआ है।
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अगली बार वह 50 बीघा भूमि में फुलवा आलू तैयार करेंगे। इससे विलुप्त प्रजाति को बचाकर फुलवा आलू की फसल करने के लिए किसानों को फिर प्रेरित किया जाए। प्रगतिशील किसान नारद सिंह का कहना है कि एस-1 तथा कुफरी पुखराज आलू पैदावार में अच्छे हैं लेकिन इनके भाव न के बराबर मिलते हैं।


जहां 19 हजार रुपया प्रतिबीघा मुनाफा होने से उमेश अग्रवाल फूले नहीं समा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ नगला जसे के रहने वाले किसान रामबहादुर वर्मा का कहना है कि आलू की खेती करने से वह हजारों के कर्ज में डूब गए हैं। हालात यह हैं कि मंदी के चलते उन्होंने अपना आलू नहीं बेचा है, जिससे वह अपने बच्चों को रंगों के इस त्योहार पर कपड़े तक नहीं दिला सके हैं। कमोवेश यही कहना गांव जिंदापुर के किसान मानू का है। उनका कहना है कि उन्होंने मंदी के चलते अपना समूचा आलू शीतगृह में भंडारित कर दिया। इस वजह से उनकी होली फीकी हो गई है।
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