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परेशान न हों किसान, सरसों से पूरा करें नुकसान
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गांव झब्बूपुर में बिना बारिश के सूखती धान की फसल व खेत में पड़ी दरारें। संवाद
- फोटो : FARRUKHABAD
फर्रुखाबाद। बारिश की बेरुखी से धान की रोपाई न कर पाने वाले किसान सरसों (लाही) की फसल से नुकसान की भरपाई कर सकते हैं। कम पानी वाली यह फसल धान से भी कम लागत में तैयार होगी और इसके तैयार होने के बाद आलू व गेहूं की बुवाई भी की जा सकती है। मुनाफे के मामले में भी यह धान से कहीं ज्यादा बेहतर है।
धान की एक बीघा में फसल तैयार करने पर करीब ढाई हजार रुपये खर्च आता है। इतने क्षेत्रफल में चार से पांच क्विंटल धान होता है। पिछले सत्र में सरकार ने धान का समर्थन मूल्य 1940 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था। भाड़ा और पल्लेदारी को हटा कर किसानों को छह से सात हजार रुपये ही मुश्किल से बच सके थे। एक बीघा में सरसों की बात करें तो इसकी पैदावार करीब दो क्विंटल होती है।
इतने क्षेत्रफल में लागत करीब एक हजार रुपये ही आती है। पिछले सत्र में यह छह से सात हजार रुपये क्विंटल बिकी थी। बिक्री व्यापारियों ने सीधे किसानों से कर ली थी, इसलिए भाड़ा और पल्लेदारी पर भी खर्च नहीं करना पड़ा था। इससे किसानों को 11 से 13 हजार रुपये की बचत हुई थी।
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सरसों में जहां 10 बार सिंचाई करनी होती है वहीं सरसों की फसल दो सिंचाई में ही तैयार हो जाती है। यानी कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए भी सरसों अच्छी फसल साबित होगी।
कुछ समय इंतजार करने के बाद किसान अगस्त के अंतिम सप्ताह या फिर सितंबर के पहले सप्ताह में सरसों की बुवाई कर सकते हैं। दो से ढाई माह में फसल तैयार हो जाती है। इससे नवंबर में आलू की पक्की फसल व गेहूं की बुवाई का भरपूर मौका भी मिल जाएगा।
62 फीसदी से ज्यादा हो चुकी है धान की रोपाई
जनपद में कृषि विभाग को धान की फसल के लिए 13 हजार 392 हेक्टेयर रोपाई का लक्ष्य मिला है। इसके सापेक्ष अब तक 8315 हेक्टेयर धान की रोपाई की गई। यह लक्ष्य के सापेक्ष 62.09 प्रतिशत है। गत वर्ष जुलाई में 155.73 मिमी बारिश होने से धान की फसलें खेतों में लहलहा रही थीं। इस वर्ष तो शुरुआत से मौसम की बेरुखी ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
बादल ऐसे रूठे कि धान की रोपाई तो दूर की बात अधिकांश किसान खरीफ में अन्य फसलों की भी बुवाई नहीं कर सके। जिन किसानों ने धान की रोपाई निजी नलकूपों के सहारे कर भी दी, उन्हें फसल तैयार करना चुनौती बना हुआ है। इस वर्ष जुलाई में अब तक मात्र 22.30 मिमी ही बारिश होने से किसान खासे चिंतित हैं। कृषि विभाग के रिकार्ड के अनुसार धान के अलावा अन्य खरीफ की फसलों की बुवाई भी औसतन 67 प्रतिशत ही की जा सकी है।
नुकसान से बचने के लिए किसानों के पास कई विकल्प
जिला कृषि अधिकारी बीके सिंह ने बताया कि उड़द, मूंग व तिल की अभी बुवाई हो सकती है। यदि कुछ दिन और रुककर सरसों की बुवाई की जाए तो खरीफ की छूटी फसल की भी भरपाई हो सकती है। लाही के अलावा मूली व हरी मटर की फसलें भी खरीफ की फसल की भरपाई के लिए कारगर होंगी।
सावन में रूठे बदरा, चटक रहे धान के खेत
कायमगंज। सावन में बिना बारिश के धान की फसल मुरझा रही है और खेत सूखने से दरारें नजर आने लगी हैं। ट्यूबवेल से सिंचाई महंगी पड़ रही है। सावन के महीने में बादल तो उमड़ रहे हैं, मगर बरस नहीं रहे हैं। इससे खेतों की प्यास नहीं बुझ पा रही है। सूरज की तल्खी के चलते तापमान बढ़ता जा रहा है। इससे किसानों को धान की फसल बचाने की चिंता सता रही है। (संवाद)
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धान की एक बीघा में फसल तैयार करने पर करीब ढाई हजार रुपये खर्च आता है। इतने क्षेत्रफल में चार से पांच क्विंटल धान होता है। पिछले सत्र में सरकार ने धान का समर्थन मूल्य 1940 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था। भाड़ा और पल्लेदारी को हटा कर किसानों को छह से सात हजार रुपये ही मुश्किल से बच सके थे। एक बीघा में सरसों की बात करें तो इसकी पैदावार करीब दो क्विंटल होती है।
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इतने क्षेत्रफल में लागत करीब एक हजार रुपये ही आती है। पिछले सत्र में यह छह से सात हजार रुपये क्विंटल बिकी थी। बिक्री व्यापारियों ने सीधे किसानों से कर ली थी, इसलिए भाड़ा और पल्लेदारी पर भी खर्च नहीं करना पड़ा था। इससे किसानों को 11 से 13 हजार रुपये की बचत हुई थी।
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सरसों में जहां 10 बार सिंचाई करनी होती है वहीं सरसों की फसल दो सिंचाई में ही तैयार हो जाती है। यानी कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए भी सरसों अच्छी फसल साबित होगी।
कुछ समय इंतजार करने के बाद किसान अगस्त के अंतिम सप्ताह या फिर सितंबर के पहले सप्ताह में सरसों की बुवाई कर सकते हैं। दो से ढाई माह में फसल तैयार हो जाती है। इससे नवंबर में आलू की पक्की फसल व गेहूं की बुवाई का भरपूर मौका भी मिल जाएगा।
62 फीसदी से ज्यादा हो चुकी है धान की रोपाई
जनपद में कृषि विभाग को धान की फसल के लिए 13 हजार 392 हेक्टेयर रोपाई का लक्ष्य मिला है। इसके सापेक्ष अब तक 8315 हेक्टेयर धान की रोपाई की गई। यह लक्ष्य के सापेक्ष 62.09 प्रतिशत है। गत वर्ष जुलाई में 155.73 मिमी बारिश होने से धान की फसलें खेतों में लहलहा रही थीं। इस वर्ष तो शुरुआत से मौसम की बेरुखी ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
बादल ऐसे रूठे कि धान की रोपाई तो दूर की बात अधिकांश किसान खरीफ में अन्य फसलों की भी बुवाई नहीं कर सके। जिन किसानों ने धान की रोपाई निजी नलकूपों के सहारे कर भी दी, उन्हें फसल तैयार करना चुनौती बना हुआ है। इस वर्ष जुलाई में अब तक मात्र 22.30 मिमी ही बारिश होने से किसान खासे चिंतित हैं। कृषि विभाग के रिकार्ड के अनुसार धान के अलावा अन्य खरीफ की फसलों की बुवाई भी औसतन 67 प्रतिशत ही की जा सकी है।
नुकसान से बचने के लिए किसानों के पास कई विकल्प
जिला कृषि अधिकारी बीके सिंह ने बताया कि उड़द, मूंग व तिल की अभी बुवाई हो सकती है। यदि कुछ दिन और रुककर सरसों की बुवाई की जाए तो खरीफ की छूटी फसल की भी भरपाई हो सकती है। लाही के अलावा मूली व हरी मटर की फसलें भी खरीफ की फसल की भरपाई के लिए कारगर होंगी।
सावन में रूठे बदरा, चटक रहे धान के खेत
कायमगंज। सावन में बिना बारिश के धान की फसल मुरझा रही है और खेत सूखने से दरारें नजर आने लगी हैं। ट्यूबवेल से सिंचाई महंगी पड़ रही है। सावन के महीने में बादल तो उमड़ रहे हैं, मगर बरस नहीं रहे हैं। इससे खेतों की प्यास नहीं बुझ पा रही है। सूरज की तल्खी के चलते तापमान बढ़ता जा रहा है। इससे किसानों को धान की फसल बचाने की चिंता सता रही है। (संवाद)