{"_id":"1bcb4ba80ff9b96467b0b859eb9b201b","slug":"the-name-of-the-school-building-non-power-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"नाम के स्कूल, भवन न बिजली","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
नाम के स्कूल, भवन न बिजली
फैजाबाद/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 20 Aug 2015 12:59 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
फैजाबाद व अयोध्या नगरीय क्षेत्र में
विज्ञापन
प्राथमिक स्कूलों की तादात 43 और पूर्व माध्यमिक स्कूलों की संख्या 13 है।
इन 56 स्कूलों में मात्र 83 शिक्षक पढ़ाई व्यवस्था की पोल खोलने के लिए
काफी है।
यहीं नहीं बदहाली के कारण ही साढ़े तीन हजार बच्चे ही नामांकित हैं। मगर सरकारी खजाने से खर्च सालाना 32 करोड़ चार लाख सिर्फ वेतन में हो रहा है।
सरकारी स्कूलों की बदहाली के चलते एलीट वर्ग ही नहीं, मध्यम से लेकर मजदूर वर्ग भी जैसे-तैसे अपने बच्चों का अच्छे स्कूलों में दाखिला करा रहा है।
लोगों में सरकारी शिक्षा व्यवस्था के प्रति गहरा आक्रोश है। मगर जिनको चुनकर भेजते हैं, वे भी अपने निजी स्कूल खोल सरकारी शिक्षा को जस का तस बनाए रखने में ही रुचि दिखाते हैं।
आला अफसर हों या कर्मचारी सबके बच्चे कान्वेंट स्कूलों में जाते हैं। लाल-नीली बत्ती की कतारें यहां इन स्कूलों में चाहे बच्चों को छोड़ना हो या ले आना अथवा अभिभावकों की मीटिंगों में छाई रहती हैं।
जिले के आला हाकिम की पुत्री शहर के एक नामी निजी स्कूल में पढ़ती है। उन्हीं की राह पर अन्य अफसर भी हैं। कचेहरी और सदर तहसील के आसपास अफसरों का परिवार रहता है।
इन परिवारों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने जाते हैं। जो अफसर अभी युवा हैं, उनके बच्चे तो यहां पढ़ते हैं लेकिन जिनकी उम्र ज्यादा है, उनके बच्चे अब या तो रोजगार पा चुके है या बाहर उच्च कक्षाओं में पढ़ रहे हैं।
यहां के विधायक, सांसद व पूर्व सांसद व पूर्व विधायक ज्यादातर उम्र दराज है। लेकिन इनके परिवार के बच्चे निजी स्कूलों में ही पढ़ने जाते हैं। मोदहा चौराहा, गद्दोपुर, चक्रतीर्थ परिक्रमा चौराहा, सआदतगंज आदि स्थानों पर जब छुट्टी होती है तो अफसरों और नेताओं की गाड़ियों से हर रोज इन जगहों पर जाम लग जाता है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत जिले के 10 कान्वेंट स्कूलों में उनके यहां से संबंधित विभिन्न बिंदुओं पर जानकारी मांगी गई।
आरटीआई एक्टिविस्ट सभाजीत सिंह ने संयुक्त शिक्षा निदेशक से जानकारी मांगी तो उन्होंने डीआईओएस को निर्देशित किया। डीआईओएस ने विभिन्न स्कूलों के प्रबंधक व प्रधानाचार्यों से जवाब देने का निर्देश दिया।
लेकिन उनके निर्देश को कान्वेंट स्कूलों ने हवा में उड़ा दिया। पब्लिक स्कूल एसोसिएशन की ओर से जो जवाब दिया गया वह गोलमाल था।
विद्युतीकरण के नाम पर हुई अंधेरगर्दी और उसके रख-रखाव के प्रति लापरवाही का नतीजा रहा कि कागजों में बिजली से रोशन होने के बाद भी जिले के सभी ब्लॉकों में दर्जनों स्कूल ऐसे है जो विद्युतीकृत तो है लेकिन ऊर्जीकृत नहीं है।
सर्व शिक्षा अभियान के तहत छह वर्ष पहले 817 प्राथमिक स्कूलों व 796 जूनियर हाई स्कूलों को बिजली की सुविधा से लैस किया गया। प्रति विद्यालय 30 हजार रुपये खर्च हुए थे।
इस मद में तकरीबन तीन करोड़ 60 लाख रुपये व्यय हुए। बिजली की सुविधा तो इन विद्यालयों को दो-एक माह के लिए मिली लेकिन इसके बाद बल्ब, ट्यूब लाइट और पंखे तो खराब होने शुरू ही हो गए, रही-सही कसर चोरों ने पूरी कर दी। केबल को काट ले गए।
तारुन ब्लॉक के प्राथमिक व जूनियर हाईस्कूल बरेहटा में वायरिंग हुई और पंखे भी लटके है। लेकिन यहां पर बिजली का संयोजन नहीं हुआ है। जूनियर हाईस्कूल बरेहटा में तो बिजली का बिल भी आ गया था।
प्राथमिक स्कूल तारापुर का बिल कई बार आया लेकिन यहां पर बिजली का कनेक्शन ही नहीं हो पाया। जबकि जूनियर हाईस्कूल तारापुर में पंखा तो लटका है। लेकिन इसका कोई मतलब ही नहीं है। तार को चोर काट ले गए।
अमानीगंज शिक्षा क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय नागीपुर, बरौली, सिकटी, बचकुना और पूर्व माध्यमिक विद्यालय पूरा बली एवं ताजपुर को विद्युतीकृत किया गया। लेकिन यहां पर मौके पर बिजली की सुविधा नहीं मिल पा रही है।
इनमें से ज्यादातर स्कूलों में लगी केबिल को चोर काट ले गए। कमोबेश ऐसी ही स्याह तस्वीरें जिले के अन्य शिक्षा क्षेत्रों मयाबाजार, पूरा बाजार, मसौधा, बीकापुर, हैरिंग्टनगंज, रुदौली, मवई और मिल्कीपुर में विद्युतीकृत हुए स्कूलों की है।
फैजाबाद शहर के रीडगंज स्थित परिषदीय विद्यालय का भवन जर्जर हो ढह रहा है। प्रांगण में घास बेतरतीब ढंग से बढ़ी हुई है। दीवारों में दरारें पड़ गई है। छत का प्लास्टर भी कई जगहों पर गिर रहा है।
जो कि बच्चों के लिए खतरे का सबब बन सकता है। हाल यह है कि गेट पर कभी-कभी इस कदर चलती-फिरती दुकानें सज जाती है कि स्कूल बड़ी मुश्किल से दिखता है।
अयोध्या का प्राथमिक व जूनियर हाईस्कूल सोनखरकुंड में छात्र/छात्राओं की तादात 150 है। इसमें 120 प्राथमिक व 30 बच्चे जूनियर हाईस्कूल में नामांकित हैं। प्राइमरी के पास एक कमरा व जूनियर के पास भी सिर्फ एक ही कमरा है।
बिजली नहीं है और छोटी-छोटी सिर्फ दो खिड़की हैं। जिससे दिन में भी अंधेरा पसरा रहता है। बेसिक शिक्षा विभाग किराए के दो कमरों में दो स्कूल संचालित कर अपना करिश्मा दिखा रहा है।
विज्ञापन
अयोध्या के जूनियर हाईस्कूल कन्या रायगंज प्रांगण में तीन स्कूल एक साथ संचालित किए जा रहे हैं। यहां पर शिक्षण कक्ष सिर्फ चार हैं और तीनों स्कूलों में कुल 238 बच्चे नामांकित है। यहां पर कुछ कमरे बरसात में टपकते रहते है।
बिजली संयोजन की सुविधा स्कूल को नहीं मिली। जूनियर हाईस्कूल कन्या रायगंज में 48 बच्चे है। प्रा.वि. रामकोट प्रथम में 150 छात्र जबकि प्रा.वि. रामपुर द्वितीय में 40 बच्चे है।
रामपुर द्वितीय में बच्चे बरामदे में पढ़ने को मजबूर हैं। रुदौली के प्राथमिक विद्यालय हैदरगंज शहबाजपुर को कागजों में बिजली से रोशन कर दिया। लेकिन कुछ ही दिन बाद यहां की बिजली गुल हो गई।
कहने को तो पंखा, बल्ब आदि सुविधाओं से लैस किया गया। लेकिन बच्चों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। यहां पर चार शिक्षक तैनात है। इनके समय से नहीं आने की चर्चा इलाके में खूब रहती है।
न खेल का मैदान है और न ही प्रसाधन की समुचित सुविधा है। रुदौली के प्राथमिक विद्यालय सरसंडा में सुविधाओं का अभाव है। अतिरिक्त कमरे का दरवाजा उखड़ गया है। साफ-सफाई का अभाव है।
बरसात में कमरा टपकता है। खेल का मैदान नहीं है। बिजली से स्कूल को संयोजित तो किया गया लेकिन अब यहां पर बिजली ही नहीं है। जिसके कारण बच्चों को बिजली से मिलने वाली सुविधाएं हासिल नहीं हो पा रही है।
बीकापुर के प्राथमिक स्कूल कन्या विद्यालय खजुरहट के बच्चों के शारीरिक विकास के लिए खेल की सुविधाएं नदारद है। विद्यालय की जमीन पर अतिक्रमणकारियों ने कब्जा कर दुकान भी बना ली और विभाग सिर्फ पत्र पर पत्र जारी करता रहा।
यहां पर बच्चों के लिए न तो लाइब्रेरी है और न ही अन्य जरूरी सुविधाएं। प्रसाधन की स्थिति भी अच्छी नहीं है। प्राथमिक विद्यालय देवकाली किराए के भवन में संचालित होता है।
लेकिन भवन काफी जर्जर है। गौरतलब है कि इस विद्यालय को खोज पाना भी मुश्किल है। जिस भवन में इसका वजूद कागजों में बताया जाता है, वहां पर विद्यालय होने के कोई चिन्ह नजर नहीं आते।
सड़क उस पार देवकाली मंदिर प्रांगण में स्थित पेड़ के नीचे बच्चे पढ़ाए जाते हैं। श्रद्धालु सोमवार और शुक्रवार को ज्यादा तादात में आते है। इसलिए इन दो दिनों में बच्चों के लिए पेड़ की वह छाया भी नहीं मिल पाती है। क्योंकि श्रद्धालु उसी जगह पर भोग-प्रसाद बनाते है।
बीएसए प्रदीप कुमार द्विवेदी का कहना है कि न्यायालय के आदेश का परिषदीय स्कूलों के शैक्षिक परिवेश में निश्चित तौर पर सुधार होगा। बुनियादी सुविधाओं का भी विस्तार होगा। क्योंकि जब बच्चों की तादात बढ़ेगी तो उसी अनुपात में अन्य सुविधाएं भी दी जाएगी। बुनियादी शिक्षा की बेहतर संभावनाएं बनेगी और इसका व्यापक स्तर पर असर पड़ेगा।
यहीं नहीं बदहाली के कारण ही साढ़े तीन हजार बच्चे ही नामांकित हैं। मगर सरकारी खजाने से खर्च सालाना 32 करोड़ चार लाख सिर्फ वेतन में हो रहा है।
सरकारी स्कूलों की बदहाली के चलते एलीट वर्ग ही नहीं, मध्यम से लेकर मजदूर वर्ग भी जैसे-तैसे अपने बच्चों का अच्छे स्कूलों में दाखिला करा रहा है।
लोगों में सरकारी शिक्षा व्यवस्था के प्रति गहरा आक्रोश है। मगर जिनको चुनकर भेजते हैं, वे भी अपने निजी स्कूल खोल सरकारी शिक्षा को जस का तस बनाए रखने में ही रुचि दिखाते हैं।
आला अफसर हों या कर्मचारी सबके बच्चे कान्वेंट स्कूलों में जाते हैं। लाल-नीली बत्ती की कतारें यहां इन स्कूलों में चाहे बच्चों को छोड़ना हो या ले आना अथवा अभिभावकों की मीटिंगों में छाई रहती हैं।
जिले के आला हाकिम की पुत्री शहर के एक नामी निजी स्कूल में पढ़ती है। उन्हीं की राह पर अन्य अफसर भी हैं। कचेहरी और सदर तहसील के आसपास अफसरों का परिवार रहता है।
इन परिवारों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने जाते हैं। जो अफसर अभी युवा हैं, उनके बच्चे तो यहां पढ़ते हैं लेकिन जिनकी उम्र ज्यादा है, उनके बच्चे अब या तो रोजगार पा चुके है या बाहर उच्च कक्षाओं में पढ़ रहे हैं।
यहां के विधायक, सांसद व पूर्व सांसद व पूर्व विधायक ज्यादातर उम्र दराज है। लेकिन इनके परिवार के बच्चे निजी स्कूलों में ही पढ़ने जाते हैं। मोदहा चौराहा, गद्दोपुर, चक्रतीर्थ परिक्रमा चौराहा, सआदतगंज आदि स्थानों पर जब छुट्टी होती है तो अफसरों और नेताओं की गाड़ियों से हर रोज इन जगहों पर जाम लग जाता है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत जिले के 10 कान्वेंट स्कूलों में उनके यहां से संबंधित विभिन्न बिंदुओं पर जानकारी मांगी गई।
आरटीआई एक्टिविस्ट सभाजीत सिंह ने संयुक्त शिक्षा निदेशक से जानकारी मांगी तो उन्होंने डीआईओएस को निर्देशित किया। डीआईओएस ने विभिन्न स्कूलों के प्रबंधक व प्रधानाचार्यों से जवाब देने का निर्देश दिया।
लेकिन उनके निर्देश को कान्वेंट स्कूलों ने हवा में उड़ा दिया। पब्लिक स्कूल एसोसिएशन की ओर से जो जवाब दिया गया वह गोलमाल था।
विद्युतीकरण के नाम पर हुई अंधेरगर्दी और उसके रख-रखाव के प्रति लापरवाही का नतीजा रहा कि कागजों में बिजली से रोशन होने के बाद भी जिले के सभी ब्लॉकों में दर्जनों स्कूल ऐसे है जो विद्युतीकृत तो है लेकिन ऊर्जीकृत नहीं है।
सर्व शिक्षा अभियान के तहत छह वर्ष पहले 817 प्राथमिक स्कूलों व 796 जूनियर हाई स्कूलों को बिजली की सुविधा से लैस किया गया। प्रति विद्यालय 30 हजार रुपये खर्च हुए थे।
इस मद में तकरीबन तीन करोड़ 60 लाख रुपये व्यय हुए। बिजली की सुविधा तो इन विद्यालयों को दो-एक माह के लिए मिली लेकिन इसके बाद बल्ब, ट्यूब लाइट और पंखे तो खराब होने शुरू ही हो गए, रही-सही कसर चोरों ने पूरी कर दी। केबल को काट ले गए।
तारुन ब्लॉक के प्राथमिक व जूनियर हाईस्कूल बरेहटा में वायरिंग हुई और पंखे भी लटके है। लेकिन यहां पर बिजली का संयोजन नहीं हुआ है। जूनियर हाईस्कूल बरेहटा में तो बिजली का बिल भी आ गया था।
प्राथमिक स्कूल तारापुर का बिल कई बार आया लेकिन यहां पर बिजली का कनेक्शन ही नहीं हो पाया। जबकि जूनियर हाईस्कूल तारापुर में पंखा तो लटका है। लेकिन इसका कोई मतलब ही नहीं है। तार को चोर काट ले गए।
अमानीगंज शिक्षा क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय नागीपुर, बरौली, सिकटी, बचकुना और पूर्व माध्यमिक विद्यालय पूरा बली एवं ताजपुर को विद्युतीकृत किया गया। लेकिन यहां पर मौके पर बिजली की सुविधा नहीं मिल पा रही है।
इनमें से ज्यादातर स्कूलों में लगी केबिल को चोर काट ले गए। कमोबेश ऐसी ही स्याह तस्वीरें जिले के अन्य शिक्षा क्षेत्रों मयाबाजार, पूरा बाजार, मसौधा, बीकापुर, हैरिंग्टनगंज, रुदौली, मवई और मिल्कीपुर में विद्युतीकृत हुए स्कूलों की है।
फैजाबाद शहर के रीडगंज स्थित परिषदीय विद्यालय का भवन जर्जर हो ढह रहा है। प्रांगण में घास बेतरतीब ढंग से बढ़ी हुई है। दीवारों में दरारें पड़ गई है। छत का प्लास्टर भी कई जगहों पर गिर रहा है।
जो कि बच्चों के लिए खतरे का सबब बन सकता है। हाल यह है कि गेट पर कभी-कभी इस कदर चलती-फिरती दुकानें सज जाती है कि स्कूल बड़ी मुश्किल से दिखता है।
अयोध्या का प्राथमिक व जूनियर हाईस्कूल सोनखरकुंड में छात्र/छात्राओं की तादात 150 है। इसमें 120 प्राथमिक व 30 बच्चे जूनियर हाईस्कूल में नामांकित हैं। प्राइमरी के पास एक कमरा व जूनियर के पास भी सिर्फ एक ही कमरा है।
विज्ञापन
बिजली नहीं है और छोटी-छोटी सिर्फ दो खिड़की हैं। जिससे दिन में भी अंधेरा पसरा रहता है। बेसिक शिक्षा विभाग किराए के दो कमरों में दो स्कूल संचालित कर अपना करिश्मा दिखा रहा है।
विज्ञापन
अयोध्या के जूनियर हाईस्कूल कन्या रायगंज प्रांगण में तीन स्कूल एक साथ संचालित किए जा रहे हैं। यहां पर शिक्षण कक्ष सिर्फ चार हैं और तीनों स्कूलों में कुल 238 बच्चे नामांकित है। यहां पर कुछ कमरे बरसात में टपकते रहते है।
बिजली संयोजन की सुविधा स्कूल को नहीं मिली। जूनियर हाईस्कूल कन्या रायगंज में 48 बच्चे है। प्रा.वि. रामकोट प्रथम में 150 छात्र जबकि प्रा.वि. रामपुर द्वितीय में 40 बच्चे है।
रामपुर द्वितीय में बच्चे बरामदे में पढ़ने को मजबूर हैं। रुदौली के प्राथमिक विद्यालय हैदरगंज शहबाजपुर को कागजों में बिजली से रोशन कर दिया। लेकिन कुछ ही दिन बाद यहां की बिजली गुल हो गई।
कहने को तो पंखा, बल्ब आदि सुविधाओं से लैस किया गया। लेकिन बच्चों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। यहां पर चार शिक्षक तैनात है। इनके समय से नहीं आने की चर्चा इलाके में खूब रहती है।
न खेल का मैदान है और न ही प्रसाधन की समुचित सुविधा है। रुदौली के प्राथमिक विद्यालय सरसंडा में सुविधाओं का अभाव है। अतिरिक्त कमरे का दरवाजा उखड़ गया है। साफ-सफाई का अभाव है।
बरसात में कमरा टपकता है। खेल का मैदान नहीं है। बिजली से स्कूल को संयोजित तो किया गया लेकिन अब यहां पर बिजली ही नहीं है। जिसके कारण बच्चों को बिजली से मिलने वाली सुविधाएं हासिल नहीं हो पा रही है।
बीकापुर के प्राथमिक स्कूल कन्या विद्यालय खजुरहट के बच्चों के शारीरिक विकास के लिए खेल की सुविधाएं नदारद है। विद्यालय की जमीन पर अतिक्रमणकारियों ने कब्जा कर दुकान भी बना ली और विभाग सिर्फ पत्र पर पत्र जारी करता रहा।
यहां पर बच्चों के लिए न तो लाइब्रेरी है और न ही अन्य जरूरी सुविधाएं। प्रसाधन की स्थिति भी अच्छी नहीं है। प्राथमिक विद्यालय देवकाली किराए के भवन में संचालित होता है।
लेकिन भवन काफी जर्जर है। गौरतलब है कि इस विद्यालय को खोज पाना भी मुश्किल है। जिस भवन में इसका वजूद कागजों में बताया जाता है, वहां पर विद्यालय होने के कोई चिन्ह नजर नहीं आते।
सड़क उस पार देवकाली मंदिर प्रांगण में स्थित पेड़ के नीचे बच्चे पढ़ाए जाते हैं। श्रद्धालु सोमवार और शुक्रवार को ज्यादा तादात में आते है। इसलिए इन दो दिनों में बच्चों के लिए पेड़ की वह छाया भी नहीं मिल पाती है। क्योंकि श्रद्धालु उसी जगह पर भोग-प्रसाद बनाते है।
बीएसए प्रदीप कुमार द्विवेदी का कहना है कि न्यायालय के आदेश का परिषदीय स्कूलों के शैक्षिक परिवेश में निश्चित तौर पर सुधार होगा। बुनियादी सुविधाओं का भी विस्तार होगा। क्योंकि जब बच्चों की तादात बढ़ेगी तो उसी अनुपात में अन्य सुविधाएं भी दी जाएगी। बुनियादी शिक्षा की बेहतर संभावनाएं बनेगी और इसका व्यापक स्तर पर असर पड़ेगा।