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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Ayodhya News ›   Shaheed Smritika vibrant memories of martyrs

शहीद स्मृतिका से जीवंत शहीदों की यादें

Fri, 14 Aug 2015 11:29 PM IST
फैजाबाद/अमर उजाला ब्यूरो
फैजाबाद/अमर उजाला ब्यूरो Updated Fri, 14 Aug 2015 11:29 PM IST
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चौक स्थित सैन्य शहीद स्मृतिका पर हर महीने कोई न कोई कार्यक्रम होता है। यहां जगह भले ही कम क्यों न हो पर शहीदों की यादें संजोने की कोशिश में सेना काफी योगदान देती है। यहां छावनी स्थित विभिन्न कोर कमाडंरों के कार्यक्रम भी लोगों में जोश व देशभक्ति का जज्बा भरते हैं।
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चाहे वह चीन के खिलाफ युद्ध हो या पाकिस्तान के खिलाफ, जिन सपूतों ने अपने प्राणों की आहुति देश के लिए दी, उनकी स्मृतियों को यहां पर सहेजा गया है। स्वाधीनता दिवस के मद्देनजर यहां साफ-सफाई की गई है। तकरीबन दो दशक पहले चौक में सैन्य शहीद स्मृतिका की स्थापना कुछ लोगों ने की थी।
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अठारह सौ सत्तावनी क्रांति के नायक मंगल पांडेय का घना रिश्ता जिले से रहा, इसलिए इस स्थान को बोलचाल की भाषा में शहीद मंगल पांडेय चौक भी कहा जाता है। स्मृतिका का निर्माण ओम प्रकाश सिंह नाहर की अगुवाई में देशभक्तों के एक समूह ने की।
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जिले के जिन वीर सपूतों ने देश की सरहदों की रक्षा के लिए अपनी जान दे दी, उनकी शहादत को यहां पर नमन किया जाता है। शहीदों के परिजनों को भी यहां पर आमंत्रित कर सम्मानित व अलंकृत किया जाता है। वैसे तो यहां पर अनेक संस्थाएं कार्यक्रम करती रहतीं हैं लेकिन मुख्य रूप से शहीद स्मारक समिति ही स्मृतिका पर बड़े-बड़े कार्यक्रम करवाता है।

सेना के अफसर भी इन कार्यक्रमों में शिरकत करते हैं। शहीद स्मारक समिति के संस्थापक पदाधिकारी ओमप्रकाश सिंह नाहर कहते हैं कि युवावस्था में देश के प्रति मर-मिटने वालों के लिए ऐसा जोश और जज्बा जागा कि शहीदों की स्मृतियों को तरोताजा करने व उनकी यादों को सहेजने के लिए मेरा जीवन समर्पित हो गया।

आज भले लोग आजादी का जश्न मना रहे हों पर वतन को आजाद कराने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर बलिवेदी पर हंसते-हंसते झूल जाने वाले अमर शहीद अशफाक उल्ला खां अब भी आजाद नहीं हो पाए हैं। यहां बात हो रही है जिला कारागार की प्राचीर में कैद अमर शहीद के बलिदान स्थल की, जहां आज भी आम लोग दो फूल चढ़ाने को तरस जाते हैं।

दीगर बात है कि मंडल कारागार स्थित उनके बलिदान स्थल पर 19 दिसंबर को हर बरस मेले जैसा आयोजन होता है। लेकिन यह हमेशा दीवारों व सीखचों में ही कैद रहता है। कारागार की सुरक्षा का वास्ता दे मंडल कारागार प्रशासन ने इसे जेल की दीवारों के अंदर करवा दिया है।


इस वजह से देशभक्ति से लबरेज लोग यदि शहीद को शीश नवाने पहुंचते हैं तो उनके मन में कसक बनी रह जाती है। वे बाहर से भले शहीद को नमन कर लें,  लेकिन अंदर जाने की इजाजत नहीं मिलती।
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