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सनातन धर्म की रक्षा में सहायक है रामायण मेले का आयोजन: वासुदेवानंद
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रामायण मेले के शुभारंभ मौके पर मौजूद संत-धर्माचार्य।
- फोटो : FAIZABAD
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अयोध्या। रामायण मेले की परिकल्पना लोहिया जी ने की थी। पहले रामायण सम्मेलन होते थे। पहला रामायण मेला चित्रकूट में प्रारंभ हुआ। उसके बाद अवध और श्रृंग्वेरपुर में रामायण मेले का शुभारंभ हुआ।
रामायण मेले के आयोजन से न सिर्फ राम व रामायण की संस्कृति का प्रचार-प्रसार होता है बल्कि सनातन धर्म की रक्षा में भी रामायण मेला सहायक है। ये बातें श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के ट्रस्टी ज.गु.वासुदेवानंद सरस्वती ने 39वें रामायण मेले का उद्घाटन करते हुए कहीं।
उन्होंने कहा कि बहुत कुछ करना पड़ता है तो सनातन धर्म की रक्षा होती है। भगवान राम का चरित्र अद्भुत और अद्वितीय है। उनके नाम की महिमा यह है कि गणिका और अजामिल भी तर गए। भगवान की कृपा हो तभी उनका नाम प्रसाद भी मिलता है। अवध धाम में रामायण मेले के पावन पर्व पर रामकथा सुनने का अवसर मिले इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है।
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अध्यक्षता कर रहे मणिरामदास की छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमलनयन दास ने कहा कि भगवान राम के आदर्शों को अपनाकर ही राष्ट्र की एकता और अखंडता संभव है। हर घर रामायण हो, राम चरित्र सभी को पढ़ना चाहिए। कहा कि इस वर्ष कोरोना के चलते रामायण मेले का आयोजन सीमित स्तर पर किया गया है। रामायण मेले उनके आदर्शों के प्रसार का सशक्त माध्यम है।
संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि अयोध्या व जनकपुर का रिश्ते को जोड़ने में रामकथा ही माध्यम है। रामायण मेले को स्वामी विनोदानंद सरस्वती, महंत कन्हैयादास रामायणी, आचार्य देवमुरारी बापू सहित अन्य संतों ने भी संबोधित किया। इससे पूर्व रामायण मेले के मुख्य अतिथि ज.गु.वासुदेवानंद सरस्वती व महंत कमलनयन दास ने द्वीप प्रज्वलन कर रामायण मेले का शुभारंभ किया।
रामायण मेला समिति के महामंत्री शीतला सिंह व दीपकृष्ण वर्मा ने संतों का स्वागत किया। संचालन कमलेश सिंह ने किया। इस दौरान महंत सुरेश दास, महंत गिरीशपति त्रिपाठी, महंत जन्मेजय शरण, नंद कुमार मिश्र सहित अन्य मौजूद रहे।
अंग्रेजों ने अलग किया, नेपाल है भारत का अंग
रामायण मेले में पहुंचे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्टी ज.गु.वासुदेवानंद सरस्वती ने पत्रकारों से कहा कि अंग्रेजों ने नेपाल को भारत से अलग कर दिया है, नेपाल भारत का ही अंग है। भारत व नेपाल के संस्कृति व संस्कार एक हैं, नेपाल भारत का एक प्रदेश है। बड़ी बात यह है कि नेपाल हमारे ज्योर्तिमठ के अंतर्गत आता है। मठ का प्रचार-प्रसार उत्तर भारत से लेकर पंजाब और पंचाल तक है। पंचाल के अंतर्गत सुमेरांचल, उत्तरांचल, नेपालांचल, अरूणांचल सहित पांच अंचल है, जहां तक ज्योर्तिमठ का प्रचार-प्रसार है। नेपाल हमेशा भारत का अंग रहा। उन्होंने कहा कि अखंड भारत की कल्पना बहुत आगे तक रही है। शंकराचार्य तो ईरान तक गए हैं। भौगोलिक स्थिति के अनुसार नेपाल भारत का ही अंग रहा है, राजनीतिक स्थिति बदलती रहती है।
70 एकड़ परिसर का किया जाएगा विस्तार
राममंदिर निर्माण कार्य में हो रही देरी पर ज.गु.वासुदेवानंद सरस्वती ने कहा कि राममंदिर भव्य और मजबूत बनना चाहिए कम से कम एक हजार वर्ष उसकी आयु हो। इसको लेकर वास्तुविद व इंजीनियर व्यवस्था करने में जुटे हुए हैं। हम सभी चाहते हैं कि जल्द से जल्द मंदिर बने लेकिन टिकाऊ व मजबूत हो यह भी जरूरी है। बताया कि 70 एकड़ भूमि में जो जीर्णशीर्ण मंदिर हैं उनमें विराजमान विग्रह को परिसर में नया मंदिर बनाकर स्थापित किया जाएगा। कहा कि राममंदिर परिसर में कई प्रकल्प बनने हैं इसलिए 70 एकड़ से ज्यादा जमीन की जरूरत पड़ सकती है, आवश्यकता होने पर और जमीन ले जाएगी।
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रामायण मेले के आयोजन से न सिर्फ राम व रामायण की संस्कृति का प्रचार-प्रसार होता है बल्कि सनातन धर्म की रक्षा में भी रामायण मेला सहायक है। ये बातें श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के ट्रस्टी ज.गु.वासुदेवानंद सरस्वती ने 39वें रामायण मेले का उद्घाटन करते हुए कहीं।
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उन्होंने कहा कि बहुत कुछ करना पड़ता है तो सनातन धर्म की रक्षा होती है। भगवान राम का चरित्र अद्भुत और अद्वितीय है। उनके नाम की महिमा यह है कि गणिका और अजामिल भी तर गए। भगवान की कृपा हो तभी उनका नाम प्रसाद भी मिलता है। अवध धाम में रामायण मेले के पावन पर्व पर रामकथा सुनने का अवसर मिले इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है।
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अध्यक्षता कर रहे मणिरामदास की छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमलनयन दास ने कहा कि भगवान राम के आदर्शों को अपनाकर ही राष्ट्र की एकता और अखंडता संभव है। हर घर रामायण हो, राम चरित्र सभी को पढ़ना चाहिए। कहा कि इस वर्ष कोरोना के चलते रामायण मेले का आयोजन सीमित स्तर पर किया गया है। रामायण मेले उनके आदर्शों के प्रसार का सशक्त माध्यम है।
संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि अयोध्या व जनकपुर का रिश्ते को जोड़ने में रामकथा ही माध्यम है। रामायण मेले को स्वामी विनोदानंद सरस्वती, महंत कन्हैयादास रामायणी, आचार्य देवमुरारी बापू सहित अन्य संतों ने भी संबोधित किया। इससे पूर्व रामायण मेले के मुख्य अतिथि ज.गु.वासुदेवानंद सरस्वती व महंत कमलनयन दास ने द्वीप प्रज्वलन कर रामायण मेले का शुभारंभ किया।
रामायण मेला समिति के महामंत्री शीतला सिंह व दीपकृष्ण वर्मा ने संतों का स्वागत किया। संचालन कमलेश सिंह ने किया। इस दौरान महंत सुरेश दास, महंत गिरीशपति त्रिपाठी, महंत जन्मेजय शरण, नंद कुमार मिश्र सहित अन्य मौजूद रहे।
अंग्रेजों ने अलग किया, नेपाल है भारत का अंग
रामायण मेले में पहुंचे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्टी ज.गु.वासुदेवानंद सरस्वती ने पत्रकारों से कहा कि अंग्रेजों ने नेपाल को भारत से अलग कर दिया है, नेपाल भारत का ही अंग है। भारत व नेपाल के संस्कृति व संस्कार एक हैं, नेपाल भारत का एक प्रदेश है। बड़ी बात यह है कि नेपाल हमारे ज्योर्तिमठ के अंतर्गत आता है। मठ का प्रचार-प्रसार उत्तर भारत से लेकर पंजाब और पंचाल तक है। पंचाल के अंतर्गत सुमेरांचल, उत्तरांचल, नेपालांचल, अरूणांचल सहित पांच अंचल है, जहां तक ज्योर्तिमठ का प्रचार-प्रसार है। नेपाल हमेशा भारत का अंग रहा। उन्होंने कहा कि अखंड भारत की कल्पना बहुत आगे तक रही है। शंकराचार्य तो ईरान तक गए हैं। भौगोलिक स्थिति के अनुसार नेपाल भारत का ही अंग रहा है, राजनीतिक स्थिति बदलती रहती है।
70 एकड़ परिसर का किया जाएगा विस्तार
राममंदिर निर्माण कार्य में हो रही देरी पर ज.गु.वासुदेवानंद सरस्वती ने कहा कि राममंदिर भव्य और मजबूत बनना चाहिए कम से कम एक हजार वर्ष उसकी आयु हो। इसको लेकर वास्तुविद व इंजीनियर व्यवस्था करने में जुटे हुए हैं। हम सभी चाहते हैं कि जल्द से जल्द मंदिर बने लेकिन टिकाऊ व मजबूत हो यह भी जरूरी है। बताया कि 70 एकड़ भूमि में जो जीर्णशीर्ण मंदिर हैं उनमें विराजमान विग्रह को परिसर में नया मंदिर बनाकर स्थापित किया जाएगा। कहा कि राममंदिर परिसर में कई प्रकल्प बनने हैं इसलिए 70 एकड़ से ज्यादा जमीन की जरूरत पड़ सकती है, आवश्यकता होने पर और जमीन ले जाएगी।