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अवध विश्वविद्यालय के अभिलेखों पर कैसे हो ऐतबार
अमर उजाला ब्यूरो/फैजाबाद
Updated Sat, 13 Jun 2015 12:38 AM IST
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ऐसा नहीं है कि इन पर हस्ताक्षर न करने का कोई नियम हो। विवि में उदासीनता का आलम इस कदर है कि जिम्मेदार दस्तखत करना जरूरी नहीं समझते। अब यही चूक विवि प्रशासन के लिए भारी मुसीबत बन गई है। इसकी वजह अभिलेखों की जांच के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से सवाल उठाया जाना है।
दिल्ली सरकार के पूर्व कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर को लेकर जब दिल्ली पुलिस फर्जी डिग्री मामले की जांच के लिए बुधवार को अवध विवि पहुंची और कुलसचिव कार्यालय में परीक्षा नियंत्रक एएम अंसारी व कुलसचिव डॉ. एसएल मौर्य की मौजूदगी में अभिलेखों की जांच हुई। इसमें कई चौंकाऊ तथ्यों का खुलासा हुआ है।
सूत्रों के अनुसार जब विवि की ओर से दिल्ली पुलिस को विभिन्न वर्षों की सारणीयन पंजिका (क्रॉस लिस्ट) व अन्य प्रपत्र दिखाए गए, तो इनके कई पेज में विवि के कुलपति व परीक्षा नियंत्रक के हस्ताक्षर ही नहीं मिले। यही नहीं उक्त विषय व कक्षा का परीक्षा परिणाम कब घोषित किया गया? यह भी अंकित नहीं मिला।
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जबकि सारणीयन पंजिका के प्रत्येक पेज पर कुलपति व परीक्षा नियंत्रक के हस्ताक्षर और परीक्षाफल घोषणा की तिथि का स्थान चिह्नित है। पहले दिन की जांच में तो दिल्ली पुलिस खामोश रही, लेकिन जब दूसरे दिन गुरुवार को आप के मॉडल टाउन सीट से विधायक अखिलेश पति त्रिपाठी की वर्ष 2008 की एमए डिग्री की जांच करायी जाने लगी और सारणीयन पंजिका से प्राप्तांकों की तस्दीक की गई, तो पाया गया कि वर्ष 2008 की क्रॉस लिस्ट में लगभग हर पेज पर परीक्षा नियंत्रक व कुलपति का हस्ताक्षर नहीं है।
इतना ही नहीं उस पेज पर किसी के दस्तखत नहीं मिले, जिस पर हस्तलिखित संशोधन देखा गया। नियमानुसार मूल अभिलेखों में जहां कतिपय कारणवश संशोधन किया जाता है, वहां जिम्मेदारों का हस्ताक्षर होना अनिवार्य है। बिना हस्ताक्षर वह अवैध माना जाता है। बताते हैं कि हस्ताक्षर न होने पर जब जांच टीम के पुलिस अधिकारियों ने सवाल उठाए कि आखिर इस सारणीयन पंजिका को सही कैसे माना जाए? ऐसे तो कोई कभी भी संशोधन कर अंक बढ़ा सकता है।
अधिकारियों के सवाल पर जिम्मेदारों का तर्क रहा कि पहले और अंतिम पेज पर हस्ताक्षर किए जाते हैं। मगर संशोधन वाले पेज पर हस्ताक्षर क्यों नहीं हुए? इसका उत्तर कोई नहीं दे सका। यह हाल तब है जब सारणीयन पंजिका काफी महत्वपूर्ण होती है। भविष्य में किसी छात्र-छात्रा का अंकपत्र खो जाने पर इसी के आधार पर डुप्लीकेट (द्वितीय प्रति) मार्कशीट बनाई जाती रही है।
जानकारों की मानें तो सारणीयन पंजिका की ही तरह कई ऐसे भी महत्वपूर्ण अभिलेख हैं, जिन पर जिम्मेदार उदासीनता के चलते हस्ताक्षर ही नहीं करते। सबकुछ बाबुओं के सहारे छोड़ दिया जाता है। इसी उदासीनता की वजह से फर्जीवाड़े में शामिल लोगों को मनचाहे कार्य को अंजाम देने का अवसर मिल जाता है। अब जबकि दिल्ली पुलिस ने जांच में ये सवाल उठाए हैं, तो यह चूक विवि के लिए भविष्य में मुसीबत खड़ी कर सकती है। हालांकि जिम्मेदार लोग इससे इंकार कर कहते हैं कि सभी अभिलेखों पर हस्ताक्षर दर्ज हैं। प्रत्येक पेज पर दस्तखत किया जाना अनिवार्य नहीं है।
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दिल्ली सरकार के पूर्व कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर को लेकर जब दिल्ली पुलिस फर्जी डिग्री मामले की जांच के लिए बुधवार को अवध विवि पहुंची और कुलसचिव कार्यालय में परीक्षा नियंत्रक एएम अंसारी व कुलसचिव डॉ. एसएल मौर्य की मौजूदगी में अभिलेखों की जांच हुई। इसमें कई चौंकाऊ तथ्यों का खुलासा हुआ है।
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सूत्रों के अनुसार जब विवि की ओर से दिल्ली पुलिस को विभिन्न वर्षों की सारणीयन पंजिका (क्रॉस लिस्ट) व अन्य प्रपत्र दिखाए गए, तो इनके कई पेज में विवि के कुलपति व परीक्षा नियंत्रक के हस्ताक्षर ही नहीं मिले। यही नहीं उक्त विषय व कक्षा का परीक्षा परिणाम कब घोषित किया गया? यह भी अंकित नहीं मिला।
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जबकि सारणीयन पंजिका के प्रत्येक पेज पर कुलपति व परीक्षा नियंत्रक के हस्ताक्षर और परीक्षाफल घोषणा की तिथि का स्थान चिह्नित है। पहले दिन की जांच में तो दिल्ली पुलिस खामोश रही, लेकिन जब दूसरे दिन गुरुवार को आप के मॉडल टाउन सीट से विधायक अखिलेश पति त्रिपाठी की वर्ष 2008 की एमए डिग्री की जांच करायी जाने लगी और सारणीयन पंजिका से प्राप्तांकों की तस्दीक की गई, तो पाया गया कि वर्ष 2008 की क्रॉस लिस्ट में लगभग हर पेज पर परीक्षा नियंत्रक व कुलपति का हस्ताक्षर नहीं है।
इतना ही नहीं उस पेज पर किसी के दस्तखत नहीं मिले, जिस पर हस्तलिखित संशोधन देखा गया। नियमानुसार मूल अभिलेखों में जहां कतिपय कारणवश संशोधन किया जाता है, वहां जिम्मेदारों का हस्ताक्षर होना अनिवार्य है। बिना हस्ताक्षर वह अवैध माना जाता है। बताते हैं कि हस्ताक्षर न होने पर जब जांच टीम के पुलिस अधिकारियों ने सवाल उठाए कि आखिर इस सारणीयन पंजिका को सही कैसे माना जाए? ऐसे तो कोई कभी भी संशोधन कर अंक बढ़ा सकता है।
अधिकारियों के सवाल पर जिम्मेदारों का तर्क रहा कि पहले और अंतिम पेज पर हस्ताक्षर किए जाते हैं। मगर संशोधन वाले पेज पर हस्ताक्षर क्यों नहीं हुए? इसका उत्तर कोई नहीं दे सका। यह हाल तब है जब सारणीयन पंजिका काफी महत्वपूर्ण होती है। भविष्य में किसी छात्र-छात्रा का अंकपत्र खो जाने पर इसी के आधार पर डुप्लीकेट (द्वितीय प्रति) मार्कशीट बनाई जाती रही है।
जानकारों की मानें तो सारणीयन पंजिका की ही तरह कई ऐसे भी महत्वपूर्ण अभिलेख हैं, जिन पर जिम्मेदार उदासीनता के चलते हस्ताक्षर ही नहीं करते। सबकुछ बाबुओं के सहारे छोड़ दिया जाता है। इसी उदासीनता की वजह से फर्जीवाड़े में शामिल लोगों को मनचाहे कार्य को अंजाम देने का अवसर मिल जाता है। अब जबकि दिल्ली पुलिस ने जांच में ये सवाल उठाए हैं, तो यह चूक विवि के लिए भविष्य में मुसीबत खड़ी कर सकती है। हालांकि जिम्मेदार लोग इससे इंकार कर कहते हैं कि सभी अभिलेखों पर हस्ताक्षर दर्ज हैं। प्रत्येक पेज पर दस्तखत किया जाना अनिवार्य नहीं है।