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...ये सब की मसर्रत का एहसान उठाये हैं
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मवई। साहित्यिक संस्था दबिस्ताने एहले कलम के तत्वावधान में ग्राम नेवरा स्थित अजहर मंजिल में मुशायरा आयोजित किया गया। जिसकी सदारत बुजुर्ग शायर रहबर ताबानी व संचालन सगीर नूरी बाराबंकवी ने किया। इस अवसर पर बुजुर्ग शायर शमीम बीबीपुरी व ख्याति लब्ध साहित्यकार व समालोचक डा. अनवर हुसैन खां को उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया।
शकील दरियाबादी ने वर्तमान सामाजिक परिवेश का चित्रण करते हुए कहा... रास्ते हैं पुर खतर मंजिले दुश्वार हैं, कारवाने उम्र के लुटने के सब आसार हैं। शायर अकील ने इस शेर के जरिये कहा कि तुम न करना कभी गुरबत अना का सौदा, उम्र फाको में गुजरती है, गुजर जाने दो, बाट लेना मेरे तरके को जरा देर के बाद, कब्र में मेरा तो जनाजा तो उतर जाने दो। सिराज मंजर काकोरवी ने सुनाया यह दिल का आइना एक दम छनक कर टूट जाता है, जब आंगन में उठी दीवार से घर टूट जाता है। शाहिद जमाल ने कहा कि यहां सब बुझाते हैं जहर से जहर की प्यास, हम अपने गांव से लेकर निकले हैं शहर की प्यास।
शायर मुईद रहबर ने कहा शादाब है चमन मेरा फसले बहार से, और क्या तलब करूं परवर दिगार से। मखमूर काकोरवी ने पढ़ा कि समाज उनको हिकारत की नजर से देखता क्यों है, गरीबी में दो चार बच्चे पाल कर खुश हूं।.. बुजुर्ग शायर रहबर ताबानी ने शेर पढ़ा, रगो में बहता हुआ जल तरंग चीख उठा, उठा वो दर्द मेरा अंग अंग चीख उठा। शमीम बीबीपुरी ने अपने खास तरन्नुम व लहजे से कलाम पेश किया, ये सब की मसर्रत का एहसान उठाये हैं, गम है कि तेरे दिल को सीने से लगाए हैं। इसके अलावा मशहूर शायर इमरान अलियाबादी, कवि मनीराम अनजान, हास्य कवि अल्हण गोंडवी ने अपनी रचना प्रस्तुत की।
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शकील दरियाबादी ने वर्तमान सामाजिक परिवेश का चित्रण करते हुए कहा... रास्ते हैं पुर खतर मंजिले दुश्वार हैं, कारवाने उम्र के लुटने के सब आसार हैं। शायर अकील ने इस शेर के जरिये कहा कि तुम न करना कभी गुरबत अना का सौदा, उम्र फाको में गुजरती है, गुजर जाने दो, बाट लेना मेरे तरके को जरा देर के बाद, कब्र में मेरा तो जनाजा तो उतर जाने दो। सिराज मंजर काकोरवी ने सुनाया यह दिल का आइना एक दम छनक कर टूट जाता है, जब आंगन में उठी दीवार से घर टूट जाता है। शाहिद जमाल ने कहा कि यहां सब बुझाते हैं जहर से जहर की प्यास, हम अपने गांव से लेकर निकले हैं शहर की प्यास।
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शायर मुईद रहबर ने कहा शादाब है चमन मेरा फसले बहार से, और क्या तलब करूं परवर दिगार से। मखमूर काकोरवी ने पढ़ा कि समाज उनको हिकारत की नजर से देखता क्यों है, गरीबी में दो चार बच्चे पाल कर खुश हूं।.. बुजुर्ग शायर रहबर ताबानी ने शेर पढ़ा, रगो में बहता हुआ जल तरंग चीख उठा, उठा वो दर्द मेरा अंग अंग चीख उठा। शमीम बीबीपुरी ने अपने खास तरन्नुम व लहजे से कलाम पेश किया, ये सब की मसर्रत का एहसान उठाये हैं, गम है कि तेरे दिल को सीने से लगाए हैं। इसके अलावा मशहूर शायर इमरान अलियाबादी, कवि मनीराम अनजान, हास्य कवि अल्हण गोंडवी ने अपनी रचना प्रस्तुत की।
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