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पटाखे फोड़ना हो सकता जानलेवा
फैजाबाद/अमर उजाला ब्यूराे
Updated Tue, 10 Nov 2015 10:34 PM IST
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फैजाबाद (ब्यूरो)। दीपावली पर्व पर दीप जलाने के साथ-साथ तेज आवाज वाले पटाखों का चलन है। गगनभेदी पटाखे, अनार, राकेट, रस्सी बम जहां भी फोड़े जाते हैं उसके आसपास तमाशबीनों की भीड़ लग जाती है। आतिशबाजी के क्षणिक सुख में व्यक्ति जाने-अनजाने में कई बीमरियों को निमंत्रण दे देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि दीप पर्व पर पटाखों को सिरे से नजरंदाज करें, क्योंकि यह पटाखे पर्यावरण प्रदूषण फैलाने के साथ साथ मानव और बेजुबान जानवरों के जीवन शैली को भी प्रभावित करते हैं।
तेज धमाके वाले पटाखों से हृदय रोगियों के जान पर बन आती है। अचानक उच्च क्षमता की आवाज से दिल की धड़कन बढ़ जाती है। ब्लड प्रेशर और बढ़ जाता है। बार-बार तेज आवाज सुनने से शरीर की पतली रक्त शिराएं, जिन्हें कैपलरीज के नाम से जाना जाता है फट जाती हैं। शरीर के अन्य अंगों की कैपलरीज फटती है तो व्यक्ति में बेचैनी होती है, यदि यही कैपलरीज मस्तिष्क की फटती हैं तो ब्रेन हैमरेज हो जाता है।
आवासीय क्षेत्र में दिन के समय 55 डेसीबल और रात में 45 डेसीबल आवाज होनी चाहिए। शहर के कुछ रिहायशी क्षेत्र बल्लाहाता, झारखंडी, सिविल लाइन, चौक, ठठरईया और खवासपुर में दिन में शोर का स्तर पार कर चुका है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रिकार्ड में इन मोहल्लों में शोर का स्तर 65 डेसीबल हैं। हवा में खतरनाक रसायन घुल जाते हैं। पटाखों से पशु-पक्षी और मानव स्वास्थ्य प्रभावित होता है। ऐसे में पटाखे न छोड़े तो अच्छा होगा।
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आदमी से समझदार है। वह तेज आवाज से बचने के तरीके खोज लेता है, लेकिन पशु बंध होता है। वह तेज आवाज खतरे की घंटी का सूचक मानता है। तेज आवाज की वजह से पशु भड़क जाता है। वह कूदने और भागने लगता है। पशु बंधा होने की वजह से उसको गंभीर चोटे लग जाती है। जानवर बेचैन हो जाता है। खाना-पीना छोड़ देता है। दुधारू पशु दूध देना बंद कर देते हैं।
तेज धमाके वाले पटाखों से हृदय रोगियों के जान पर बन आती है। अचानक उच्च क्षमता की आवाज से दिल की धड़कन बढ़ जाती है। ब्लड प्रेशर और बढ़ जाता है। बार-बार तेज आवाज सुनने से शरीर की पतली रक्त शिराएं, जिन्हें कैपलरीज के नाम से जाना जाता है फट जाती हैं। शरीर के अन्य अंगों की कैपलरीज फटती है तो व्यक्ति में बेचैनी होती है, यदि यही कैपलरीज मस्तिष्क की फटती हैं तो ब्रेन हैमरेज हो जाता है।
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आवासीय क्षेत्र में दिन के समय 55 डेसीबल और रात में 45 डेसीबल आवाज होनी चाहिए। शहर के कुछ रिहायशी क्षेत्र बल्लाहाता, झारखंडी, सिविल लाइन, चौक, ठठरईया और खवासपुर में दिन में शोर का स्तर पार कर चुका है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रिकार्ड में इन मोहल्लों में शोर का स्तर 65 डेसीबल हैं। हवा में खतरनाक रसायन घुल जाते हैं। पटाखों से पशु-पक्षी और मानव स्वास्थ्य प्रभावित होता है। ऐसे में पटाखे न छोड़े तो अच्छा होगा।
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आदमी से समझदार है। वह तेज आवाज से बचने के तरीके खोज लेता है, लेकिन पशु बंध होता है। वह तेज आवाज खतरे की घंटी का सूचक मानता है। तेज आवाज की वजह से पशु भड़क जाता है। वह कूदने और भागने लगता है। पशु बंधा होने की वजह से उसको गंभीर चोटे लग जाती है। जानवर बेचैन हो जाता है। खाना-पीना छोड़ देता है। दुधारू पशु दूध देना बंद कर देते हैं।