{"_id":"4d9456dab320bcaebe05f882f7418a34","slug":"blood-black-business-broke-the-chance-of-private-blood-banks-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"रक्त के काले धंधे ने तोड़ दी निजी ब्लड बैंकों की संभावनाए","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
रक्त के काले धंधे ने तोड़ दी निजी ब्लड बैंकों की संभावनाए
फैजाबाद/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 09 Aug 2015 10:27 PM IST
विज्ञापन
तीन साल पहले एक निजी ब्लड बैंक की कारस्तानी सामने आने के बाद हुई कार्रवाई से अब सरकारी ब्लड बैंक ही जिला अस्पताल से लेकर निजी नर्सिंग होमों में ब्लड की जरूरतें पूरी करने का एक मात्र विकल्प है।
यहां कई बार ब्लड की कमी से लोगों से लखनऊ की दौड़ लगानी पड़ती है। निजी ब्लड से लिया गया खून मरीज की जान बचाने की जगह जानलेवा बीमारियों का कारण बन रहा है।
यह मामला यहां तीन साल पहले सामने आया था। स्वास्थ्य अधिकारियों ने जांच के लिए खून देने वालों की जांच के निर्देश दिए। जांच में एक मात्र निजी चंदन ब्लड बैक को बंद करना पड़ा।
विज्ञापन
ब्लड बैंक मेें जिन रक्तदाताओं का नाम दर्ज किया गया था। उन रक्त दाताओं की पहचान में ही गड़बड़ी मिली। किसी का नाम मिल रहा था तो पता नहीं और पता मिल रहा था तो नाम नहीं।
जांच में फर्जी पाए जाने पर ब्लड बैंक के निदेशक ने लाइसेंस को सरेंडर कर दिया था। अब जिले में एक ही सरकारी क्षेत्र का ब्लड बैंक हैं, जिससे सरकारी और निजी क्षेत्र के ब्लड बैंकों में रक्त की आपूर्ति की जाती है।
तीन वर्ष पहले जिले में दो ब्लड बैंक थे। इनमें से सबसे अधिक रक्त का आदान प्रदान निजी क्षेत्र के ब्लड बैंक से होता था। निजी क्षेत्र के ब्लड बैंक के डोनरों पर संदेह होने पर शासन से जांच बैठा दी गई है।
जांच के लिए तत्कालीक ड्रग इंस्पेक्टर एसपी बंसल और अंबेडकरनगर ब्लड के ड्रग इंस्पेक्टर गोविंद गुप्त को जांच सौंपी थी। जांच के दौरान ब्लड बैंक में जिन डोनरों का नाम पता दर्ज था वह हकीकत में नहीं थे।
भौतिक सत्यापन में पता चला कि अंबुज देवकाली नाम कोई व्यक्ति मिला ही नहीं। पड़ताल आगे बढ़ती कि ब्लड बैंक के डायरेक्टर ने लाइसेंस को सरेंडर कर दिया और ड्रग इंस्पेक्टरों ने ब्लड बैंक को बंद का शासन में सूचना भेज दी।
अब जिले में महज एक ही ब्लड बैंक हैं। जिसमें वर्तमान में दो पैथोलाजिस्ट तैनात है। इसके अलावा आठ लैब टेक्नीशियन की रोटेशन में ड्यूटी लगाई जाती है।
जो नियमित रूप से ब्लड बैंक की जांच करते हैं और उसके बाद ही जरूरतमंदों को रक्त आपूर्ति की जाती है। जिले के ब्लड बैंक से सरकारी और निजी क्षेत्र के नर्सिंगहोम के अलावा अंबेडकरनगर, सुल्तानपुर, लखनऊ और कभी-कभी गोंडा जिले के नर्सिंगहोम को रक्त की आपूर्ति की जाती है।
ड्रग इंस्पेक्टर यूबी सिंह ने बताया कि हर वर्ष ब्लड बैंक का लाइसेंस रिनीवल के लिए ब्लड बैंक का निरीक्षण किया जाता है। पत्रावलियां, पैथोलॉजिस्ट की डिग्री, ब्लड निकालने का कक्ष, खून के रख-रखाव, डीप फ्रीजर, फ्रीज की जांच करने के बाद रिपोर्ट प्रदेश मुख्यालय भेजी जाती है।
वहां से केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेजी जाती है। उसके बाद ब्लड बैंक का लाइसेंस जारी ओर रिनीवल किया जाता है। प्रमुख अधीक्षक डॉ. एसी तिवारी ने बताया कि मरीजों को खून के बदले खून दिया जाता है।
तीमारदार से जो रक्त लिया जाता है, उसके बदले मरीज के रक्त से रक्त मिलाकर ही दिया जाता है। ताकि मरीज को किसी प्रकार की दिक्कत न हो। गैर जिलों के नर्सिंगहोम को खून तभी आपूर्ति किया जाता है जब उस नर्सिंगहोम अपने पत्र पर डिमांड करती है।
विज्ञापन
यहां कई बार ब्लड की कमी से लोगों से लखनऊ की दौड़ लगानी पड़ती है। निजी ब्लड से लिया गया खून मरीज की जान बचाने की जगह जानलेवा बीमारियों का कारण बन रहा है।
विज्ञापन
यह मामला यहां तीन साल पहले सामने आया था। स्वास्थ्य अधिकारियों ने जांच के लिए खून देने वालों की जांच के निर्देश दिए। जांच में एक मात्र निजी चंदन ब्लड बैक को बंद करना पड़ा।
विज्ञापन
ब्लड बैंक मेें जिन रक्तदाताओं का नाम दर्ज किया गया था। उन रक्त दाताओं की पहचान में ही गड़बड़ी मिली। किसी का नाम मिल रहा था तो पता नहीं और पता मिल रहा था तो नाम नहीं।
जांच में फर्जी पाए जाने पर ब्लड बैंक के निदेशक ने लाइसेंस को सरेंडर कर दिया था। अब जिले में एक ही सरकारी क्षेत्र का ब्लड बैंक हैं, जिससे सरकारी और निजी क्षेत्र के ब्लड बैंकों में रक्त की आपूर्ति की जाती है।
तीन वर्ष पहले जिले में दो ब्लड बैंक थे। इनमें से सबसे अधिक रक्त का आदान प्रदान निजी क्षेत्र के ब्लड बैंक से होता था। निजी क्षेत्र के ब्लड बैंक के डोनरों पर संदेह होने पर शासन से जांच बैठा दी गई है।
जांच के लिए तत्कालीक ड्रग इंस्पेक्टर एसपी बंसल और अंबेडकरनगर ब्लड के ड्रग इंस्पेक्टर गोविंद गुप्त को जांच सौंपी थी। जांच के दौरान ब्लड बैंक में जिन डोनरों का नाम पता दर्ज था वह हकीकत में नहीं थे।
भौतिक सत्यापन में पता चला कि अंबुज देवकाली नाम कोई व्यक्ति मिला ही नहीं। पड़ताल आगे बढ़ती कि ब्लड बैंक के डायरेक्टर ने लाइसेंस को सरेंडर कर दिया और ड्रग इंस्पेक्टरों ने ब्लड बैंक को बंद का शासन में सूचना भेज दी।
अब जिले में महज एक ही ब्लड बैंक हैं। जिसमें वर्तमान में दो पैथोलाजिस्ट तैनात है। इसके अलावा आठ लैब टेक्नीशियन की रोटेशन में ड्यूटी लगाई जाती है।
जो नियमित रूप से ब्लड बैंक की जांच करते हैं और उसके बाद ही जरूरतमंदों को रक्त आपूर्ति की जाती है। जिले के ब्लड बैंक से सरकारी और निजी क्षेत्र के नर्सिंगहोम के अलावा अंबेडकरनगर, सुल्तानपुर, लखनऊ और कभी-कभी गोंडा जिले के नर्सिंगहोम को रक्त की आपूर्ति की जाती है।
ड्रग इंस्पेक्टर यूबी सिंह ने बताया कि हर वर्ष ब्लड बैंक का लाइसेंस रिनीवल के लिए ब्लड बैंक का निरीक्षण किया जाता है। पत्रावलियां, पैथोलॉजिस्ट की डिग्री, ब्लड निकालने का कक्ष, खून के रख-रखाव, डीप फ्रीजर, फ्रीज की जांच करने के बाद रिपोर्ट प्रदेश मुख्यालय भेजी जाती है।
वहां से केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेजी जाती है। उसके बाद ब्लड बैंक का लाइसेंस जारी ओर रिनीवल किया जाता है। प्रमुख अधीक्षक डॉ. एसी तिवारी ने बताया कि मरीजों को खून के बदले खून दिया जाता है।
तीमारदार से जो रक्त लिया जाता है, उसके बदले मरीज के रक्त से रक्त मिलाकर ही दिया जाता है। ताकि मरीज को किसी प्रकार की दिक्कत न हो। गैर जिलों के नर्सिंगहोम को खून तभी आपूर्ति किया जाता है जब उस नर्सिंगहोम अपने पत्र पर डिमांड करती है।