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चुनावी मुद्दा: रामनगरी के त्रेतायुगीन कुंडों का नहीं हो सका कायाकल्प
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पौराणिक कुंडों का नहीं हो सका कायाकल्प
अयोध्या। रामनगरी की प्राचीनता व पौराणिकता के गवाह त्रेतायुगीन करीब दो दर्जन कुंड व सरोवर बदहाली का शिकार हैं। इन कुंडों के संरक्षण की मांग लगातार संत-धर्माचार्यों व आम लोगों द्वारा होती रही, लेकिन इनका कायाकल्प नहीं हो सका।
रामायण सर्किट योजना से अयोध्या का कायाकल्प तो किया जा रहा है लेकिन पौराणिक महत्ता के द्योतक प्राचीन कुंड एवं जलाशयों का अस्तित्व मिटने के कगार पर पहुंच गया है।
रामनगरी में दो दर्जन से भी अधिक पौराणिक महत्व के कुंड हैं और उन सभी का अस्तित्व दांव पर है। अधिकांश कुंड या तो बदहाल हैं, या फिर अस्तित्व खोने के कगार पर हैं, तो कुछ पर भूमाफिया की टेढ़ीनजर भी गड़ी हुई है।
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जिसके चलते अयोध्या के ये पौराणिक स्थल अब इतिहास बनते जा रहे हैं। सप्तसागर कुंड को भूमाफिया ने पाटकर कॉलोनी का शक्ल दे दी। क्षीरसागर पर भी भूमाफिया की नजर है। मनमुनि कुंड, अग्नि कुंड तो पूरी तरह से जलविहीन हो चुका है।
विद्याकुंड में भी पानी कम हो जाने से जलीय जीव-जंतुओं की मौत हो रही है। संत-धर्माचार्यों ने रामनगरी के त्रेतायुगीन कुंडों की पहचान पुर्नजीवित करने का कई बार प्रयास किया।
अयोध्या तीर्थ विवेचनी सभा द्वारा सीताकुंड, खजुहाकुंड आदि कुंड की सफाई शुरू कराई गई। रामनगरी के संत-धर्माचार्यों ने स्वंय कुंड में उतरकर सफाई अभियान शुरू किया।
अभियान आगे भी बढ़ा, कई समाजसेवी संस्थाएं भी आगेे आईं लेकिन कुछ समय बाद शासन-प्रशासन स्तर पर सहयोग न मिलने से यह अभियान भी प्रभावित हुआ। हश्र यह है कि सभी कुंड अपने कायाकल्प के लिए किसी भगीरथ के इंतजार में हैं।
अयोध्या तीर्थ विवेचनी सभा के महामंत्री महंत रामदास कहते हैं कि अयोध्या का विकास महानगरीय तर्ज पर नहीं बल्कि पौराणिक विरासत के अनुरूप होना चाहिए और ऐसा करने के लिए त्रेतायुगीन कुंडों की पहचान फिर रोशन करनी होगी।
कुंडों के संरक्षण एवं सुंदरीकरण का अभियान विवेचनी सभा लगातार चलाती रही है लेकिन शासन एवं प्रशासन की अदूरदर्शिता बड़ी बाधक है। पुजारी रमेश दास कहते हैं कि कुंडों के प्रति सरोकार को जीवंत करना होगा।
कुंड गौरवपूर्ण विरासत के संवाहक होने के साथ प्रकृति और पर्यावरण के पूरक हैं। आम लोगों को कुंडों को बचाने के लिए आगे आना होगा। वर्तमान सरकार रामनगरी के प्राचीनता के द्योतक विरासत को सहेजने के लिए प्रयासरत है, लेकिन इसके ठोस प्रयास सतह पर नहीं दिख रहा हैं।
शिवदयाल जायसवाल इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य अवनि कुमार शुक्ल कहते हैं कि प्राचीन कुंड को सहेजकर उन्हें नया कलेवर प्रदान किया जा सकता है। हम सभी को इस पहल का हिस्सा बनना होगा।
कुंडों एवं सरोवरों का कोई न कोई पौराणिक इतिहास है। अगर इसी तरह प्राचीनता की गवाह ये विरासत समाप्त होती रहे तो रामनगरी की प्राकृतिक आभा क्षीण होगी, जो कि चिंताजनक है।
बिड़ला धर्मशाला के प्रबंधक पवन सिंह ने कहा कि कुंडों के संरक्षण की चिंता हाशिए पर है। रामनगरी के प्राचीन कुंडो को सहेजने का सार्थक प्रयास विगत कुछ वर्षों में नही हो सका।
अग्नि कुंड, मनमुनि जैसे प्राचीन सरोवर व कुंड आज पूरी तरह से सूख गए हैं। शासन-प्रशासन द्वारा इन कुंडों में जल की उपलब्धता कराने का कोई प्रयास न हो पाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
वर्ष 1905 में बने फैजाबाद गजेटियर के अनुसार एडवर्ड अयोध्या तीर्थ विवेचना सभा ने नगरी के ऐतिहासिक व पौराणिक स्थलों की सहेजने की पहल की थी।
इसी क्रम में 1902 में अयोध्या के 145 मठ-मंदिरों, कुंडों, सागरों व अन्य पौराणिक स्थलों पर एडवर्ड के नाम के शिलापट लगवाए थे। अयोध्या शोध संस्थान ने भी अपनी शासकीय पत्रिका साक्षी में नगर में 26 कुंडों का उल्लेख किया है।
समय-समय पर कुंडों के संरक्षण की भी पहल हुई, बावजूद इसके कुंडों के संरक्षण की चिंता आज भी हाशिए पर है। वेद प्रकाश गुप्ता, नगर विधायक ने कहा कि रामनगरी के पौराणिक स्थलों, कुंडों, सरोवरों सभी का सुंदरीकरण कराया जाएगा।
कुंडों के सुंदरीकरण के लिए पौने तीन करोड़ अवमुक्त हो चुके हैं। चुनावी आचार संहिता के चलते काम शुरू नहीं हो पा रहा है। चुनाव के बाद तत्काल काम शुरू कर रामनगरी के दो दर्जन कुंड़ों का वैभव निखरेगा।
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अयोध्या। रामनगरी की प्राचीनता व पौराणिकता के गवाह त्रेतायुगीन करीब दो दर्जन कुंड व सरोवर बदहाली का शिकार हैं। इन कुंडों के संरक्षण की मांग लगातार संत-धर्माचार्यों व आम लोगों द्वारा होती रही, लेकिन इनका कायाकल्प नहीं हो सका।
रामायण सर्किट योजना से अयोध्या का कायाकल्प तो किया जा रहा है लेकिन पौराणिक महत्ता के द्योतक प्राचीन कुंड एवं जलाशयों का अस्तित्व मिटने के कगार पर पहुंच गया है।
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रामनगरी में दो दर्जन से भी अधिक पौराणिक महत्व के कुंड हैं और उन सभी का अस्तित्व दांव पर है। अधिकांश कुंड या तो बदहाल हैं, या फिर अस्तित्व खोने के कगार पर हैं, तो कुछ पर भूमाफिया की टेढ़ीनजर भी गड़ी हुई है।
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जिसके चलते अयोध्या के ये पौराणिक स्थल अब इतिहास बनते जा रहे हैं। सप्तसागर कुंड को भूमाफिया ने पाटकर कॉलोनी का शक्ल दे दी। क्षीरसागर पर भी भूमाफिया की नजर है। मनमुनि कुंड, अग्नि कुंड तो पूरी तरह से जलविहीन हो चुका है।
विद्याकुंड में भी पानी कम हो जाने से जलीय जीव-जंतुओं की मौत हो रही है। संत-धर्माचार्यों ने रामनगरी के त्रेतायुगीन कुंडों की पहचान पुर्नजीवित करने का कई बार प्रयास किया।
अयोध्या तीर्थ विवेचनी सभा द्वारा सीताकुंड, खजुहाकुंड आदि कुंड की सफाई शुरू कराई गई। रामनगरी के संत-धर्माचार्यों ने स्वंय कुंड में उतरकर सफाई अभियान शुरू किया।
अभियान आगे भी बढ़ा, कई समाजसेवी संस्थाएं भी आगेे आईं लेकिन कुछ समय बाद शासन-प्रशासन स्तर पर सहयोग न मिलने से यह अभियान भी प्रभावित हुआ। हश्र यह है कि सभी कुंड अपने कायाकल्प के लिए किसी भगीरथ के इंतजार में हैं।
अयोध्या तीर्थ विवेचनी सभा के महामंत्री महंत रामदास कहते हैं कि अयोध्या का विकास महानगरीय तर्ज पर नहीं बल्कि पौराणिक विरासत के अनुरूप होना चाहिए और ऐसा करने के लिए त्रेतायुगीन कुंडों की पहचान फिर रोशन करनी होगी।
कुंडों के संरक्षण एवं सुंदरीकरण का अभियान विवेचनी सभा लगातार चलाती रही है लेकिन शासन एवं प्रशासन की अदूरदर्शिता बड़ी बाधक है। पुजारी रमेश दास कहते हैं कि कुंडों के प्रति सरोकार को जीवंत करना होगा।
कुंड गौरवपूर्ण विरासत के संवाहक होने के साथ प्रकृति और पर्यावरण के पूरक हैं। आम लोगों को कुंडों को बचाने के लिए आगे आना होगा। वर्तमान सरकार रामनगरी के प्राचीनता के द्योतक विरासत को सहेजने के लिए प्रयासरत है, लेकिन इसके ठोस प्रयास सतह पर नहीं दिख रहा हैं।
शिवदयाल जायसवाल इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य अवनि कुमार शुक्ल कहते हैं कि प्राचीन कुंड को सहेजकर उन्हें नया कलेवर प्रदान किया जा सकता है। हम सभी को इस पहल का हिस्सा बनना होगा।
कुंडों एवं सरोवरों का कोई न कोई पौराणिक इतिहास है। अगर इसी तरह प्राचीनता की गवाह ये विरासत समाप्त होती रहे तो रामनगरी की प्राकृतिक आभा क्षीण होगी, जो कि चिंताजनक है।
बिड़ला धर्मशाला के प्रबंधक पवन सिंह ने कहा कि कुंडों के संरक्षण की चिंता हाशिए पर है। रामनगरी के प्राचीन कुंडो को सहेजने का सार्थक प्रयास विगत कुछ वर्षों में नही हो सका।
अग्नि कुंड, मनमुनि जैसे प्राचीन सरोवर व कुंड आज पूरी तरह से सूख गए हैं। शासन-प्रशासन द्वारा इन कुंडों में जल की उपलब्धता कराने का कोई प्रयास न हो पाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
वर्ष 1905 में बने फैजाबाद गजेटियर के अनुसार एडवर्ड अयोध्या तीर्थ विवेचना सभा ने नगरी के ऐतिहासिक व पौराणिक स्थलों की सहेजने की पहल की थी।
इसी क्रम में 1902 में अयोध्या के 145 मठ-मंदिरों, कुंडों, सागरों व अन्य पौराणिक स्थलों पर एडवर्ड के नाम के शिलापट लगवाए थे। अयोध्या शोध संस्थान ने भी अपनी शासकीय पत्रिका साक्षी में नगर में 26 कुंडों का उल्लेख किया है।
समय-समय पर कुंडों के संरक्षण की भी पहल हुई, बावजूद इसके कुंडों के संरक्षण की चिंता आज भी हाशिए पर है। वेद प्रकाश गुप्ता, नगर विधायक ने कहा कि रामनगरी के पौराणिक स्थलों, कुंडों, सरोवरों सभी का सुंदरीकरण कराया जाएगा।
कुंडों के सुंदरीकरण के लिए पौने तीन करोड़ अवमुक्त हो चुके हैं। चुनावी आचार संहिता के चलते काम शुरू नहीं हो पा रहा है। चुनाव के बाद तत्काल काम शुरू कर रामनगरी के दो दर्जन कुंड़ों का वैभव निखरेगा।