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Etawah News: पैरा-एथलेटिक्स में स्वर्ण जीतकर जिले का नाम रोशन कर रही तृप्ति
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निबाड़ीकला। मानिकपुर-मोहन गांव की तृप्ति ने 27 से 29 जनवरी तक गुजरात के नादियाड़ में आयोजित हुई 12 वीं पैरा ओलंपिक राष्ट्रीय जूनियर एवं सब जूनियर प्रतियोगिता में जिले का नाम रोशन किया। उन्हाेंने लंबी कूद में स्वर्ण व 100 मीटर दौड़ में रजत पदक जीता है।
मूल रूप से ग्राम मानिकपुर मोहन निवासी कृष्णकांत राजपूत वर्तमान में गाजियाबाद में प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि जब बेटी नौ वर्ष की थी तो घर की छत पर हाईटेंशन लाइन का तार गिरने से उसने बायां हाथ गवां दिया था।
तब वह हिम्मत हार गई थी लेकिन गाजियाबाद में कोच अनीता नागर व सतपाल सिंह की देखरेख में उन्होंने खूब अभ्यास किया। तृप्ति पूर्व में पैरा ओलंपिक राज्य स्तरीय खेलों में लंबी कूद, 100 मीटर व 200 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। उनकी खेल की ललक व पदक जीतने की चाहत ने ही विजेता बनाया। मार्च 2022 में हैदराबाद में आयोजित खेलों में वह चौथे स्थान पर रही थीं। इसके बाद मेहनत बढ़ा दी।
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पिता मानते हैं हीरो
तृप्ति ने बताया कि हादसे के बाद परिजनों ने उनका हाथ बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किया। उनका तीन बार ऑपरेशन भी हुआ, लेकिन डॉक्टर हाथ बचाने में असफल रहे। वह अपना आदर्श पिता को मानती हैं। पिता उन्हें हीरो मानते हैं। वह जब 7वीं कक्षा में थीं, तब जिला स्तरीय प्रतियोगिता में स्कूल की तरफ से खो-खो में भाग लिया था। टीम को विजेता बनने में अहम भूमिका निभाई थी। इसके बाद स्कूल की तरफ से कराटे प्रतियोगिता में एक स्वर्ण और दो रजत पदक हासिल किए।
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मूल रूप से ग्राम मानिकपुर मोहन निवासी कृष्णकांत राजपूत वर्तमान में गाजियाबाद में प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि जब बेटी नौ वर्ष की थी तो घर की छत पर हाईटेंशन लाइन का तार गिरने से उसने बायां हाथ गवां दिया था।
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तब वह हिम्मत हार गई थी लेकिन गाजियाबाद में कोच अनीता नागर व सतपाल सिंह की देखरेख में उन्होंने खूब अभ्यास किया। तृप्ति पूर्व में पैरा ओलंपिक राज्य स्तरीय खेलों में लंबी कूद, 100 मीटर व 200 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। उनकी खेल की ललक व पदक जीतने की चाहत ने ही विजेता बनाया। मार्च 2022 में हैदराबाद में आयोजित खेलों में वह चौथे स्थान पर रही थीं। इसके बाद मेहनत बढ़ा दी।
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पिता मानते हैं हीरो
तृप्ति ने बताया कि हादसे के बाद परिजनों ने उनका हाथ बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किया। उनका तीन बार ऑपरेशन भी हुआ, लेकिन डॉक्टर हाथ बचाने में असफल रहे। वह अपना आदर्श पिता को मानती हैं। पिता उन्हें हीरो मानते हैं। वह जब 7वीं कक्षा में थीं, तब जिला स्तरीय प्रतियोगिता में स्कूल की तरफ से खो-खो में भाग लिया था। टीम को विजेता बनने में अहम भूमिका निभाई थी। इसके बाद स्कूल की तरफ से कराटे प्रतियोगिता में एक स्वर्ण और दो रजत पदक हासिल किए।