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बंदूकों वाले बीहड़ में शहर की मिठास

Mon, 25 Apr 2022 11:24 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Mon, 25 Apr 2022 11:24 PM IST
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The sweetness of the city in the ravine of guns
मधुमक्खियों के लिए लगाए गए बॉक्स। संवाद - फोटो : ETAWAH
चकरनगर (इटावा)। चंबल और यमुना के जिन बीहड़ों में कभी डकैतों की बंदूकें गरजतीं थीं, वहां अब शहद बेरोजगारों के जीवन में मिठास घोल रहा है। बीहड़ क्षेत्र में शहर का उत्पादन बहुत मात्रा में किया जाने लगा है। मधुमक्खी पालन से लोगों की माली हालत में बदलाव आ गया है।
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चंबल के बीहड़ों को बीते एक दशक तक दुर्दांत खौफनाक डाकुओं की शरण स्थली के तौर पर जाना जाता था इन बीहड़ों के अभेघ अड्डों पर ठहराव कर डाकू दाल अपराध उद्योग संचालित करते थे। इन बीहड़ों में रोजगार के अभाव में भटक कर युवा पीढ़ी डाकुओं के रूप में अपनी पहचान कराने लगी थी आए दिन क्षेत्र में नई डकैत दल पैदा हो जाते थे डकैतों की सफाई के बाद चंबल के बीहड़ों में अब डकैत नहीं हनी से मनी पैदा हो रहा है।
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बीहड़ में इस समय बहुत लोग डेरा डाले मिल जाएंगे। इसकी वजह है कि ये इस क्षेत्र में शहद के उत्पादन में जुटे हुए हैं। शहद के धंधे से जुड़े मनोज सिंह, रविंद्र सिंह, गुलाब कुमार, राम भरोसे, दीनदयाल, बेटा लाल आदि ने बताया कि प्रतिदिन एक से डेढ़ क्विंटल शहद बाजारों में हम लोग बेच रहे हैं। जिसकी औसतन कीमत 14 से 15 हजार रुपए मिल जाती है।
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सरसों की खेती शहद के लिए अनुकूल
चंबल क्षेत्र में सरसों की खेती बहुतायत में होती है। बीहड़ में दूसरी वनस्पतियां भी हैं। इनके फूलों से मधुमक्खियां आसानी से शहद इकट्ठा कर लेतीं हैं। शहद उत्पादक बीहड की ठंडी वाली जगहों पर बक्से लगाकर मधुमक्खी पालन करते हैं। जंगल में दूसरी जगह पर लगीं बड़ी मधुमक्खियों के छत्तों से भी शहद निकालते हैं। इनमें एक छत्ते से 20 किलो तक शहद मिल जाता है। शहद का उत्पादन करने वालों ने बताया कि बड़ी कंपनियों के प्रतिनिधि मौके से ही शहद ले जाते हैं और नकद भुगतान भी करते हैं।
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