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Etawah News: हाईकोर्ट ने पालिका के अधिकार सीज करने के आदेश पर लगाई रोक
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- नगर पालिका के मृत कर्मचारी के परिजनों को आश्रित का लाभ देने का मामला
- कोर्ट ने कहा कि आयोग को निर्णायक आदेश पारित करने का अधिकार नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
इटावा। प्रयागराज उच्च न्यायालय ने राज्य मानवाधिकार आयोग की ओर से जारी नगर पालिका के अधिकार सीज करने के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि आयोग को निर्णायक आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है।
नगर पालिका के कर्मचारी राजीव यादव की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने सेवानिवृत्ति बकाया और अनुकंपा नियुक्ति के लिए आयोग से गुहार लगाई थी। आयोग ने सुनवाई के बाद नगर पालिका परिषद इटावा को महिला को राहत देने का निर्देश दिया था। आयोग ने यह भी कहा था कि यदि नगर पालिका ऐसा नहीं करती है, तो जिला मजिस्ट्रेट इटावा को नगर पालिका परिषद को निरस्त करने का निर्देश दिया जाता है। नगर पालिका परिषद ने इस आदेश के खिलाफ रिट याचिका दायर की थी। इस मामले में न्यायमूर्ति विवेक सरन और न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन की खंडपीठ ने इस पर सुनवाई की। खंडपीठ ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की कि राज्य मानवाधिकार आयोग एक आयोग है, न कि न्यायाधिकरण। इसे किसी विशेष तरीके से कार्य करने का निर्देश देने या निर्णायक आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है।
न्यायालय ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धाराओं का अध्ययन किया। अदालत ने पाया कि आयोग के पास नगर पालिका जैसी संस्थाओं को निरस्त करने का अधिकार नहीं है। ऐसे बाध्यकारी आदेश देने का वैधानिक अधिकार भी आयोग के पास नहीं दिखता है। उच्च न्यायालय ने आयोग के अधिकारों की सीमा पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
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अदालत ने मानवाधिकार आयोग की ओर से 24 मार्च 2026 और 7 अप्रैल 2026 को पारित आदेशों पर रोक लगा दी है। उच्च न्यायालय ने इस मामले को अत्यंत महत्वपूर्ण माना है। इसे 11 मई, 2026 को शीर्ष दस मामलों में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।
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- कोर्ट ने कहा कि आयोग को निर्णायक आदेश पारित करने का अधिकार नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
इटावा। प्रयागराज उच्च न्यायालय ने राज्य मानवाधिकार आयोग की ओर से जारी नगर पालिका के अधिकार सीज करने के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि आयोग को निर्णायक आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है।
नगर पालिका के कर्मचारी राजीव यादव की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने सेवानिवृत्ति बकाया और अनुकंपा नियुक्ति के लिए आयोग से गुहार लगाई थी। आयोग ने सुनवाई के बाद नगर पालिका परिषद इटावा को महिला को राहत देने का निर्देश दिया था। आयोग ने यह भी कहा था कि यदि नगर पालिका ऐसा नहीं करती है, तो जिला मजिस्ट्रेट इटावा को नगर पालिका परिषद को निरस्त करने का निर्देश दिया जाता है। नगर पालिका परिषद ने इस आदेश के खिलाफ रिट याचिका दायर की थी। इस मामले में न्यायमूर्ति विवेक सरन और न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन की खंडपीठ ने इस पर सुनवाई की। खंडपीठ ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की कि राज्य मानवाधिकार आयोग एक आयोग है, न कि न्यायाधिकरण। इसे किसी विशेष तरीके से कार्य करने का निर्देश देने या निर्णायक आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है।
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न्यायालय ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धाराओं का अध्ययन किया। अदालत ने पाया कि आयोग के पास नगर पालिका जैसी संस्थाओं को निरस्त करने का अधिकार नहीं है। ऐसे बाध्यकारी आदेश देने का वैधानिक अधिकार भी आयोग के पास नहीं दिखता है। उच्च न्यायालय ने आयोग के अधिकारों की सीमा पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
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अदालत ने मानवाधिकार आयोग की ओर से 24 मार्च 2026 और 7 अप्रैल 2026 को पारित आदेशों पर रोक लगा दी है। उच्च न्यायालय ने इस मामले को अत्यंत महत्वपूर्ण माना है। इसे 11 मई, 2026 को शीर्ष दस मामलों में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।