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Etawah News: सूख रही धरती की कोख, जलदोहन पर नहीं कोई रोक

Tue, 09 Jun 2026 11:22 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Tue, 09 Jun 2026 11:22 PM IST
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The earth's womb is drying up; there are no curbs on water extraction.
इटावा/चकरनगर। जल ही जीवन है, लेकिन बदलते समय में यह बात केवल नारों और किताबों तक सीमित होती जा रही है। विश्व भूगर्भ जल दिवस पर यदि चकरनगर क्षेत्र की स्थिति पर नजर डालें तो भूजल संरक्षण के प्रति न तो आमजन गंभीर दिखाई देते हैं और न ही सरकारी व्यवस्थाएं पूरी तरह सक्रिय हैं। क्षेत्र में लगातार बढ़ रहे जलदोहन और वर्षा जल संचयन की उपेक्षा भविष्य के लिए गंभीर संकट का संकेत दे रही है।
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बीते वर्षों में पौधरोपण और तालाबों के सुंदरीकरण के प्रयास जरूर हुए हैं, लेकिन उनका अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। अमृत सरोवर तालाबों के निर्माण के दौरान कई स्थानों पर ऊंची बाउंड्रीवाल बना दी गई, जिससे खेतों और बरसाती नालों का पानी तालाबों तक नहीं पहुंच पा रहा है। परिणामस्वरूप अनेक तालाब गर्मी शुरू होते ही सूखने लगते हैं। क्षेत्र के अधिकांश सरकारी कार्यालयों में अब तक रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित नहीं हो सके हैं। वर्षा जल के संरक्षण की योजनाएं कागजों तक सीमित दिखाई देती हैं। दूसरी ओर गांवों में सैकड़ों की संख्या में समरसेबल और बोरिंग संचालित हो रहे हैं। पशुपालक घंटों तक समर चलाकर पशुओं को नहलाते हैं, जिससे भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है। चंबल, यमुना, क्वारी, सिंध और पाहूज जैसी पांच प्रमुख नदियों से घिरे चंबल घाटी क्षेत्र में भी गर्मियों के दौरान जलस्तर तेजी से घटता है। कई स्थानों पर नदियां नालों जैसी दिखाई देने लगती हैं। भूगर्भ जल विभाग के अनुसार जिले के सभी आठ ब्लाक में लगभग 65 प्रतिशत जल दोहन हो रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते वर्षा जल संग्रहण और संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में स्थिति गंभीर हो सकती है।समरसेबल बोरिंग की बढ़ती संख्या, पक्के रास्तों का निर्माण, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, पानी की बर्बादी, कम वर्षा तथा वर्षा जल संग्रहण की कमी शामिल हैं।
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शहर से लेकर गांव तक पानी का कारोबार भी तेजी से फैल रहा है। सबमर्सिबल के माध्यम से जल निकासी कर उसका व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है, जबकि कई स्थानों पर टूटी पाइपलाइन और वाहन धुलाई में भी बड़ी मात्रा में पानी व्यर्थ बहाया जा रहा है।
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चंबल घाटी की पहचान हरे-भरे जंगलों और पांच नदियों से रही है, लेकिन लगातार हो रही अवैध कटान पर्यावरण संतुलन को प्रभावित कर रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सहसों, चकरनगर, भरेह और बिठौली क्षेत्र से प्रतिदिन 10 से 20 लकड़ी से भरे लोडर गुजरते हैं, लेकिन प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती। अधिकारियों का कहना है कि सभी विभागों को रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित कराने और जल संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभी से ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों के लिए भूगर्भ जल केवल एक सपना बनकर रह जाएगा।





पंचायत में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित करने के निर्देश दिए है। कुछ पंचायत में काम भी हुआ है।
- यदुवीर सिंह राजपूत, बीडीओ चकरनगर
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