{"_id":"61bb7c97810443293c48e262","slug":"sangosthi-etawah-news-knp669934390","type":"story","status":"publish","title_hn":"दीर्घकालीन जल प्रबंधन की कमी आने वाले समय में खतरे का संकेत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दीर्घकालीन जल प्रबंधन की कमी आने वाले समय में खतरे का संकेत
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इटावा। दीर्घकालीन जल प्रबंधन की कमी आने वाले समय में हम सबके के लिए खतरे का संकेत है। समय रहते हमें पानी के संतुलित उपयोग के मार्गों को ढूंढना होगा। जन जान को जागरूक होकर जल संरक्षण के उपायों को अपनी दिनचर्या में व्यवस्थित करना पड़ेगा। यह बात डॉ. भीमराव आंबेडकर कृषि अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी महाविद्यालय के प्रो. प्रदीप भदौरिया ने सरस्वती इंटर कालेज मोतीझील में भूगर्भ जल वैकल्पिक मार्ग अनुसरण समय की आवश्यकता विषय पर आयोजित संगोष्ठी में कही।
उन्होंने कहा कि मौसम में परिवर्तन होने के कारण मानसून की तीव्रता और अवधि दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। वहीं हमारे यहां दीर्घकालीन ल प्रबंधन की कमी है। देश की बहुत सी नदियां या तो सूख गई हैं अथवा अत्यधिक प्रदूषित हो चुकी हैं। गंगा जैसी प्रमुख नदी भी प्रदूषण से बुरी तरह से प्रभावित है। शहरों से निकलने वाला गंदा पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे नदियों में गिर रहा है।
प्रो. भदौरिया ने कहा कि भूगर्भ जल दोहन करने के मामले में भारत दुनियां के देशों में सबसे ऊपर है। भारत में 251 घन किलोमीटर प्रतिवर्ष जल का दोहन होता है। अमेरिका जैसे देश में इसके आधे से भी कम 112 घन मीटर भूगर्भ जल का दोहन होता है। हमारे यहां वर्षा के जल संचयन का समुचित प्रबंध नहीं है।
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वस्त्र उद्योग और भू निर्माण में सबसे ज्यादा पानी की बर्बादी होती है। इस बारे नगर पालिका और नगर निकायों को गंभीरता से सोचना होगा। इसके लिए जनजागरूकता की आवश्यकता है। गोष्ठी में प्रधानाचार्य भारत सिंह, अखिलेश भदौरिया, पदम सिंह नरूका, दिलीप मिश्रा ने भी विचार व्यक्त किए।
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उन्होंने कहा कि मौसम में परिवर्तन होने के कारण मानसून की तीव्रता और अवधि दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। वहीं हमारे यहां दीर्घकालीन ल प्रबंधन की कमी है। देश की बहुत सी नदियां या तो सूख गई हैं अथवा अत्यधिक प्रदूषित हो चुकी हैं। गंगा जैसी प्रमुख नदी भी प्रदूषण से बुरी तरह से प्रभावित है। शहरों से निकलने वाला गंदा पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे नदियों में गिर रहा है।
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प्रो. भदौरिया ने कहा कि भूगर्भ जल दोहन करने के मामले में भारत दुनियां के देशों में सबसे ऊपर है। भारत में 251 घन किलोमीटर प्रतिवर्ष जल का दोहन होता है। अमेरिका जैसे देश में इसके आधे से भी कम 112 घन मीटर भूगर्भ जल का दोहन होता है। हमारे यहां वर्षा के जल संचयन का समुचित प्रबंध नहीं है।
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वस्त्र उद्योग और भू निर्माण में सबसे ज्यादा पानी की बर्बादी होती है। इस बारे नगर पालिका और नगर निकायों को गंभीरता से सोचना होगा। इसके लिए जनजागरूकता की आवश्यकता है। गोष्ठी में प्रधानाचार्य भारत सिंह, अखिलेश भदौरिया, पदम सिंह नरूका, दिलीप मिश्रा ने भी विचार व्यक्त किए।