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नेत्रहीन बच्चों का जीवन संवारने में जुटे राज किशोर
अमर उजाला ब्यूरो, इटावा
Updated Sun, 10 Apr 2016 11:35 PM IST
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केंद्र में बच्चे
- फोटो : अमर उजाला
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शारीरिक विकलांगता आपके लक्ष्य पूर्ति में बाधा नहीं बन सकती। विहार से आकर यहां बसे नेत्रहीन राज किशोर गुप्ता इसे साबित करने में जुटे हैं। 12 वर्षों से वह नेत्रहीन बच्चों का ही जीवन संवारने में लगे हैं। खास बात यह कि समाज की इस सेवा के लिए उन्होंने अपने कैरियर को भी पीछे छोड़ दिया।
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सेंट्रल स्कूल में नौकरी पाने के बाद वह ज्वाइन करने नहीं गए और आज वह पूरे मनोयोग से संस्थान में पढ़ रहे 18 बच्चों की देखभाल कर रहे हैं। उनका लक्ष्य अभी अधूरा है। वह 100 बच्चों के लिए एक ऐसा ही पुनर्वास संस्थान खोलना चाहते हैं, लेकिन पैसे की कमी उनकी इच्छा पूर्ति में बाधा बनी है।
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पक्का तालाब के निकट सिविल लाइन एरिया में स्पर्श दृष्टि बाधित शिक्षण एवं प्रशिक्षण आवासीय संस्थान वर्ष 1994 से संचालित है। यह संस्थान व इसके प्रधानाचार्य राज किशोर गुप्ता एक दूसरे के पूरक हैं। वह खुद नेत्रहीन हैं। बावजूद इसके वह पूरी शिद्दत के साथ इस संस्थान को चला रहे हैं। विहार प्रांत के भागलपुर जिले के पिरपैती गांव निवासी राज किशोर गुप्ता ब्रेल लिपि के मास्टर हैं।
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उन्होंने हिंदी व इतिहास विषय से एमए और वर्ष 2007 में बीएड की डिग्री हासिल की थी। वर्ष 1994 में कानपुर के स्कूल में पढ़ाते वक्त उन्हें इस स्पर्श अंध विद्यालय में नौकरी करने का अवसर मिला। उसके बाद से उन्होंने फिर कभी भी कहीं और जाने में रुचि नहीं दिखाई। वर्ष 2008-09 में परिवार के दबाव में उन्होंने केंद्रीय विद्यालय संगठन में पीजीटी पद के लिए आवेदन किया।
जिसमें उनका चयन हो गया, लेकिन वह इस अंध स्पर्श विद्यालय को छोड़ नहीं सके। इसके लिए परिवार का विरोध तक झेलना पड़ा। विद्यालय परिसर में ही पत्नी व दो बच्चों के साथ रह रहे श्री गुप्ता के प्रयास से यहां के तीन बच्चे बीएड व दो बच्चे बीए व कंप्यूटर प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। वर्तमान में यहां 18 बच्चों में 13 लड़के और पांच लड़कियां हैं।
जिनकी उम्र सात से 22 साल तक हैं। यहां बच्चों को नोयडा से संचालित नेशनल ओपन स्कूलिंग संस्थान के तहत पढ़ने का मौका मिल रहा है। पढ़ाई का पूरा खर्च वह खुद उठा रहे हैं। यह संस्थान गैर सरकारी है और ब्लाइंड रिलीफ एकेडमी के तौर पर पंजीकृत है। लोगों के सहयोग से ही संस्थान के सारे खर्च पूरे होते हैं। अब तक किसी भी प्रकार की सरकारी मदद नहीं मिली है।
श्री गुप्ता बताते हैं कि हर महीने करीब 24 हजार रुपये का खर्चा होता है। बच्चों को संगीत सिखाने के लिए टीचर और देखभाल सहित अन्य कार्यों के लिए दो आया हैं। यह सब उनके परिवार एवं आम लोगों की मदद से संभव होता है।
उन्होंने अपना जीवन नेत्रहीन बच्चों के लिए समर्पित कर दिया है। वह बताते हैं कि शहर से सटे लुहन्ना गांव में उन्होंने एक 13 हजार वर्ग फीट का प्लाट भी ले रखा है। जिसमें वह 100 बच्चों के लिए पुनर्वास केंद्र खोलना चाहते हैं, लेकिन धन की कमी आड़े आ रही है। उनका लक्ष्य है कि नेत्रहीन बच्चों को पढ़ने लिखने का पर्याप्त अवसर मिले और वह भी सामान्य जीवन जी सकें। उन्हें उम्मीद है कि उनका मकसद अवश्य पूरा होगा।