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कमाई का साधन बनी हॉटकुक्ड योजना
ब्यूरो/अमर उजाला, इटावा
Updated Sat, 14 Feb 2015 11:39 PM IST
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हॉटकुक्ड एक ऐसी मलाईदार योजना है कि जिसे मौका मिलता है वह अपनी जेब भरने लगता है। जब आंगनबाड़ी कार्यकत्री यह जिम्मेदारी निभा रही थीं, तब भी बच्चों की संख्या में हेरफेर होता था। उसके बाद जब स्वयंसेवी संस्थाओं को लाया गया तो उन्होंने भी बच्चों की मनमानी संख्या बताने में परहेज नहीं किया।
यह तब पता चला जब अक्तूबर माह के बिल जिला कार्यक्रम अधिकारी के पास पहुंचे। बच्चों को खाना देने में एनजीओ और सीडीपीओ के आंकड़ों में काफी फर्क है। विभाग अब इन आंकड़ों की जमीनी सच्चाई तलाशने में जुटा है। इसके लिए सुपरवाइजरों को सत्यापन कार्य में लगाया गया है।
सरकार ने जब हॉटकुक्ड वितरण के लिए एनजीओ से आवेदन मांगे थे तब एक अहम प्रावधान यह था कि स्वयंसेवी संस्थाएं नो लॉस नो प्रॉफिट पर कार्य करेंगी। दिल्ली, लखनऊ और अलीगढ़ की स्वयंसेवी संस्थाओं ने जब जिले में आकर आवेदन किया था तभी यह साफ हो गया था कि इतनी दूर से कोई स्वयंसेवी संस्था बगैर मुनाफा की उम्मीद लिए नहीं आ सकती है।
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बहरहाल सरकार की मंशा के अनुरूप जिले के आठ ब्लाकों और इटावा शहर के लिए कुल नौ एनजीओ चयनित कर लिए गए थे। गत जुलाई के मध्य से अमूमन इन संस्थाओं ने भोजन वितरण भी शुरू कर दिया था। इसके बाद इन संस्थाओं ने हॉटकुक्ड योजना में कमाई का जरिया ढ़ूंढ़ लिया।
यह बात गत अक्तूबर के बिलों से साफ हो जाती है। इससे पहले जुलाई से सितंबर तक बगैर किसी सत्यापन के इन संस्थाओं को पेमेंट कर दिया गया। एनजीओ ने बाल विकास पुष्टाहार अधिकारी (सीडीपीओ) को जो बिल सौंपे वे सीडीपीओ के आंकड़े से मेल नहीं खाते हैं।
दोनों में काफी अंतर है। ऐसे में एनजीओ के काम में भी गड़बड़ी की बू आने लगी है। यहां बता दें कि भुगतान से पूर्व बिल में डीएम के हस्ताक्षर को अनिवार्य कर दिया गया है। अब आंकड़े गड़बड़ मिलने पर डीएम के समक्ष फाइल रखने से पहले स्थलीय सत्यापन कराया जा रहा है।
जिन बिलों का भुगतान होना है या जिनका पूर्व में भुगतान हो चुका है, उन सभी का सत्यापन कराया जा रहा है। इस कार्य में सुपरवाइजर लगाए गए हैं। आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा कि स्वयंसेवी संस्थाओं ने बच्चों की संख्या में कितना हेरफेर किया है।-अजीत कुमार सिंह, जिला कार्यक्रम अधिकारी, इटावा
प्रति नागा पर कटते हैं सौ रुपये
नियमावली में यह कॉलम भी रखा गया है कि एक दिन एक केंद्र पर हॉटकुक्ड वितरित न होने पर एनजीओ के भुगतान से सौ रुपये काटे जाएंगे। मेन्यू के अनुसार भोजन न देने पर 10 फीसदी और गुणवत्ताहीन भोजन अल्प मात्रा में देने पर 50 प्रतिशत की कटौती की जाएगी।
गत अक्तूबर के बिल भुगतान से 10 या 50 प्रतिशत की कटौती नहीं की गई, हालांकि हॉटकुक्ड न बांटने के एवज से धनराशि अवश्य काटी गई। मजे की बात ये कि सीडीपीओ को किसी केंद्र पर कभी भी न तो मेन्यू से अतिरिक्त हॉटकुक्ड बंटता मिला और न ही उनकी नजरों में भोजन की घटिया क्वालिटी आई।
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यह तब पता चला जब अक्तूबर माह के बिल जिला कार्यक्रम अधिकारी के पास पहुंचे। बच्चों को खाना देने में एनजीओ और सीडीपीओ के आंकड़ों में काफी फर्क है। विभाग अब इन आंकड़ों की जमीनी सच्चाई तलाशने में जुटा है। इसके लिए सुपरवाइजरों को सत्यापन कार्य में लगाया गया है।
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सरकार ने जब हॉटकुक्ड वितरण के लिए एनजीओ से आवेदन मांगे थे तब एक अहम प्रावधान यह था कि स्वयंसेवी संस्थाएं नो लॉस नो प्रॉफिट पर कार्य करेंगी। दिल्ली, लखनऊ और अलीगढ़ की स्वयंसेवी संस्थाओं ने जब जिले में आकर आवेदन किया था तभी यह साफ हो गया था कि इतनी दूर से कोई स्वयंसेवी संस्था बगैर मुनाफा की उम्मीद लिए नहीं आ सकती है।
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बहरहाल सरकार की मंशा के अनुरूप जिले के आठ ब्लाकों और इटावा शहर के लिए कुल नौ एनजीओ चयनित कर लिए गए थे। गत जुलाई के मध्य से अमूमन इन संस्थाओं ने भोजन वितरण भी शुरू कर दिया था। इसके बाद इन संस्थाओं ने हॉटकुक्ड योजना में कमाई का जरिया ढ़ूंढ़ लिया।
यह बात गत अक्तूबर के बिलों से साफ हो जाती है। इससे पहले जुलाई से सितंबर तक बगैर किसी सत्यापन के इन संस्थाओं को पेमेंट कर दिया गया। एनजीओ ने बाल विकास पुष्टाहार अधिकारी (सीडीपीओ) को जो बिल सौंपे वे सीडीपीओ के आंकड़े से मेल नहीं खाते हैं।
दोनों में काफी अंतर है। ऐसे में एनजीओ के काम में भी गड़बड़ी की बू आने लगी है। यहां बता दें कि भुगतान से पूर्व बिल में डीएम के हस्ताक्षर को अनिवार्य कर दिया गया है। अब आंकड़े गड़बड़ मिलने पर डीएम के समक्ष फाइल रखने से पहले स्थलीय सत्यापन कराया जा रहा है।
जिन बिलों का भुगतान होना है या जिनका पूर्व में भुगतान हो चुका है, उन सभी का सत्यापन कराया जा रहा है। इस कार्य में सुपरवाइजर लगाए गए हैं। आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा कि स्वयंसेवी संस्थाओं ने बच्चों की संख्या में कितना हेरफेर किया है।-अजीत कुमार सिंह, जिला कार्यक्रम अधिकारी, इटावा
प्रति नागा पर कटते हैं सौ रुपये
नियमावली में यह कॉलम भी रखा गया है कि एक दिन एक केंद्र पर हॉटकुक्ड वितरित न होने पर एनजीओ के भुगतान से सौ रुपये काटे जाएंगे। मेन्यू के अनुसार भोजन न देने पर 10 फीसदी और गुणवत्ताहीन भोजन अल्प मात्रा में देने पर 50 प्रतिशत की कटौती की जाएगी।
गत अक्तूबर के बिल भुगतान से 10 या 50 प्रतिशत की कटौती नहीं की गई, हालांकि हॉटकुक्ड न बांटने के एवज से धनराशि अवश्य काटी गई। मजे की बात ये कि सीडीपीओ को किसी केंद्र पर कभी भी न तो मेन्यू से अतिरिक्त हॉटकुक्ड बंटता मिला और न ही उनकी नजरों में भोजन की घटिया क्वालिटी आई।