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गुरु के प्रति आदर, सम्मान व कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है गुरुपूर्णिमा
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फोटो संख्या 01 आचार्य साकेत बिहारी दीक्षित
- फोटो : ETAWHA
गुरु पूर्णिमा के दिन वेदव्यास जी का जन्म होने के कारण इसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।
आचार्य साकेत बिहारी दीक्षित ने कहा कि यह दिन गुरु के प्रति आदर, सम्मान और अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है।
उन्होंने महामारी के इस दौर में पांच जुलाई को पड़ने वाले गुरुपूर्णिमा पर्व को लोगों से घरों में ही रहकर पूजन-अर्चन करने को कहा।
आचार्य ने बताया कि पौराणिक कथानुसार महर्षि वेदव्यास ने चारों वेदों और महाभारत की रचना की थी। गुरु पूर्णिमा को आषाढ़ पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा और मुडिया पूनो के नाम से जाना जाता है।
आचार्य ने बताया कि यह संधिकाल होता है क्योंकि इस समय के बाद से बारिश में तेजी आ जाती है। पुरातन काल में ऋषि, साधु, संत एक स्थान से दूसरे स्थान यात्रा करते थे।
चौमासा या बारिश के समय वे चार माह के लिए किसी एक स्थान पर रुक जाते थे। यही कारण है कि इन्हीं चार महीनों में प्रमुख व्रत त्यौहार आते हैं।
गुरु पूर्णिमा के दिन सभी लोग अपने-अपने गुरुजनों की भक्तिभाव से आराधना व अपने मंगलमय जीवन की कामना करते हैं। ब्रज क्षेत्र में इस पर्व को मुड़िया पूनो के नाम से मनाते हैं।
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न मंदिरों, आश्रमों और गुरु की समाधियों पर धूमधाम से कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। पूरे भारतवर्ष में यह त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है जिससे हर क्षेत्र गुरुमय हो जाता है। परंतु इस बार कोरोना वैश्विक महामारी के कारण सभी शिष्य अपने-अपने घरों में गुरु चरण पादुका का पूजन करें और प्रार्थना करें।
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आचार्य साकेत बिहारी दीक्षित ने कहा कि यह दिन गुरु के प्रति आदर, सम्मान और अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है।
उन्होंने महामारी के इस दौर में पांच जुलाई को पड़ने वाले गुरुपूर्णिमा पर्व को लोगों से घरों में ही रहकर पूजन-अर्चन करने को कहा।
आचार्य ने बताया कि पौराणिक कथानुसार महर्षि वेदव्यास ने चारों वेदों और महाभारत की रचना की थी। गुरु पूर्णिमा को आषाढ़ पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा और मुडिया पूनो के नाम से जाना जाता है।
आचार्य ने बताया कि यह संधिकाल होता है क्योंकि इस समय के बाद से बारिश में तेजी आ जाती है। पुरातन काल में ऋषि, साधु, संत एक स्थान से दूसरे स्थान यात्रा करते थे।
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चौमासा या बारिश के समय वे चार माह के लिए किसी एक स्थान पर रुक जाते थे। यही कारण है कि इन्हीं चार महीनों में प्रमुख व्रत त्यौहार आते हैं।
गुरु पूर्णिमा के दिन सभी लोग अपने-अपने गुरुजनों की भक्तिभाव से आराधना व अपने मंगलमय जीवन की कामना करते हैं। ब्रज क्षेत्र में इस पर्व को मुड़िया पूनो के नाम से मनाते हैं।
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न मंदिरों, आश्रमों और गुरु की समाधियों पर धूमधाम से कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। पूरे भारतवर्ष में यह त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है जिससे हर क्षेत्र गुरुमय हो जाता है। परंतु इस बार कोरोना वैश्विक महामारी के कारण सभी शिष्य अपने-अपने घरों में गुरु चरण पादुका का पूजन करें और प्रार्थना करें।