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दुष्टों के संहार के लिए अवतार लेते हैं भगवान
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कथा सुनते श्रद्घालु
- फोटो : ETAWAH
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ताखा। कथा व्यास आचार्य हरभजन दास जी महाराज ने कहा कि दुष्टों के संहार के लिए भगवान अवतार लेते हैं।
सरसईनावर में भागवत कथा के दौरान कृष्ण जन्म की कथा सुनाते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने असुरों का संहार करने के लिए ही धरती पर जन्म लिया था।
भगवान कृष्ण ने कंस और कालिया नाग का अंत कर गोकुल वासियों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी। उन्होंने कहा कि भगवान किसी न किसी रूप में अवतरित होकर धरती से पाप का नाश करने आते हैं। परंतु मनुष्य ईश्वर की लीला को समझ नहीं पाता।
मनुष्य अपने अहंकार में सब कुछ भूल जाता है और इसका उसे परिणाम भुगतना पड़ता है। उन्होंने कहा कि मोक्ष का सबसे सरल मार्ग ईश्वर की भक्ति है।
कृष्ण जन्म की कथा सुन श्रोता भाव विभोर हो उठे। इस मौके पर परीक्षित मनोरमा प्रजापति, बलवीर प्रजापति, हरिओम, श्रीओम, शिवओम, बालिस्टर सिंह, दिलीप कुमार, प्रमोद प्रजापति, धर्मेंद्र प्रजापति मौजूद थे।
इसी तरह आनेपुर के झाड़ी वाले मंदिर पर भागवत कथा के चौथे दिन कथावाचक संत रमेश भाई शुक्ला ने माता सती की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि बिना बुलावे के किसी कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए।
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आचार्य ने बताया कि राजा दक्ष भगवान शंकर जी से विरोधाभास रखते थे । एक बार ब्रह्मा जी ने एक सभा का आयोजन किया उस सभा में भगवान शंकर भी ध्यान लगाऐ बैठे थे। जब राजा दक्ष वहां पहुंचे तो सभी ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया, परंतु शिव तो ध्यान में थे।
उन्होंने दक्ष को न देखा और न खड़े हुए। इस पर दक्ष ने अपमान का अनुभव किया। केवल यही नहीं उनके हृदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी। वह भगवान शंकर से बदला लेने के लिए समय और अवसर का ध्यान करने लगे।
एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में सभी देवताओं और मुनियों को बुलाया परंतु शिव से आमंत्रित नहीं किया। माता सती को यह बात पता चली तो उन्होंने ने पिता के घर जाने की आज्ञा मांगी। शिवजी ने माता सती से कहा कि जहां बुलावा न हो वहां नहीं जाना चाहिए।
बाद में उन्होंने उसी यज्ञ कुंड में अपने प्राण दे दिए। आश्रम के सेवादार गुड्डू तिवारी, कीर्ति पाठक ने बताया कि कथा दोपहर एक बजे से शाम पांच बजे तक चलती है।
निवाड़ीकला के ग्राम जगमोहनपुर भिटारा में चल रही भागवत कथा के तीसरे दिन राजा परीक्षित की कथा सुनाई गई।
आचार्य रामजी पांडेय ने कहा कि मोक्ष की प्राप्ति के लिये मनुष्य को श्रेष्ठ कर्मों का सहारा लेना पड़ेगा। कलयुग में भी अच्छे कर्मों से मोक्ष की प्राप्ति होगी।
सहायक आचार्य अमन मिश्रा ने भक्तों को मृत्यु की हकीकत से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि राजा परीक्षित को शुकदेव जी कथा सुना रहे थे। उनका उसमें मन नहीं लग रहा था।
लोग मृत्यु से डरकर शरीर त्यागने का मन नहीं कर रहे हैं। राजा परीक्षित को ज्ञान हो गया। उन्होंने कहा कि किसी भी कथा को सुनने के लिये हमें अपनी एकाग्रता को बनाए रखना होगा।
तभी उसका फल हमारे जीवन को सार्थक बनाएगा। इस दौरान सोहित पांडे, अंकित तिवारी, सत्यम दुबे, गोपाल जी दुबे , अर्पित मिश्रा, गंगा राम, बजरंगी दुबे, अखिलेश शर्मा, पवन दीक्षित मौजूद रहे।
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सरसईनावर में भागवत कथा के दौरान कृष्ण जन्म की कथा सुनाते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने असुरों का संहार करने के लिए ही धरती पर जन्म लिया था।
भगवान कृष्ण ने कंस और कालिया नाग का अंत कर गोकुल वासियों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी। उन्होंने कहा कि भगवान किसी न किसी रूप में अवतरित होकर धरती से पाप का नाश करने आते हैं। परंतु मनुष्य ईश्वर की लीला को समझ नहीं पाता।
मनुष्य अपने अहंकार में सब कुछ भूल जाता है और इसका उसे परिणाम भुगतना पड़ता है। उन्होंने कहा कि मोक्ष का सबसे सरल मार्ग ईश्वर की भक्ति है।
कृष्ण जन्म की कथा सुन श्रोता भाव विभोर हो उठे। इस मौके पर परीक्षित मनोरमा प्रजापति, बलवीर प्रजापति, हरिओम, श्रीओम, शिवओम, बालिस्टर सिंह, दिलीप कुमार, प्रमोद प्रजापति, धर्मेंद्र प्रजापति मौजूद थे।
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इसी तरह आनेपुर के झाड़ी वाले मंदिर पर भागवत कथा के चौथे दिन कथावाचक संत रमेश भाई शुक्ला ने माता सती की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि बिना बुलावे के किसी कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए।
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आचार्य ने बताया कि राजा दक्ष भगवान शंकर जी से विरोधाभास रखते थे । एक बार ब्रह्मा जी ने एक सभा का आयोजन किया उस सभा में भगवान शंकर भी ध्यान लगाऐ बैठे थे। जब राजा दक्ष वहां पहुंचे तो सभी ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया, परंतु शिव तो ध्यान में थे।
उन्होंने दक्ष को न देखा और न खड़े हुए। इस पर दक्ष ने अपमान का अनुभव किया। केवल यही नहीं उनके हृदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी। वह भगवान शंकर से बदला लेने के लिए समय और अवसर का ध्यान करने लगे।
एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में सभी देवताओं और मुनियों को बुलाया परंतु शिव से आमंत्रित नहीं किया। माता सती को यह बात पता चली तो उन्होंने ने पिता के घर जाने की आज्ञा मांगी। शिवजी ने माता सती से कहा कि जहां बुलावा न हो वहां नहीं जाना चाहिए।
बाद में उन्होंने उसी यज्ञ कुंड में अपने प्राण दे दिए। आश्रम के सेवादार गुड्डू तिवारी, कीर्ति पाठक ने बताया कि कथा दोपहर एक बजे से शाम पांच बजे तक चलती है।
निवाड़ीकला के ग्राम जगमोहनपुर भिटारा में चल रही भागवत कथा के तीसरे दिन राजा परीक्षित की कथा सुनाई गई।
आचार्य रामजी पांडेय ने कहा कि मोक्ष की प्राप्ति के लिये मनुष्य को श्रेष्ठ कर्मों का सहारा लेना पड़ेगा। कलयुग में भी अच्छे कर्मों से मोक्ष की प्राप्ति होगी।
सहायक आचार्य अमन मिश्रा ने भक्तों को मृत्यु की हकीकत से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि राजा परीक्षित को शुकदेव जी कथा सुना रहे थे। उनका उसमें मन नहीं लग रहा था।
लोग मृत्यु से डरकर शरीर त्यागने का मन नहीं कर रहे हैं। राजा परीक्षित को ज्ञान हो गया। उन्होंने कहा कि किसी भी कथा को सुनने के लिये हमें अपनी एकाग्रता को बनाए रखना होगा।
तभी उसका फल हमारे जीवन को सार्थक बनाएगा। इस दौरान सोहित पांडे, अंकित तिवारी, सत्यम दुबे, गोपाल जी दुबे , अर्पित मिश्रा, गंगा राम, बजरंगी दुबे, अखिलेश शर्मा, पवन दीक्षित मौजूद रहे।