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पहले मां के होते दीदार, फिर मजार में सजदा
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लखना स्थित कालका मंदिर में लगी भक्तों की भीड़
- फोटो : ETAWAH
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इटावा। लखना कस्बा स्थित कालिका देवी का मंदिर हिंदू-मुस्लिम की एकता व सौहार्द की मिसाल है। मां काली के इस ऐतिहासिक मंदिर में इबादत और पूजा का ऐसा संगम देखने को मिलता है, जो शायद ही कहीं और हो। यहां नवरात्र व आम दिनों में भी भक्त मां काली की पूजा-अर्चना करने के बाद सैय्यद बाबा की मजार में माथा टेकते है। मंदिर व मजार का दरवाजा भी एक ही है।
यहां पर दोनों समुदाय (हिंदू और मुस्लिम) के लोग मिल जुलकर प्यार और भाईचारे के साथ अधिकांश पर्व व त्योहार मनाते हैं। दोनों समुदाय के लोग एक-दूसरे के त्योहार पर बिना किसी भेदभाव व संकोच के सहयोग करते हैं। मंदिर में कोविड-19 की गाइड लाइन के तहत भक्तों को प्रवेश दिया जा रहा है। मां कालिका देवी के मंदिर के परिसर में ही सैय्यद बाबा की मजार है। मान्यता है कि यहां मां भक्तों की मुराद तभी पूरी करती हैं जब सैय्यद बाबा की मजार की इबादत भी की जाए।
मंदिर में हिंदू-मुस्लिम एक भाव से दर्शन करने आते हैं और नवरात्र के दौरान यहां आसपास के जिलों से भी भक्त आते हैं। मंदिर के मुख्य प्रबंधक रवि शंकर शुक्ला ने बताया कि मंदिर परिसर में स्थित मजार में उनके और उनके परिवार के अलावा देश-विदेश स्थित तमाम अन्य परिवारों की भी आस्था है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। मां काली की पूजा-अर्चना करने के बाद मजार में सैय्यद बाबा की इबादत करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं जरूर पूरी होती हैं।
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कोई मूर्ति नहीं, आंगन भी कच्चा
मां काली ने राजा राव को स्वप्न में दर्शन देकर आदेश दिया था कि मंदिर का आंगन हमेशा कच्चा ही रखा जाए और प्रतिमाएं दर्शन परिसर में न रखी जाएं। आज भी यहां का आंगन गोबर से लीपा जाता है और कोई प्रतिमा स्थापित नहीं की गई। मंदिर में मजार की स्थापना कराने की बात मां काली ने ही राजा से कहीं थी। इस कारण मां काली के दर्शन के बाद भक्त मजार में इबादत करते हैं, जिससे मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
-विनोद कुमार, मंदिर के पुजारी
पहले लखना कस्बे के दूधे खां मजार में बैठते थे। कालका मंदिर में तीन पीढ़ी से अरमान के परिजन बैठ रहे हैं। सैय्यद बाबा पर भी हिंदू प्रसाद चढ़ाते हैं। यहां मां की पूजा के साथ सैय्यद बाबा की पूजा होने पर ही पूजा पूर्ण मानी जाती है।
-अरमान खां, सेवक, सैय्यद बाबा मजार
ये है इतिहास
इस मंदिर का निर्माण राजा राव जसवंत ने करवाया था। राजा राव यमुना नदी पार कंधेसी धार में स्थापित आदिशक्ति कालिका देवी के भक्त थे। वह रोजाना माता के दर्शन के लिए नदी पार करके जाते थे। रोज की तरह एक दिन राजा राव दर्शन के लिए जा रहे थे, लेकिन यमुना नदी में उफान के कारण वह दर्शन के लिए नदी पार नहीं कर सके। इससे वह इतना परेशान हुए कि अन्न-जल त्याग दिया। मां के दर्शन न कर पाने से वह अंदर ही अंदर घुटने लगे। तभी रात में मां काली ने जसवंत राव को स्वप्न में दर्शन दिए थे। स्वप्न में मां ने राजा से कहा कि निराश न हों, क्योंकि जल्द ही वह लखना में ही विराजमान हो जाएंगी और उन्हें लखना वाली कालिका मां के नाम से जाना जाएगा। तभी एक दिन कारिंदों ने बेरी शाह के बाग में देवी के प्रकट होने की जानकारी राजा को दी। राजा बाग में पहुंचे तो पीपल का वृक्ष जल रहा था और हर ओर घंटियों की गूंज थी। जब आग शांत हुई तो उसमें से नौ प्रतिमाएं निकली थी। राजा ने वैदिक मंत्रों के साथ सभी प्रतिमाओं की स्थापना की। करीब वर्ष 1882 में राजस्थानी शैली का यह भव्य मंदिर बनाया था।
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यहां पर दोनों समुदाय (हिंदू और मुस्लिम) के लोग मिल जुलकर प्यार और भाईचारे के साथ अधिकांश पर्व व त्योहार मनाते हैं। दोनों समुदाय के लोग एक-दूसरे के त्योहार पर बिना किसी भेदभाव व संकोच के सहयोग करते हैं। मंदिर में कोविड-19 की गाइड लाइन के तहत भक्तों को प्रवेश दिया जा रहा है। मां कालिका देवी के मंदिर के परिसर में ही सैय्यद बाबा की मजार है। मान्यता है कि यहां मां भक्तों की मुराद तभी पूरी करती हैं जब सैय्यद बाबा की मजार की इबादत भी की जाए।
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मंदिर में हिंदू-मुस्लिम एक भाव से दर्शन करने आते हैं और नवरात्र के दौरान यहां आसपास के जिलों से भी भक्त आते हैं। मंदिर के मुख्य प्रबंधक रवि शंकर शुक्ला ने बताया कि मंदिर परिसर में स्थित मजार में उनके और उनके परिवार के अलावा देश-विदेश स्थित तमाम अन्य परिवारों की भी आस्था है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। मां काली की पूजा-अर्चना करने के बाद मजार में सैय्यद बाबा की इबादत करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं जरूर पूरी होती हैं।
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कोई मूर्ति नहीं, आंगन भी कच्चा
मां काली ने राजा राव को स्वप्न में दर्शन देकर आदेश दिया था कि मंदिर का आंगन हमेशा कच्चा ही रखा जाए और प्रतिमाएं दर्शन परिसर में न रखी जाएं। आज भी यहां का आंगन गोबर से लीपा जाता है और कोई प्रतिमा स्थापित नहीं की गई। मंदिर में मजार की स्थापना कराने की बात मां काली ने ही राजा से कहीं थी। इस कारण मां काली के दर्शन के बाद भक्त मजार में इबादत करते हैं, जिससे मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
-विनोद कुमार, मंदिर के पुजारी
पहले लखना कस्बे के दूधे खां मजार में बैठते थे। कालका मंदिर में तीन पीढ़ी से अरमान के परिजन बैठ रहे हैं। सैय्यद बाबा पर भी हिंदू प्रसाद चढ़ाते हैं। यहां मां की पूजा के साथ सैय्यद बाबा की पूजा होने पर ही पूजा पूर्ण मानी जाती है।
-अरमान खां, सेवक, सैय्यद बाबा मजार
ये है इतिहास
इस मंदिर का निर्माण राजा राव जसवंत ने करवाया था। राजा राव यमुना नदी पार कंधेसी धार में स्थापित आदिशक्ति कालिका देवी के भक्त थे। वह रोजाना माता के दर्शन के लिए नदी पार करके जाते थे। रोज की तरह एक दिन राजा राव दर्शन के लिए जा रहे थे, लेकिन यमुना नदी में उफान के कारण वह दर्शन के लिए नदी पार नहीं कर सके। इससे वह इतना परेशान हुए कि अन्न-जल त्याग दिया। मां के दर्शन न कर पाने से वह अंदर ही अंदर घुटने लगे। तभी रात में मां काली ने जसवंत राव को स्वप्न में दर्शन दिए थे। स्वप्न में मां ने राजा से कहा कि निराश न हों, क्योंकि जल्द ही वह लखना में ही विराजमान हो जाएंगी और उन्हें लखना वाली कालिका मां के नाम से जाना जाएगा। तभी एक दिन कारिंदों ने बेरी शाह के बाग में देवी के प्रकट होने की जानकारी राजा को दी। राजा बाग में पहुंचे तो पीपल का वृक्ष जल रहा था और हर ओर घंटियों की गूंज थी। जब आग शांत हुई तो उसमें से नौ प्रतिमाएं निकली थी। राजा ने वैदिक मंत्रों के साथ सभी प्रतिमाओं की स्थापना की। करीब वर्ष 1882 में राजस्थानी शैली का यह भव्य मंदिर बनाया था।