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जिले में बढ़ रहा कुपोषण और व्यवस्था बीमार
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इटावा। जिले में कुपोषण पर नियंत्रण नहीं लग रहा है। आंगनबाड़ी केंद्रों पर पिछले महीने तौल दिवस में 659 बच्चे अति कुपोषित मिले और रविवार को हुए स्वास्थ्य मेलों में 24 कुपोषित बच्चे सामने आए। इसके बावजूद प्रशासन चेत नहीं रहा है। अतिकुपोषित बच्चों की सेहत में सुधार के लिए बनाए गए एनआरसी सेंटर के बेड खाली पड़े रहते हैं।
बच्चों की सेहत की जांच के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों पर तौल कराई जाती है। इसका ब्योरा जिला कार्यक्रम अधिकारी और स्वास्थ्य विभाग को भेजा जाता है। तौल में अतिकुपोषित बच्चों को जिला अस्पताल में बनाए गए एनआरसी वार्ड में 15 दिन के लिए भर्ती कराना जरूरी है लेकिन ज्यादातर बच्चों को वार्ड में भर्ती नहीं कराया जा रहा है। जनवरी में बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग ने शून्य से पांच वर्ष तक के 149441 बच्चों का वजन कराया।
इसमें 469 बच्चे कुपोषित और 659 अतिकुपोषित पाए गए। 659 अतिकुपोषित बच्चों में केवल चार को ही एनआरसी वार्ड में भर्ती कराया गया। इसके अलावा रविवार को सभी 35 पीएचसी पर लगाए गए स्वास्थ्य मेले में 24 कुपोषित बच्चे मिले।
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अतिकुपोषित प्रत्येक बच्चे को पोषण एवं पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) वार्ड में भर्ती करना होता है। एनआरसी वार्ड में 10 बेड हैं। भर्ती होने वाले बच्चे को 15 दिन वार्ड में इलाज जरूरी है। बच्चे के साथ उसकी मां या एक अभिभावक होना चाहिए। बच्चे के साथ आने वाले को 50 रुपये प्रतिदिन और भोजन अस्पताल की ओर से दिया जाता है। बच्चे को पोषणहार और दवाएं भी अस्पताल में मुफ्त दी जाती हैं।
एनआरसी वार्ड बने पांच साल हो चुके हैं, जिले में हर साल हजारों की संख्या में अति कुपोषित बच्चे सामने आते हैं। किंतु एनआरसी वार्ड में केवल 818 बच्चों का ही इलाज हुआ है। वार्ड में 10 बेड हैं और एक मरीज 15 दिन रोका जाता है। इस औसत से प्रति महीने 20 बच्चों का इलाज होना चाहिए था। पांच साल में 1200 एनआरसी वार्ड में भर्ती होने चाहिए थे लेकिन आशा, एएनएम और विभाग के अधिकारियों से एनआरसी वार्ड खाली पड़ा रहता है।
सभी सीएचसी प्रभारियों को अपने अपने क्षेत्र से प्रत्येक महीने दो अतिकुपोषित बच्चों को एनआरसी वार्ड में भर्ती कराने के निर्देश दिए जा चुके हैं। अगर बच्चे वार्ड में नहीं लाए जा रहे हैं तो इसे दिखवाएंगे। जिन सीएचसी क्षेत्र से बच्चे नहीं लाए गए इसकी जानकारी करेंगे। जो सीएचसी अधीक्षक लापरवाही बरत रहे हैं, उनका वेतन रोका जाएगा।
- डॉ. एनएस तोमर, सीएमओ
एनआरसी में बच्चों को लाने की जिम्मेदारी आरवीएस टीम की है। ये टीम सीएचसी, पीएचसी के निर्देशन में काम करती है। बच्चे नहीं आ रहे हैं तो इसके लिए सीएचसी व पीएचसी अधीक्षक जिम्मेदार हैं। हमारे यहां जो बच्चे लाए जाते हैं उनका इलाज होता है।
- डा.एसएस भदौरिया, सीएमएस जिला अस्पताल
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बच्चों की सेहत की जांच के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों पर तौल कराई जाती है। इसका ब्योरा जिला कार्यक्रम अधिकारी और स्वास्थ्य विभाग को भेजा जाता है। तौल में अतिकुपोषित बच्चों को जिला अस्पताल में बनाए गए एनआरसी वार्ड में 15 दिन के लिए भर्ती कराना जरूरी है लेकिन ज्यादातर बच्चों को वार्ड में भर्ती नहीं कराया जा रहा है। जनवरी में बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग ने शून्य से पांच वर्ष तक के 149441 बच्चों का वजन कराया।
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इसमें 469 बच्चे कुपोषित और 659 अतिकुपोषित पाए गए। 659 अतिकुपोषित बच्चों में केवल चार को ही एनआरसी वार्ड में भर्ती कराया गया। इसके अलावा रविवार को सभी 35 पीएचसी पर लगाए गए स्वास्थ्य मेले में 24 कुपोषित बच्चे मिले।
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अतिकुपोषित प्रत्येक बच्चे को पोषण एवं पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) वार्ड में भर्ती करना होता है। एनआरसी वार्ड में 10 बेड हैं। भर्ती होने वाले बच्चे को 15 दिन वार्ड में इलाज जरूरी है। बच्चे के साथ उसकी मां या एक अभिभावक होना चाहिए। बच्चे के साथ आने वाले को 50 रुपये प्रतिदिन और भोजन अस्पताल की ओर से दिया जाता है। बच्चे को पोषणहार और दवाएं भी अस्पताल में मुफ्त दी जाती हैं।
एनआरसी वार्ड बने पांच साल हो चुके हैं, जिले में हर साल हजारों की संख्या में अति कुपोषित बच्चे सामने आते हैं। किंतु एनआरसी वार्ड में केवल 818 बच्चों का ही इलाज हुआ है। वार्ड में 10 बेड हैं और एक मरीज 15 दिन रोका जाता है। इस औसत से प्रति महीने 20 बच्चों का इलाज होना चाहिए था। पांच साल में 1200 एनआरसी वार्ड में भर्ती होने चाहिए थे लेकिन आशा, एएनएम और विभाग के अधिकारियों से एनआरसी वार्ड खाली पड़ा रहता है।
सभी सीएचसी प्रभारियों को अपने अपने क्षेत्र से प्रत्येक महीने दो अतिकुपोषित बच्चों को एनआरसी वार्ड में भर्ती कराने के निर्देश दिए जा चुके हैं। अगर बच्चे वार्ड में नहीं लाए जा रहे हैं तो इसे दिखवाएंगे। जिन सीएचसी क्षेत्र से बच्चे नहीं लाए गए इसकी जानकारी करेंगे। जो सीएचसी अधीक्षक लापरवाही बरत रहे हैं, उनका वेतन रोका जाएगा।
- डॉ. एनएस तोमर, सीएमओ
एनआरसी में बच्चों को लाने की जिम्मेदारी आरवीएस टीम की है। ये टीम सीएचसी, पीएचसी के निर्देशन में काम करती है। बच्चे नहीं आ रहे हैं तो इसके लिए सीएचसी व पीएचसी अधीक्षक जिम्मेदार हैं। हमारे यहां जो बच्चे लाए जाते हैं उनका इलाज होता है।
- डा.एसएस भदौरिया, सीएमएस जिला अस्पताल