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खेती की जमीन पर कब्जा कर रहा बबूल
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चकरनगर। बीहड़ में हरियाली लाने के लिए बोया गया विलायती बबूल अब खेती योग्य जमीन पर कब्जा जमा रहा है। इस कारण खेती की जमीन घट रही है। इससे किसान परेशान हैं।
1980 के दशक में बीहड़ में हरियाली की मंशा से हेलीकॉप्टर से विलायती बबूल के बीज बोए गए थे। यह बबूल आज लोगों के लिए मुसीबत बना है। कुल खेती योग्य जमीन के आधे से अधिक हिस्से पर बबूल का कब्जा हो गया है। इस बबूल की लकड़ी सिर्फ जलाने के काम आती है। इसका दूसरा कोई उपयोग नहीं है। मजबूरी में किसान इसी विलायती बबूल की लकड़ी को बेचकर अपनी गुजर-बसर कर रहे हैं। सेंचुरी क्षेत्र होने के कारण बबूल की लकड़ी बेचने के लिए पहले किसानों को सेंचुरी के सामाजिक एवं वानिकी विभाग से लकड़ी बेचने की अनुमति लेनी पड़ती है। सहायक ग्राम विकास अधिकारी कृषि दयाशंकर राठौर ने बताया कि कृषि योग्य भूमि में फसलों से ज्यादा विलायती बबूल खड़े हैं। कुछ संपन्न किसान ही निजी नलकूपों के सहारे फसल उगा पा रहे हैं। सेंचुरी क्षेत्राधिकारी हरि किशोर शुक्ला ने बताया कि किसानों को अपने खेत में खड़े बबूल काटने के लिए खेती के कागजात दिखाने होते हैं। खेती के रखाव को देख कर किसान को लकड़ी कटान की अनुमति दी जाती है।
भूमि सुधार योजनाओं का संचालन बीहड़ क्षेत्र में कागजों में ही संचालित किया जा रहा है। यही वजह है कि यहां बंजर भूमि का रकबा घटने के बजाय बढ़ता जा रहा है। क्षेत्र में खेतों की सिंचाई के लिए सरकारी नलकूप किसानों के लिए औचित्यहीन साबित हो रहे हैं। रखरखाव के अभाव में सरकारी सिंचाई परियोजना स्थापना तक ही सीमित होती है। बाद में यह कबाड़ में तब्दील हो जाती है। सरकारी नलकूपों से सिंचाई का लाभ क्षेत्र में लोगों को नहीं मिल पा रहा है। बीहड़ सुधार के लिए चलने वाली योजनाओं किसानों को जानकारी नहीं होती है, सरकारी अमला किसानों को इनकी जानकारी देना भी नहीं चाहता है। अधिशासी अभियंता नलकूप खंड मांगेराम बताते हैं कि ब्लॉक से चकरनगर में किसानों की सिंचाई के लिए 80 नलकूप स्थापित हैं। इनसे किसान सिंचाई कर रहे हैं।
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चकरनगर स्टेट के राजवंशज कुंवर सिंह चौहान ने बताया कि उनकी 30 बीघा जमीन पर विलायती बबूल ने कब्जा जमा लिया है। दो दशक पूर्व यमुना नदी के किनारे स्थित खेतों में कम पानी वाली फसलें उगाकर अनाज पैदा कर लेते थे। बबूल की वजह खेती बंजर हो गई। चांदई निवासी कमल सिंह चौहान ने बताया कि उनके परिवार की लगभग 50 बीघा जमीन पर विलायती बबूल खड़ा है। छह महीने पहले नलकूप लगाकर कुछ जमीन को खेती योग्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं। सेंचुरी क्षेत्र में बबूल की लकड़ी काटने पर कई तरह के कानूनी पेच होने से भी काफी दिक्कत होती है।
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1980 के दशक में बीहड़ में हरियाली की मंशा से हेलीकॉप्टर से विलायती बबूल के बीज बोए गए थे। यह बबूल आज लोगों के लिए मुसीबत बना है। कुल खेती योग्य जमीन के आधे से अधिक हिस्से पर बबूल का कब्जा हो गया है। इस बबूल की लकड़ी सिर्फ जलाने के काम आती है। इसका दूसरा कोई उपयोग नहीं है। मजबूरी में किसान इसी विलायती बबूल की लकड़ी को बेचकर अपनी गुजर-बसर कर रहे हैं। सेंचुरी क्षेत्र होने के कारण बबूल की लकड़ी बेचने के लिए पहले किसानों को सेंचुरी के सामाजिक एवं वानिकी विभाग से लकड़ी बेचने की अनुमति लेनी पड़ती है। सहायक ग्राम विकास अधिकारी कृषि दयाशंकर राठौर ने बताया कि कृषि योग्य भूमि में फसलों से ज्यादा विलायती बबूल खड़े हैं। कुछ संपन्न किसान ही निजी नलकूपों के सहारे फसल उगा पा रहे हैं। सेंचुरी क्षेत्राधिकारी हरि किशोर शुक्ला ने बताया कि किसानों को अपने खेत में खड़े बबूल काटने के लिए खेती के कागजात दिखाने होते हैं। खेती के रखाव को देख कर किसान को लकड़ी कटान की अनुमति दी जाती है।
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भूमि सुधार योजनाओं का संचालन बीहड़ क्षेत्र में कागजों में ही संचालित किया जा रहा है। यही वजह है कि यहां बंजर भूमि का रकबा घटने के बजाय बढ़ता जा रहा है। क्षेत्र में खेतों की सिंचाई के लिए सरकारी नलकूप किसानों के लिए औचित्यहीन साबित हो रहे हैं। रखरखाव के अभाव में सरकारी सिंचाई परियोजना स्थापना तक ही सीमित होती है। बाद में यह कबाड़ में तब्दील हो जाती है। सरकारी नलकूपों से सिंचाई का लाभ क्षेत्र में लोगों को नहीं मिल पा रहा है। बीहड़ सुधार के लिए चलने वाली योजनाओं किसानों को जानकारी नहीं होती है, सरकारी अमला किसानों को इनकी जानकारी देना भी नहीं चाहता है। अधिशासी अभियंता नलकूप खंड मांगेराम बताते हैं कि ब्लॉक से चकरनगर में किसानों की सिंचाई के लिए 80 नलकूप स्थापित हैं। इनसे किसान सिंचाई कर रहे हैं।
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चकरनगर स्टेट के राजवंशज कुंवर सिंह चौहान ने बताया कि उनकी 30 बीघा जमीन पर विलायती बबूल ने कब्जा जमा लिया है। दो दशक पूर्व यमुना नदी के किनारे स्थित खेतों में कम पानी वाली फसलें उगाकर अनाज पैदा कर लेते थे। बबूल की वजह खेती बंजर हो गई। चांदई निवासी कमल सिंह चौहान ने बताया कि उनके परिवार की लगभग 50 बीघा जमीन पर विलायती बबूल खड़ा है। छह महीने पहले नलकूप लगाकर कुछ जमीन को खेती योग्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं। सेंचुरी क्षेत्र में बबूल की लकड़ी काटने पर कई तरह के कानूनी पेच होने से भी काफी दिक्कत होती है।