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जिंदगी पर भारी ओवरलोड सवारी
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इटावा। टूरिस्ट परमिट पर सवारियां ढोने वाले बसों में ओवरलोडिंग अक्सर यात्रियों की जिंदगी भर भारी पड़ती है। आए दिन कहीं न कहीं हादसे होते रहते हैं। इसके बावजूद न प्रशासन चेतता है और न यात्री ही अपनी सुरक्षा के प्रति सजग हो रहे हैं। शहर से चलने वाले टूरिस्ट बसों में भी क्षमता से दोगुनी सवारियां भरी जाती हैं।
इटावा शहर से दिल्ली, इंदौर, जयपुर के लिए लगभग 35-40 बसें चलती हैं। इन बसों के पास टूरिस्ट परिमिट है। इस परिमिट में चलने के स्थान से गंतव्य स्थल तक की ही सवारियां बैठाई जा सकती हैं। बीच में कहीं भी बस में सवारी नहीं बैठाई जा सकती है। लेकिन सभी बस चालक रास्ते में सवारियां बैठाते और उतारते हैं। इन बसों में स्लीपर कोच होते हैं। सिंगल स्लीपर में दो और तीन वाले स्लीपर में चार-चार सवारियां भरी जाती हैं। दो सीटों पर तीन-तीन सवारियां बैठाते हैं। गैलरी से लेकर चालक के पास सवारियां होने से निकलने तक की जगह नहीं रहती है। ज्यादातर बसों में आपातकालीन खिड़की भी नहीं होती है और पीछे की ओर शीशा भी नहीं लगाया जाता है। जो साइड के शीशा स्लीपर कोच के अंदर होते हैं। ऐसे में हादसा होने पर यात्रियों के निकलने के लिए जगह ही नहीं बचती है। एआरटीओ सौरभ कुमार ने कहा कि इन बसों को परमिट कानपुर और लखनऊ सेे निर्गत किए जाते हैं। टूरिस्ट बसों की फिटनेस रजिस्ट्रेशन वाले स्थान पर होती है। बसों में यदि ओवरलोड सवारियां समेत अन्य
खामियां मिलतीं है तो इसके लिए वह जांच करेंगे और नियमों की अनदेखी करने पर वाहनों पर कार्रवाई की जाएगी।
आरटीओ जारी करते हैं परमिट
ऑल इंडिया टूरिस्ट बसों के एक साल का परमिट आरटीओ कार्यालय और स्थायी परिमिट संचालनालय लखनऊ से जारी किए जाते हैं। बस में एक आपातकालीन खिड़की या खिड़की की जगह टूटने वाला शीशा, अग्रिशमन यंत्र, होना जरूरी है। चालक का ड्राइविंग लाइसेंस कॉमर्शियल होना जरूरी है।
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इटावा शहर से दिल्ली, इंदौर, जयपुर के लिए लगभग 35-40 बसें चलती हैं। इन बसों के पास टूरिस्ट परिमिट है। इस परिमिट में चलने के स्थान से गंतव्य स्थल तक की ही सवारियां बैठाई जा सकती हैं। बीच में कहीं भी बस में सवारी नहीं बैठाई जा सकती है। लेकिन सभी बस चालक रास्ते में सवारियां बैठाते और उतारते हैं। इन बसों में स्लीपर कोच होते हैं। सिंगल स्लीपर में दो और तीन वाले स्लीपर में चार-चार सवारियां भरी जाती हैं। दो सीटों पर तीन-तीन सवारियां बैठाते हैं। गैलरी से लेकर चालक के पास सवारियां होने से निकलने तक की जगह नहीं रहती है। ज्यादातर बसों में आपातकालीन खिड़की भी नहीं होती है और पीछे की ओर शीशा भी नहीं लगाया जाता है। जो साइड के शीशा स्लीपर कोच के अंदर होते हैं। ऐसे में हादसा होने पर यात्रियों के निकलने के लिए जगह ही नहीं बचती है। एआरटीओ सौरभ कुमार ने कहा कि इन बसों को परमिट कानपुर और लखनऊ सेे निर्गत किए जाते हैं। टूरिस्ट बसों की फिटनेस रजिस्ट्रेशन वाले स्थान पर होती है। बसों में यदि ओवरलोड सवारियां समेत अन्य
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खामियां मिलतीं है तो इसके लिए वह जांच करेंगे और नियमों की अनदेखी करने पर वाहनों पर कार्रवाई की जाएगी।
आरटीओ जारी करते हैं परमिट
ऑल इंडिया टूरिस्ट बसों के एक साल का परमिट आरटीओ कार्यालय और स्थायी परिमिट संचालनालय लखनऊ से जारी किए जाते हैं। बस में एक आपातकालीन खिड़की या खिड़की की जगह टूटने वाला शीशा, अग्रिशमन यंत्र, होना जरूरी है। चालक का ड्राइविंग लाइसेंस कॉमर्शियल होना जरूरी है।
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